संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

गटरसफाई का 'आध्यात्मिक अनुभव'

जनाब मोदी के ऐसे विचारों पर चर्चा क्यों नहीं ?

? सुभाष गाताड़े

             क्या मल उठाने या गटर साफ करने के काम को - जिसने लाखों लोगों को बेहद अपमानजनक स्थितियों में पीढ़ी दर पीढ़ी ढकेला है -आध्यात्मिक अनुभव कहा जा सकता है ? निश्चित ही नहीं, यह अलग बात है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो इन दिनों प्रधानमंत्री के प्रत्याशी के तौर पर देश के अलग हिस्सों में भ्रमण कर रहे हैं, इस मसले पर बिल्कुल अलग ढंग से सोचते हैं। दरअसल जब से मोदी ने अपनी अलग छवि गढ़ने के लिए 'पहले शौचालय, फिर देवालय' की बात कही है, और गुजरात में इस समस्या से निपटने का दावा किया है, तबसे न केवल इस मसले पर उनके विचारों की भी विवेचना चल रही है बल्कि यह बात भी सामने आ रही है कि सैनिटेशन की समस्या को अपने राज्य में समाप्त करने का दावा करनेवाले गुजरात की स्थिति इस मामले में कितनी फीसड्डी है।

            लेकिन पहले गटर साफ करने को आध्यात्मिक अनुभव की श्रेणी में रखने की बात करनेवाले मोदी के विचारों पर गौर करें। अपनी किताब 'कर्मयोग' में वह लिखते हैं : ''मैं नहीं मानता कि वे (सफाई कामगार) इस काम को महज जीवनयापन के लिए कर रहे हैं। अगर ऐसा होता तो उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी इस काम को नहीं किया होता ..किसी वक्त उन्हें यह प्रबोधान हुआ होगा कि वाल्मिकी समुदाय का काम है कि समूचे समाज की खुशी के लिए काम करना, इस काम को उन्हें भगवान ने सौंपा है ; और सफाई का यह काम आन्तरिक आध्यात्मिक गतिविधि के तौर पर जारी रहना चाहिए। इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि उनके पूर्वजों के पास अन्य कोई उद्यम करने का विकल्प नहीं रहा होगा। ''(पेज 48-49)

           मालूम हो कि इस किताब का प्रकाशन 2007 में हुआ था, जिसमें आई ए एस अधिाकारियों के चिन्तन शिविरों में मोदी द्वारा दिए गए व्याख्यानों का संकलन किया गया है। गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कार्पोरेशन जैसे अग्रणी सार्वजनिक प्रतिष्ठान के सहयोग से इसकी पांच हजार प्रतियां छापी गयी थीं। गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार राजीव शाह के चलते ही इस बात का खुलासा हुआ था।

;http://bogs.timesofindia.indiatimes.com/true-lies/entry/modi-s-spiritual-potion-to-woo-karmayogis)

          जाति प्रथा एवं वर्णाश्रम की अमानवीयता को औचित्य प्रदान करनेवाला उपरोक्त संविधानद्रोही वक्तव्य 'टाईम्स आफ इण्डिया' में नवम्बर मधय 2007 में प्रकाशित भी हुआ था। आप इसे गुजरात के दलितों के एक हिस्से के हिन्दुत्वकरण का परिणाम कहें कि गुजरात में इस वक्तव्य पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, मगर जब तमिलनाडु में यह समाचार छपा तो वहां दलितों ने इस बात के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किए जिसमें मैला ढोने को ''आधयात्मिक अनुभव'' की संज्ञा दी गयी थी। उन्होंने जगह जगह मोदी के पुतलों का दहन किया। अपनी वर्णमानसिकता के उजागर होने के खतरे को देखते हुए जनाब मोदी ने इस किताब की पांच हजार कापियां बाजार से वापस मंगवा लीं, मगर अपनी राय नहीं बदली। वर्ष 2009 में सफाई कर्मचारियों की एक सभा को सम्बोधिात करते हुए उन्होंने उनके काम को मंदिर के पुरोहित के काम के समकक्ष रखा था। उन्होंने कहा ''जिस तरह पूजा के पहले पुजारी मन्दिर को साफ करता है, आप भी मन्दिर की ही तरह शहर को साफ करते हैं।''

           अब 'पहले शौचालय और बाद में देवालय' की बात पर गौर करें। एक युवा सम्मेलन में मोदी की टिप्पणी ने केसरिया पलटन की अपनी दरारों को खूब उजागर किया। शिवसेना की तरफ से कहा गया कि' अब वक्त आ गया है कि कांग्रेस नरेन्द्र मोदी को अपनी शौचालय परियोजना का ब्राण्ड एम्बेसेडर बना दे' तो मोदी के 'परिवार' के तोगडिया ने उन्हें हिन्दूविरोधी घोषित किया और साथ साथ सैनिटेशन के मामले में राज्य की फीसड्डी हकीकत को भी सामने आयी।

           वैसे आंकड़े खुद गवाही देते हैं। 2001 की जनगणना ने ग्रामीण सैनिटेशन की हकीकत को जिनमें तीनों बुनियादी सुविधाएं - पीने का पानी, बिजली और सैनिटेशन - उपलब्ध है, उसका प्रतिशत महज 21 फीसदी बताया था, जबकि 2012-13 की इंडिया रूरल डेवलपमेण्ट रिपोर्ट बताती है कि यह अब गुजरात की 25 फीसदी ग्रामीण आबादी तक पहुंच सका है। शहरी इलाकों में भी स्थिति बहुत उत्साहवर्ध्दक नहीं है।

           मानव गरिमा नामक एक समुदाय आधाारित संगठन, जो सफाई कामगार समुदायों के अधिाकारों के लिए संघर्षरत है, उसके द्वारा हाल में सम्पन्न अध्ययन में यह बात उजागर हुई थी कि अहमदाबाद के अन्दर 126 ऐसे स्थल है, जहां अहमदाबाद मुनिसिपल कार्पोरेशन की बाकायदा निगरानी में मानवीय श्रम द्वारा मल उठाने का काम बदस्तूर जारी है।

(http://www.truthofgujarat.com/though-prohibited-law-manual-scavenging-manual-removal-excreta-still-prevalent-ahmedabad/)

           गौरतलब है कि इस मामले में सरकार के कथन और वास्तविक जमीनी हकीकत में गहरा अन्तराल दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर इसी संगठन ने वर्ष 2010 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास याचिका डाली थी, तब गुजरात सरकार को बेहिचक यह कहने में संकोच नहीं हुआ था कि वह 1993 में बने अधिनियम 'एम्प्लायामेन्ट आफ मैनुअल स्केवेंजर्स एण्ड कन्स्ट्रक्सन आफ ड्राई लैटरिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट, 1993 को प्रभावी ढंग से लागू करने के प्रति संकल्पबध्द है, जिसके अन्तर्गत ऐसा काम करनेवाले को अलग पगार दी जाती है। गुजरात सरकार की तरफ से यह बात भी अदालत को बतायी गयी थी कि उनके यहां ऐसी स्थिति नहीं है।

           यह जानना समीचीन होगा कि हाथों से मल उठाने की परम्परा का आज भी जीवित रहना क्या राज्य में इस वजह से विद्यमान है क्योंकि राज्य  के कर्णधार इस मसले पर बेहद प्रतिक्रियावादी तरीके से सोचते हैं। खासकर जनाब मोदी मल उठाने के काम को 'आधयात्मिक अनुभव' का दर्जा देते हैं, इसकी भी पड़ताल जरूरी है।

            वैसे जिस राज्य के कर्णधार जब खुद ऐसे दलितद्रोही चिन्तन से लैस हों, तब इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि 21 वीं सदी की दूसरी दहाई में भी सूबे में इतने बड़े पैमाने पर अस्पृश्यता क्यों व्याप्त है ? इस सम्बन्ध में दलित मानवाधिकारों के लिए कार्यरत संस्था 'नवसर्जन्' द्वारा 1,589 गांवों के विस्तृत अधययन पर प्रकाशित रिपोर्ट (2010) बताती है कि इनमें से 98 फीसदी गांवों में आज भी अस्पृश्यता का बोलबाला है। जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिानियम, 1989 के अन्तर्गत दलित अत्याचारों के केसेस निपटने के लिए विशेष अदालतों की आवश्यकता होती है, मगर जहां तक राज्य सरकार का सवाल है तो वह इसे न स्थापित करने के लिए संसाधानों की कमी का रोना रोती रहती है।

            गौरतलब है कि दलित अत्याचार के सन्दर्भ में राज्य सरकार एवं उसके 'यशस्वी प्रशासक' के चिन्तन को जानना हो तो हम राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित अधययन रिपोर्ट  'इम्पैक्ट आफ कास्ट डिसिमिनेशन एण्ड डिस्टिन्क्शन्स आन इक्वल आपर्चुनिटीज : ए स्टडी आफ गुजरात (मई 2013) को भी देख सकते हैं जिसमें वह नि:संकोच जातिगत भेदभाव को ''परसेप्श्न' अर्थात अनुभूति का मसला मानती है।

(http://b l o g s.timesofindia.indiatimes.com/true-lies/entry/untouchability-and-modi-s-babus) ¼ge leosr½  

? सुभाष गाताड़े