संस्करण: 14  नवम्बर- 2011

मेडिकल एसोसिएशन का

यह रवैया ठीक नहीं

? सुनील अमर

               ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग से प्रशिक्षित डॉक्टर तैयार करने की केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की महत्त्वाकांक्षी योजना का डॉक्टरों की संस्था इंडियन मेडिकल एसोशियेशन द्वारा ही विरोध किये जाने के कारण केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद काफी नाराज हैं। उन्होंने कडे शब्दों में एसोशियेशन के इस कृत्य की निंदा की है तथा आरोप लगाया है कि उसके इस अड़ंगेबाजी के कारण न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों के लोग योग्य चिकित्सकों से वंचित हैं बल्कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन में भी काफी दिक्कतें आ रही हैं। यह जानना समीचीन होगा कि इस वर्ष की शुरुआत में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक योजना घोषित की थी जिसके अनुसार देश के ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों के लिए तीन वर्षीय डिग्रीधारी ऐसे डॉक्टरों को तैयार किया जाना था जिन्हें एक अनुबंध के तहत नौकरी या प्रायवेट प्रैक्टिस ग्रामीण क्षेत्रों में ही करनी होती। ऐसे चिकित्सा स्नातकों की शिक्षा उनके सम्बन्धित जिला चिकित्सालय में मेडिकल स्कूल खोलकर दी जानी थी जहॉ कतिपय अतिरिक्त व्यवस्थाओं के बाद प्रतिवर्ष 100 छात्रों का प्रवेश होता और तीन वर्ष की शिक्षा पूरी कर वे बी.आर.एच.सी.यानी बैचलर ऑफ रुरल हेल्थ केयर की डिग्री लेकर बाहर निकलते। संकल्पना थी कि ऐसे अनुबंधयुक्त चिकित्सक तैयार होने पर देश के ग्रामीण सरकारी चिकित्सालयों को पर्याप्त डाक्टर मिल सकेंगें क्योंकि एक तो देश में भारी संख्या में चिकित्सकों की कमी है और जो हैं भी वे नियुक्ति के बावजूद ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में नहीं रहना चाहते।

               श्री गुलाम नबी आजाद की खीझ स्वाभाविक है। जानना दिलचस्प होगा कि देश में कुल सात लाख के करीब डॉक्टर हैं और इस वक्त सात लाख डाक्टरों की ही कमी है। उधर जिस संस्था ने गॉवों के लिए डॉक्टर तैयार करने की इस योजना का खाका तैयार किया था,उसी ने इसका इतना विरोध किया कि सरकार ने यह प्रस्ताव ही वापस ले लिया। हालॉकि आश्चर्य इस बात पर होता है कि देश में क्या कोई संगठन इतना ताकतवर हो सकता है कि वह अति आवश्यक सरकारी योजना की भ्रूणहत्या कर दे?यह योजना कितनी अहम थी इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बीती 29 जनवरी को दिल्ली में हुए एक्स रे व एम.आर.आई. चिकित्सकों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए महामहिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इसका अनुमोदन करते हुए साफ शब्दों में कहा था कि सस्ती चिकित्सा और डाक्टर सबको सुलभ होने ही चाहिए। महामहिम के इस संबोधन के बाद लगने लगा था कि जो डॉक्टर व संस्थाऐं इस बी.आर.एच.सी. कोर्स का विरोध कर रहे हैं अब वे शांत हो जाऐंगें लेकिन ऐसा लगता है कि इस योजना को आगे बढ़ाने में शासन स्तर से ही कोताही हुई।

               यह किसी से छिपा नहीं है कि गॉवों में सरकारी और प्रशिक्षित दोनों तरह के डाक्टरों की बेहद कमी है, जिसका नतीजा है कि वहाँ अकुशल या जिन्हें झोला छाप कहा जाता है,ऐसे डाक्टरों की भरमार है जो प्राय:ही जानलेवा साबित होते रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी चिकित्सालयों में जिन डाक्टरों की तैनाती की जाती है वे शायद ही वहाँ कभी रात्रि निवास करते हों,क्योंकि तमाम प्रकार की आवासीय दिक्कतों के कारण ऐसे डाक्टर निकटवर्ती शहरों में अपना आवास बना लेते है और बहुत आवश्यक होने पर ही वे अपनी तैनाती के अस्पताल पर जाते हैं।उनकी गैर मौजूदगी में कम्पाउन्डर ही डाक्टर का काम करते हैं। अब जो मरीज कम्पाउन्डर को नहीं दिखाना चाहते वे मजबूरी में प्रायवेट चिकित्सकों के पास जाते हैं,भले ही वह झोला छाप हो। ऐसे बहुत से नीम हकीम ख़तरे-जान लोगों ने बाकायदा नर्सिंग होम्स तक खोल रखा है! केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की गत वर्ष की रपट बताती है कि आजादी मिलने के समय देश में निजी अस्पतालों की जो संख्या मात्र 8 प्रतिशत थी, वो अब बढ़कर 68 प्रतिशत हो गयी है!

               देश में चिकित्सा सम्बन्धी शैक्षणिक संस्थानों को मंजूरी, पाठयक्रम निर्धारण व चिकित्सकों का पंजीकरण आदि का कार्य मेडिकल काउन्सिल ऑफ इन्डिया देखती है। इसी एम.सी.आई.को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बी.आर.एच.सी. का पाठयक्रम आदि तैयार करने का दायित्व सौंपा था। इसके तत्कालीन अधयक्ष डॉक्टर केतन देसाई ने ही श्री गुलाम नबी आजाद के इस प्रस्ताव को अमली जामा पहनाया था। बाद में डॉ. देसाई की संस्था वाले ही इसका यह कहकर विरोधा करने लगे कि इससे तो दोयम दर्जे के डॉक्टर तैयार होंगें और वे एम.बी.बी.एस. वालों की प्रतिष्ठा को क्षति पहुॅचाऐंगें। उसी दौरान डॉक्टर देसाई घूसखोरी के एक मामले में जब जेल में निरुध्द हो गये तो वे भी सरकार के खिलाफ हो गये। उधर सरकार अन्यान्य कारणों से एम.सी.आई.के विरोध के आगे झुक गयी और इस प्रकार देश की दो तिहाई आबादी के लिए तैयार हो रही एक महत्त्वपूर्ण योजना की भ्रूणहत्या हो गई। श्री गुलाम नबी आजाद ने स्वीकार किया है कि देश में निजी व सरकारी दोनों प्रकार के मेडिकल कालेजों से प्रतिवर्श महज 32 हजार डॉक्टर ही निकलते हैं। इसमें से भी बहुत से तो सर्टीफिकेट हाथ में आते ही ज्यादा वेतन के लालच में विदेशों का रुख  कर लेते हैं। जो बचते हैं, उनमें से तमाम तो निजी और मंहगे अस्पतालों में ऊॅचे वेतन पर नौकरी कर लेते हैं या अपना निजी अस्पताल शुरु कर लेते हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकारी अस्पतालों में नौकरी करने के लिए कितने मेडिकल स्नातक मिलते होंगें! सरकार को अगर इसी रतार से डॉक्टर मिलते रहे तो अनुमान लगाया जा सकता है कि सात लाख एम.बी.बी.एस. डॉक्टर कब मिल पाऐंगें! आबादी और बीमारियों के बढ़ने की जो रतार है उससे डॉक्टरों की आवश्यकता दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है।

                केंद्र स्वास्थ्य मंत्रालय अब यह कार्य राज्य सरकारों से कराना चाहता है। अब यह समझ में नहीं आता कि राज्य सरकारें किसी मेडिकल पाठयक्रम को एम.सी.आई.से अनुमोदित कराये बगैर कैसे लागू कर सकेंगीं। देश के सरकारी अस्पतालों को एलोपैथिक चिकित्सकों की आवश्यकता है और उनका रास्ता एम.सी.आई. से होकर ही जाता है। एम.सी.आई. ने ठान लिया है कि वह एम.बी.बी.एस. के समकक्ष किसी और डिग्री को मंजूरी नहीं देगी। आश्चर्यजनक यह है कि उसकी इस जिद के आगे सरकार बहादुर भी झुक गयी है। राज्य सरकारों की स्थिति और भी विचित्र है। वहॉ सुविधााऐं आवश्यकतानुसार नहीं राजनीतिक लाभ-हानि के हिसाब से मिलती हैं। विष्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से बहुत कम डॉक्टर हमारे सरकारी अस्पतालों में है। 50 लाख की आबादी पर अगर एक मेडिकल कॉलेज की आवश्यकता मान ले तो भी हमारी हालत बदहाल ही है। राजनीतिक पक्षपात का ही आलम है कि पुडुचेरी जैसा राज्य जिसकी कुल आबादी ही 5 लाख है, वहॉ नौ मेडिकल कॉलेज हैं और उत्तर प्रदेश जैसा महाराज्य जिसकी आबादी 19 करोड़ के करीब है, वहॉ सिर्फ 22 मेडिकल कॉलेज ही हैं! यह वही परम्परा है जिसके चलते एम.सी.आई.जैसे सरकारी संस्थान भी सरकार की योजनाओं को ही पलीता लगाते रहते हैं। मेडिकल पाठयक्रमों में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक छात्र से अगर यह अनुबंध करा लिया जाय कि पढ़ाई पूरी होने के बाद उसे अनिवार्य रुप से 5साल तक गॉवों की सेवा करनी होगी तो भी समस्या काफी हद तक हल हो सकती है,लेकिन सवाल सरकार की इच्छाशक्ति का है। केंद्र सरकार के हाथ खड़े कर देने के बाद यह सोचना कि इसे राज्य सरकारें और मुस्तैदी से कर लेंगीं, हास्यास्पद ही लगता है।

? सुनील अमर