संस्करण: 14  नवम्बर- 2011

अंदरूनी लड़ाई से भाजपा को तीन राज्यों में नुकसान

पंजाब में पार्टी हार का सामना कर सकती है

? बी.के.चम

               पश्चिमी भारत के राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के तारे गर्दिश में दिखाई पड़ते हैं। पंजाब, जम्मू और कश्मीर व हिमाचल प्रदेश में गुटबाजी ने पार्टी का बुरा हाल कर रखा है। पंजाब में तो पार्टी की हालत बहुत ही खराब है। भाजपा वहां खुद सरकार में है और सरकार की नीतियों के कारण भी उसका शहरी समर्थक वर्ग उससे नाराज चल रहा है। गौरतलब है कि पंजाब और हिमाचल में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। पंजाब में चुनाव साल के शुरुआती महीनों में होंगे, तो हिमाचल प्रदेश में साल के अंतिम महीनों में।

               जम्मू और कश्मीर में तो पार्टी दो फाड़ हो चुकी है। वहां विधानसभा में उसके 11 विधायक हैं, जिनमें 7 से विद्रोह कर दिया। उनके विद्रोह के कारण पार्टी ने उन्हें निलंबित भी कर रखा है। उन्होने विधान परिषद चुनाव में पार्टी के आदेशों के खिलाफ काम किया था।

               आज भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में माहौल बन रहा है। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ जन चेतना यात्रा पर हैं,लेकिन इसी भ्रष्टाचार के कारण पश्चिम के तीन राज्यों में पार्टी की हालत खस्ता हो रही है। देश में भ्रष्टाचार की समस्या को मिटाने के लिए रथ पर सवार आडवाणी की पार्टी खुद भ्रष्टाचार की शिकार हो गई है।

               सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार से ग्रस्त और आपसी गुटबाजी से कमजोर हो रही भाजपा को इन राज्यों में नितिन गडकरी राहत दिला पाएंगे? यहां गुटबाजी चरम पर है। क्या गडकरी गुटों की लड़ाई पर लगाम लगा पाएंगे? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि कर्नाटक में मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार के मसले पर खुद नितिन गडकरी ने अपनी छवि खराब की।

                उन्होंने तब के मुख्यमंत्री येदुरप्पा पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में कहा था कि श्री येदुरप्पा ने जो किया, वह गैरकानूनी तो नहीं था, भले वह अनैतिक हो। इस पर उनका मजाक उड़ा था। मुख्यमंत्री के जिस भ्रष्टाचार को वे गैर कानूनी नहीं बता रहे थे, उसी के कारण येदुरप्पा को मुख्यमंत्री का पद भी छोड़ना पड़ा और जेल भी जाना पड़ा।

                 गडकरी हिमाचल प्रदेश में भाजपा की गुटबाजी को अपने तरीके समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वे जो तरीका अपना रहे हैं,उससे उनके नेतृत्व पर ही सवालिया निशान खड़ा हो रहा है। उनकी शांति कराने की क्षमता भी सवालों के घेरे में आ रही है।

               पिछले सप्ताह शिमला में पार्टी की राज्य ईकाई की कार्यकारिणी की बैठक थी। उस बैठक में दो असंतुष्ट मंत्रियों और 4 विधायकों ने हिस्सा ही नहीं लिया। वे पूर्व मुख्यमंत्री भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शांताकुमार के समर्थक हैं। उन्होंने बाद में एक भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा का गठन कर लिया है। कहने को तो यह एक गैर राजनैतिक संगठन है, लेकिन यह वास्तव में पार्टी के खिलाफ एक समानांतर संगठन के रूप में अस्तित्व में आया है। इस मोर्चे में एक पूर्व स्पीकर, कुछ पूर्व मंत्री और अनेक विधायक शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये भ्रष्टाचार विरोधी नेता मुख्यमंत्री प्रेम कुमार घूमल को राज्य के भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

               गडकरी की नेतृत्व क्षमता पर इसलिए सवाल खड़ा हो रहा है, क्योंकि उन्होंने असंतुष्टों के खिलाफ कार्रवाई करने की चेतावनी उनके आरोपों की जांच किए बिना ही जारी कर दी है। असंतुष्ट जो आरोप लगा रहे हैं, उसकी पहले जांच होनी चाहिए, लेकिन श्री गडकरी अपने स्तर से किसी प्रकार की जांच की जरूरत महसूस नहीं करते। बिना जांच के वे कह रहे हैं कि आरोप निराधार हैं और उनके कोई सबूत नहीं हैं।

               पंजाब में जाकर भी श्री गडकरी ने गलत बयानबाजी की। भाजपा के तीन मंत्रियों को सरकार से बाहर किया जा चुका है। उनमें से दो तो भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद ही सरकार से बाहर किए गए। पर भाजपा के राष्ट्रीय अधयक्ष बयान दे रहे हैं कि किसी मंत्री को भ्रष्टाचार के कारण नहीं हटाया गया, बल्कि सांगठनिक कारणों से ही उन्हें हटाया गया।

               लुधियाना की एक बैठक में श्री गडकरी ने कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 23 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 में विजय पाई थी और इस बार उनकी पार्टी 23 में से सभी 23 सीटों पर विजय पाएगी। इस तरह की बयानबाजी उनके लिए दिन में सपना देखने के बराबर है, क्योंकि भाजपा की अब वह ताकत राज्य में नहीं रही, जो 2007 के चुनाव के समय थी। राज्य के कुछ पार्टी नेताओं का तो मानना है कि शायद पार्टी के जीतने वाले उम्मीदवारों की संख्या दहाई अंक मे भी नहीं पहुंच सके।

 
? बी.के.चम