संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

ईवीएम विश्वसनीयता का सवाल

? शब्बीर कादरी

       हाल ही में ईवीएम में कुछ ऐसे सुधार किए गए हैं जिससे मतदाता को एक प्रिंट आउट भी प्राप्त होगा जिससे यह मालूम हो सके कि मतदाता का वोट उस प्रत्याशी को मिल चुका है जिसे उसने चुना है। इस व्यवस्था को कुछ राजनीतिक दलों विशेषकर भाजपा की ओर से जताई गई आशंकाओं के मददेनजर लाया जा रहा है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार ईवीएम मशीनों में  अब प्रत्याशी को नकारने हेतु एक बटन और जोड़े जाने की सिफारिश भी की गई है जिसक ी सहायता से मतदाता अपने क्षेत्र के प्रत्याशी के संबंध में इस बटन का उपयोग कर अपना मत इस प्रकार व्यक्त कर सकेगा कि इनमें से कोई नहीं। कहा जा रहा है कि आगामी आम चुनाव में प्रिंट आउट प्राप्त करने वाली सुविधा न भी हो क्योंकि ऐसा करने के लिए लगभग 13 लाख नए उपकरणों की जरूरत होगी जिस पर लगभग 20,000 करोड़ रूका व्यय आएगा, पर ईवीएम में मतदाता को नकारने का बटन कुछ रायो के आगामी विधानसभा चुनाव में किया जाना संभवता: तय है।  ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर भी देश में पिछले कई वर्षों से अलग-अलग तरह की चर्चा चलती रही है। कुछ वर्ष पूर्व भारत की इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में किस तरह से छेड़छाड़ हो सकती है ओर इसमें कितनी खामियां हैं ऐसा बताने वाले दो विदेशी शोधकर्ताओं को नई दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उतरते ही हिरासत में ले लिया गया था और उन्हें वैद्य वीजा होने के बावजूद भारत में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई। तब यह समाचार, अखबारों में छपा भी था, याद रहे एमस्टरडम के कंम्प्यूटर सिक्योरिटी एक्सपर्ट रोप गोंग्रिप और मिशीगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एलेक्स हैल्डरमैन ने हैदराबाद के रिसर्चर हरिप्रसाद के साथ मिलकर यहां एक डेमो दिया था जिसमें बताया गया था कि किस तरह से भारत में ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है और इसमें कितनी खामियां हैं। शोधकर्ताओं के दल ने यह सब चुनाव आयोग को भी बताया था लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी बात पर गौर करने के बजाय उनकी शिकायत विदेश मंत्रालय से की थी और उन्हें ब्लैकलिस्टेड करार दिया था। हाल ही मे जब शोधकर्ता एयरपोर्ट पर उतरने को तैयार हुए तो उन्हें वापस लौटने का कहा गया, यह बताना भी जरूरी है कि भारतीय शोधकर्ता हरिप्रसाद को ईवीएम चुराने और इससे छेड़छाड़ करने के आरोप में पहले ही जेल भेजा जा चुका है।

             दरअसल केरल विधानसभा चुनाव में एक मतदाता केन्द्र में जब इस मशीन से वोट डाले गये तो इसे सुप्रीम कोर्ट में यह कह कर चुनौती दी गई थी कि जनप्रतिनिधित्व कानून में मशीन से वोट डालने का प्रावधान नहीं है इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील स्वीकार की और वहा फिर से चुनाव कराए गए।  आम चुनाव वर्ष 2004 के परिणाम से लेकर अब तक कई नेता और राजनीतिक दल यह शिकायत करते सुने गये हैं कि ईवीएम की गुणवत्ता संदेह की परिधि में हो सकती है तब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के साथ माकपा, राजद जनता दल-एस और इनेलो ने एक स्वर में कहा था कि हमें इलेक्ट्रनिक मतदान मशीन के स्थान पर पुन: मतपत्र इस्तेमाल करना चाहिये। भाजपा नेता की मांग थी कि जब तक निर्वाचन आयोग यह सुनिश्चित नहीं कर लेता कि इन मशीनों में किसी भी तरह की छेड़छाड़ कर परिणाम को प्रभावित किया जा सकता है तब तक हमें पुरानी प्रणाली को ही अपनाना चाहिये। इस परिप्रेक्ष्य में निर्वाचन आयोग ने इस मशीन को गेरभरोसेमंद बताने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, इंजीनियरों  और तकनीकी विशेषज्ञों को अपनी बात साबित करने के लिए आमंत्रित किया था। देश के 10 विभिन्न रायों से लगभग 100 ईवीएम मशीनों को लाकर उन्हें दिया गया और यह साबित करने को कहा गया कि इनमें वोटों को किस प्रकार हेरफर किया जा सकता है। तब के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने बाद में प्रेस को कहा कि इनमें से कोईभी यह साबित नहीं कर सका कि इन मशीनों में वोटों में हेरफेर की जा सकती है। पिछले आम चुनाव से लेकर अब तक देश के 40 से अधिक विभिन्न चुनावों में इस मशीन का उपयोग किया जा चुका है पर इसके साथ छेड़छाड़ के कोई भी पुख्ता प्रमाण अभी तक नहीं मिले हैं।  

            केन्द्र सरकार के उपक्रम भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रानिक कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ईवीएम मशीन का निर्माण करते हैं जिसे रिमोट कंट्रोल या दूर बैठकर किसी अन्य डिवाइस से नहीं चलाया जा सकता, भारत ने भूटान और नेपाल के आम चुनावों में भी यह मशीन मुहैया कराई है। फिर भी कई देशों के चुनावों में इस मशीन पर प्रतिबंध है, जर्मनी-नीदरलैंड ओर अमेकिा के 11 गणरायों ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग पर प्रतिबंध लगा रखा है। वर्ष 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ईवीएम की खामियां उजागर हुईं और 9 वर्षों से अमेरिकी रायों में मशीन के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है। ईवीएम के द्वारा मतदान किये जाने पर क्या खामियां पैदा हो सकती हैं उनमें खास यह है कि इस प्रणाली मे मतदाता के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि उसका मत ठीक से दर्ज हुआ है कि नहीं, 27 वर्ष पुरानी चुनावी तकनीक को सुरक्षित और विश्वसनीय मानने का कोई तर्कसंगत एवं वैधानिक आधार नहीं है और यह भी कि 1990 में एक विशेषज्ञ समिति ने इस पर विचार किया था इसके बाद से इसकी सुरक्षा और विश्वसनीयता की जांच नहीं कराई गई। यह भी गौरतलब है कि एक मशीन से केवल 3860 वोट ही दर्ज किए जा सकते हैं, इसकी चिप का प्रोग्राम बदलने पर यह काम लायक नहीं जाती और मतदान पूरा होने और इसका क्लोज बटन दबाने के बाद मशीन में एक भी वोट नहीं जोड़ा जा सकता। विकसित देशों में वोटर को इस बात का पता रहता है कि उसने अपना मत जिस प्रत्याशी को दिया है वह उसे मिला है कि नहीं, वोटर जब ईवीएम का बटन दबाता है तब उसे एक प्रिंट आउट भी मिलता है जिस पर संबंधित प्रत्याशी का नाम छपा होता है मतदाता उस प्रिंट को मतपेटी में डाल देता है और यह कि गिनती पर यदि कोई विवाद उठता है तो मतपेटियों में डाले गए मतपत्रों के आधार पर पुनर्गणना की जाती है।  बहरहाल हमारा चुनाव आयोग ईवीएम के प्रति सभी दृष्टिकोण से संतुष्ट है कि किसी दल और उम्मीदवार को लाभ पहुंचाने के लिए उसकी मशीनों में गड़बड़ी संभव नही

 

? शब्बीर कादरी