संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

तेलंगाना पर अब

तकरार बंद होनी चाहिए

? जाहिद खान

      केन्द्र सरकार के अलग तेलंगाना पर मुहर लगाने के दो महीने से अधिाक समय बाद, कैबिनेट ने तेलंगाना गठन के गृह मंत्रालय के प्रस्ताव को हाल ही में अपनी मंजूरी दे दी और तौर-तरीकों को तय करने के लिए मंत्रियों का एक समूह (जीओएम) गठित करने का फैसला किया। विभाजन के लिए बनाए गए मंत्रियों के समूह की अध्यक्षता वित्ता मंत्री पी चिदंबरम करेंगे। मंत्री समूह विशेष वित्तीय मदद के मुद्दे पर भी विचार करेगा, जो सीमांध्र को उसकी पृथक राजधानी बनाने और पिछड़े वर्ग की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से जरूरी होगा। नया राज्य बनाने की इस पूरी प्रक्रिया में कोई पांच से छह महीने तक का वक्त लगेगा। सरकार को इसके लिए संसद में साधारण बहुमत से राज्य पुनर्गठन विधोयक लाने समेत अभी और भी कई कदम उठाने होंगे। सरकार के अभी तलक के रुख को देखते हुए उम्मीद तो यह है कि तेलंगाना गठन का विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में ही पारित हो जाएगा और अगले साल देश के 29वें राज्य के रूप में तेलंगाना अस्तित्व में आ जाएगा।

            गौरतलब है कि यूपीए सरकार ने इसी साल 30 जुलाई को आंधा्र प्रदेश से तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का फैसला किया था। नए राज्य के गठन के बाद तटीय आंध्र, रायलसीमा और तेलंगाना के लोगों के मौलिक अधिकार समेत सुरक्षा और गारंटी तय की जाएगी। तेलंगाना में एकी.त आंधा्र प्रदेश के 23 जिलों में से 10 जिलों का भौगोलिक क्षेत्र होगा। जिसमें हैदराबाद, अदीलाबाद, खम्मम, करीमनगर, महबूबनगर, मेडक, नालगोंडा, निजामाबाद, रंगारेव्ी और वारंगल शामिल हैं। आंधा्र प्रदेश की 294 विधानसभा सीटों में 119 सीटें और 42 लोकसभा सीटों में से 17 सीटें तेलंगाना के हिस्से आएगी। हैदराबाद अगले दस साल के लिए तेलंगाना एवं सीमांध्र की संयुक्त राजधानी होगी।

           तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की मांग काफी पुरानी है। पृथक तेलंगाना के गठन की मांग साल 1956 से ही होती रही है, लेकिन इस मांग को मजबूती के साथ उठाया तेलंगाना राष्ट्र समिति पार्टी के अधयक्ष के. चंद्रशेखर राव ने। उन्होंने पृथक तेलंगाना के लिए पहले आंधा्र प्रदेश में एक गैर राजनीतिक आंदोलन छेड़ा और बाद में एक पार्टी बना अपने इस अभियान को आगे बढ़ाया। साल 2009 में चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन पर बैठने और निरंतर आंदोलन के बाद केन्द्र की यूपीए सरकार को उनकी मांगों के सामने झुकना पड़ा और उसने एलान किया कि जल्द ही तेलंगाना राज्य गठन करने की प्रक्रिया षुरू की जाएगी। पर यह काम इतना आसान नहीं था। सरकार की इस घोषणा के बाद तो जैसे आंधा्र प्रदेश में राजनीतिक अनिश्चितता का नया दौर शुरू हो गया। कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों के आंधा्र और रायलसीमा क्षेत्र के मंत्री और विधाायकों ने इस घोषणा को वापस लेने की मांग करते हुए उस वक्त अपना त्याग पत्र दे दिया। जब यह अप्रत्याषित घटनाक्रम घटा तो सरकार का आत्मविश्वास डगमगा गया और उसने इस मामले को कुछ दिन और टालने की कोशिश की। तेलंगाना राज्य मांग का जायजा लेने के बहाने सरकार ने साल 2010 में श्रीकृष्ण समिति की स्थापना कर दी। इस समिति ने अपना काम तेजी से किया और उसी साल दिसंबर में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। श्रीकृष्ण समिति ने अपनी रिपोर्ट में अलग तेलंगाना राज्य का विरोधा करते हुए इस बात की आशंका व्यक्त की कि छोटे राज्यों में माओवादियों की गतिविधिायां बढ़ सकती हैं। एक तरफ तेलंगाना गठन को लेकर लगातार राय शुमारी चल रही थी, तो दूसरी ओर सरकार पर तेलंगाना गठन को लेकर दवाब बढ़ता जा रहा था। मई, 2013 में सरकार ने इस काम के लिए दिग्विजय सिंह को आंधा्र प्रदेश की कमान सौंपी। राज्य में रायशुमारी का दौर एक बार फिर चला। दिग्विजय सिंह ने केन्द्र्र को सौंपी अपनी रिपोर्ट में तेलंगाना गठन को अनिवार्य बतलाया।

            नए राज्य गठन के एलान के बाद से एक तरफ तेलंगाना क्षेत्र के लोगों में भारी उत्साह और खुशियां मनाई जा रही हैं, तो दूसरी ओर एकीकृत आंध्र के लिए राज्य में आंदोलन शुरू हो गए हैं। सीमांधा्र यानी रायलसीमा और तटवर्ती आंध्र प्रदेश के तेरह जिलों में सरकार के फैसले का सबसे ज्यादा विरोध है। सरकार के इस फैसले के खिलाफ न सिर्फ उसकी पार्टी के सांसद और मंत्री हैं, बल्कि जगमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस व चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी भी नहीं चाहती कि राज्य का बंटवारा हो। जबकि रायषुमारी के दौरान यह सभी पार्टियां तेलंगाना के पक्ष में थीं, किसी ने भी उस वक्त इसका विरोधा नहीं किया था। बहरहाल फैसले के विरोधा में सीमांध्र क्षेत्र के कई मंत्री केन्द्र सरकार को अपने इस्तीफे सौंप चुके हैं। यहां तक कि फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात की जा रही है। यानी इस फैसले को वापिस लेने के लिए सरकार पर हर तरह का दवाब बनाया जा रहा है। आंदोनकारी केंद्र सरकार से आंध्र प्रदेश को विभाजित करने वाला निर्णय वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

             फैसले का विरोध करने वालों की दलील है कि विभाजन के बाद सीमांध्र प्रदेश, देश का सबसे गरीब राज्य हो जाएगा। राज्य के हैदराबाद समेत ज्यादातर प्राकृतिक संसाधन तेलंगाना क्षेत्र में चले जाएंगे। यह बात कुछ-कुछ सही भी है। भारत की बीस फीसदी कोयला खदानें तेलंगाना में हैं। यही नहीं मौजूदा आंधा्र प्रदेश का पचास फीसद से ज्यादा जंगल तेलंगाना तक फैला हुआ है। जाहिर है कि राज्य के बंटवारे के बाद सीमांध्र राज्य की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ेगा। किसी भी राज्य के पास खुद के विकास के लिए उसकी प्रारंभिक पूंजी उसके प्राकृतिक संसाधन ही होते हैं और तेलंगाना के अलग हो जाने के बाद प्राकृतिक संसाधनों के मामले में सीमांध्र प्रदेश काफी कमजोर हो जाएगा। आंधा्र प्रदेश के बंटवारे में सबसे बड़ी लड़ाई, राज्य की राजधानी हैदराबाद को लेकर है। तेलंगाना क्षेत्र में स्थित होने के चलते यहां के लोग इस शहर पर अपना नैसर्गिक दावा मानते हैं, तो वहीं सीमांध्र के लोग भी हैदराबाद पर अपना हक नहीं छोड़ना चाहते। आंधा्र प्रदेश के कुल राजस्व में हैदराबाद शहर का योगदान तकरीबन दो तिहाई तक है, ऐसे में इसे तेलंगाना को देने के साथ ही सीमांध्र के नुकसान की भरपाई कैसे होगी, यह भी यहां के लोगों की बड़ी चिंता है।

             सीमांध्र क्षेत्र के लोगों की यह चिंताएं ही हैं, जिनकी वजह से वे आंध्र प्रदेश के बंटवारे का विरोध कर रहे हैं। लेकिन विरोध किसी समस्या का समाधान नहीं। बात यह उठना चाहिए कि बंटवारे में दोनों राज्यों के बीच संसाधनों का उचित बंटवारा हो। बंटवारे में दोनों राज्यों के लोगों के साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। विकास की नजर से देखें, तो छोटे राज्यों की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता। न इस मांग को ज्यादा दिन तक टाला जा सकता। बड़े राज्यों की बनिस्बत छोटे राज्यों में प्रषासन ज्यादा प्रभावी तरीके से लोगों के पास पहुंच पाता है। संयुक्त पंजाब का विभाजन कर जब से तीन नए राज्य-पंजाब, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश बने हैं, इन तीनों राज्यों ने विकास के नए सोपान तय किए हैं। इसी तरह से उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड, मध्य प्रदेष से छत्तीसगढ़ और बिहार से अलग होकर झारखंड जब से नए राज्य बने हैं, यहां के निवासियों की जिंदगी में भी पहले से काफी फर्क आया है। कल तक राज्य में उपेक्षित रहे यह क्षेत्र आज काफी विकसित हो गए हैं। छोटे राज्यों के गठन से न सिर्फ नौकरशाही पारदर्शी होती है, बल्कि विकास कार्यो में भी तीव्र गति आती है।

            कुल मिलाकर यह पहली बार नहीं है जब किसी नए राज्य के गठन पर इतना हंगामा मचा हुआ है, बल्कि देश में जब भी किसी नए राज्य का गठन हुआ, ठीक इसी तरह का विरोधा हुआ है। उत्ताराखंड, झारखंड और हिमाचल प्रदेश का गठन भी आसानी से नहीं हुआ था, उस वक्त भी संबंधिात राज्यों में खूब हंगामा हुआ। हंगामें की वजह ज्यादातर राजनीतिक होती है। सियासी पार्टियां, राजनीतिक नफे-नुकसान को देखते हुए ही अपनी गोटियां चलती हैं। आंधा्र प्रदेश बंटवारे के विरोधा में राज्य के अंदर जो भी विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, उसकी वजह भी सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक है। आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव को देखकर ही सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी रणनीतियां तय कर रही हैं। वरना राज्य के लोगों की भावनाओं से किसी को कोई लेना देना नहीं। लगातार विरोध-प्रदर्शनों और बंद से राज्य की अर्थव्यस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा है। पृथक तेलंगाना के लिए क्षेत्र के लोगों ने एक लंबी लड़ाई लड़ी है, तब जाकर उनको ये अधिकार मिला है। तेलंगाना के गठन को अब ज्यादा दिन नहीं टाला जा सकता। लिहाजा तेलंगाना पर अब यह तकरार बंद होनी चाहिए। इस संबंधा में जितनी ज्यादा तकरार होगी, उतना ही राज्य को नुकसान होगा।

? जाहिद खान