संस्करण: 14  नवम्बर- 2011

और कितने ब्रेविक ?

यूरोप में अतिवादी दक्षिणपंथ का उभार

? सुभाष गाताड़े

               तीन माह पहले नार्वे में ब्रेविक नामक दक्षिणपंथी आतंकी ने नार्वे की राजधानी ओस्लो में 76 लोगों को मार कर यूरोप में आकार ले रहे नवनात्सी आतंकवाद की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। फौरी तौर पर यही कहा गया था कि यूरोप में अतिवादी दक्षिणपंथ अभी भी हाशिये पर है। मगर अब तथ्य सामने आ रहे हैं कि हालात ऐसे बन रहे हैं कि अतिवादी दक्षिणपंथ मुख्यधारा का हिस्सा बन रहा है।

               पिछले दिनों ब्रिटेन के थिंकटैंक कहे जानेवाले 'डेमोस' नामक समूह द्वारा इस मसले पर जारी की गयी एक रिपोर्ट इस बात को उजागर करती है कि किस तरह समूचे यूरोप में अतिवादी दक्षिणपंथ उभार पर है। इस किस्म के पहले अध्ययन में पता चला है कि इसका शिकार नयी पीढ़ी के युवा, जो फेसबुक आदि सोशल नेटवर्किंग साइटस पर भी अत्यधिक सक्रिय रहते हैं, वे राष्ट्रवादी और आप्रवासी विरोधी समूहों का हिस्सा बन रहे हैं। (गार्डियन, 7 नवम्बर 2011)

               प्रस्तुत अध्ययन के लिए डेमोस ने यह तरीका अपनाया कि उसने फेसबुक ग्रुप्स के पन्नों पर विज्ञापन देकर ग्यारह देशों में फैले 14 अलग अलग पार्टियों एवं संगठनों के 10 हजार अनुयायियों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह उनकी विस्तृत प्रश्नसूची का उत्तर दें। अध्ययन के मुताबिक समूचे महाद्वीप में उग्र राष्ट्रवादी भावनाएं युवाओं, खासकर पुरूषों में हावी होती दिख रही है। वे अपनी सरकारों और यूरोपीय यूनियन के प्रति काफी आलोचनात्मक राय रखते हैं, उनके सामान्य डर सांस्कृतिक पहचान, विशेषकर आप्रवासी -जिसमें इस्लामी प्रभाव के प्रसार की चिन्ता भी शामिल है - के प्रति दिखते हैं।

               डेमोस का यह अध्ययन जुलाई और अगस्त में सम्पन्न हुआ। फेसबुक के अपने विज्ञापन उपकरणों के माध्यम से डेमोस को 14अलग अलग संगठनों के चार लाख पचास हजार समर्थकों से जुड़े तथ्यों का निष्कर्ष निकालना मुमकिन हुआ। इनमें से दो तिहाई 30 से कम उम्र के थे, तीन चौथाई पुरूष थे और औसत की तुलना में बेरोजगार होने की उनकी सम्भावना ज्यादा थी। जानकारों के मुताबिक अगर बीसवीं सदी की शुरूआत में अतिवादी दक्षिणपंथी पार्टियों को एक दूसरे से जोड़नेवाला पहलू था एण्टीसेमिटिजम अर्थात यहुदीविरोध तो इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में यह सूत्रा बना है इस्लाम का डर। अध्ययन बताता है कि अप्रवासी विरोधी एवं इस्लामविरोधी इन विचारों एवं संगठनों का प्रभाव फ्रांस,इटली और आस्ट्रिया जैसे पारम्पारिक आधारक्षेत्रों के अलावा पारम्पारिक तौर पर उदार माने जानेवाले नेदरलैण्ड एवं स्केनण्डेनेविया में फैला है और आठ मुल्कों में उनके अपने संसदीय ब्लाक भी मौजूद हैं।

               जब प्रतिभागियों से पूछा गया कि वह कौनसी वजहें थी जिनके चलते वह इन विचारों की आकर्षित हुए तो लोगों ने आर्थिक चिन्ताओं को कमबल्कि इस्लाम और अप्रवास को अधिक जिम्मेदार बताया। कुछ ने दिए जवाब बहुत भोंडे थे -'वे लोग आकर हमारे सुन्दर देश को तबाह कर रहे हैं। उनके इतने सारे बच्चे होते हैं जिन्हें वह ठीक से पालते भी नहीं हैं।'' कुछ का कहना था कि इस्लाम जनतंत्र के प्रति प्रतिकूल है, जिस बात को पार्टी फॉर फ्रीडम के नेता गीर्ट विल्डर्स जुबां देते हैं। आज की तारीख में छह साल पहले बनी उसकी पार्टी देश की संसद में तीसरे नम्बर पर है।

                 यह बात भी देखने में आती है कि 9/11 के बाद 'आतंकवाद के खिलाफ युध्द' के नाम पर अमेरिका की तर्ज पर यूरोप की तमाम सत्ताधारी पार्टियों ने इस्लाम धार्म या इस्लाम को माननेवालों को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। मुख्यधारा में हावी इस विमर्श का इन दक्षिणपंथी संगठनों ने बखूबी फायदा उठाया। यह कहने में संकोच नहीं किया जा सकता कि उन्होंने जो 'इस्लामविरोधी' विमर्श तैयार किया, उस पर इन अतिवादी संगठनों को अपनी बातें आगे बढ़ाने में सहूलियत हुई।

                यूरोप में नस्लवाद की राजनीति के विशेषज्ञ और हाल में प्रकाशित किताब 'द क्राइसिस आफ मल्टीकल्चरालिजम'के सहलेखक गावन टिटले लिखते हैं कि मुख्यधारा की यह पार्टियां इन समूहों के उभार की जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं जिन्होंने इस्लाम के डर को कबूल किया। किस तरह इन पार्टियों की भाषा एवं रूखने इनके लिए रास्ता सुगम किया इसकी चर्चा करते हुए वह बताते हैं कि उन्होंने उदारवादी मूल्यों की रक्षा - जेण्डर से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - की बात की और इस बात पर जोर दिया था कि असली समस्या इस्लाम में ही हैं।

               मालूम हो कि जतिवादी दक्षिणपंथ के उभार की प्रस्तुत परिघटना को आसानी से किसी खांचे में फिट नहीं किया जा सकता क्योकि वह अलग अलग ढंग से कार्यरत रहते हैं। एक तरफ है फ्रांन्स का नेशनल फ्रण्ट, जो राज्य की सियासत में विगत 25 सालों से सक्रिय है और अगले साल के राष्ट्रपति पद के चुनावों में अहम प्रतिद्वंदी है, जबकि दूसरे छोर पर कुछ सौ समर्थकों के साथ सड़कों पर हंगामा करनेवाले इंग्लिश डिफेन्स लीग के सदस्य है या फ्रान्स का मुस्लिम विरोधी ब्लॉक 'इण्डटिटेअरे' है, जिसकी खासियत है सूअर से बना ''आयडेंटीटी सूप'' बेघरो को पीलाना। इनमें कई ऐसे स्केनण्डेनेवियाई समूह भी शामिल कहे जा सकते हैं जो कल्याण के मामले में काफी वाम रूझानोंवाले दिखते हैं जबकि हर किस्म के बहुसांस्कृतिकवाद के कट्टर विरोधी हैं।

                 प्रस्तुत रिपोर्ट पर बात करते हुए ब्रिटेन के पूर्वविदेश सचिव डेविड मिलिबेण्ड - जिनके अपने माता पिता को यहुदी होने के नाते नात्सी यूरोप से भागना पड़ा था - कहते हैं कि यह रिपोर्ट दरअसल दक्षिणपंथी उग्रवाद को लेकर व्याप्त एक किस्म की आत्ममुग्धता की महत्वपूर्ण काट है। इसका निचोड यही है कि भूमण्डलीकरण के प्रति असन्तोष वाम की राजनीति के साथ दक्षिण की राजनीति को भी तेज कर सकता है। जहां 'वाल स्ट्रीट कब्जा' वाले आन्दोलन के जरिए हम उसे वाम पक्ष से रूबरू हो रहे हैं,वहीं उग्रवादी दक्षिणपंथ हमारी आंखों से दूर चुपचाप अपने आप को संगठित कर रहा है।

               इटली में आकार लेता 'कासापाउण्ड' का आन्दोलन इसी उग्र दक्षिणपंथ का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। प्रस्तुत संगठन के इटली में 5 हजार सदस्य है, जिसके प्रति 15 स्थानीय पार्षद प्रतिबध्द हैं और उसे रोम शहर के चन्द अधिकारियों का अच्छा खासा समर्थन भी हासिल है। यहां तक कि यहां के मेयर एलेमान्नो, खुद एक पूर्वफैसिस्ट रहे हैं। इटली के पुराने किस्म के सड़क पर मारने-मरने के लिए तैयार फासीवादियों से यह अपने आप को अलग करता है। कासापाउण्ड के रोम कार्यालय में 18 परिवार रहते हैं, जो सरकार की पुरानी सम्पत्ति है, जिस पर इस समूह ने 2003 से कब्जा जमाया है। समूह की तरफ से प्राकृतिक आपदा के वक्त स्वयंसेवकों को भेजा जाता है, इसके अलावा वह कर्ज का शिकार होनेवाले लोगों के लिए एक हेल्पलाइन भी चलाता है। अब जहां तक आर्थिक मामले हैं वह बिल्कुल 'मुसोलिनी' के अनुयायी हैं। उनके मुताबिक कम्युनिकेशन्स,  यातायात, ऊर्जा और स्वास्थ्य का नए सिरे से राष्ट्रीयकरण करना होगा और राज्य को मकान बना कर गरीबों को देने होंगे, मगर जहां तक आप्रवासियों का सवाल है, वह उसे रोकना चाहते हैं।


? सुभाष गाताड़े