संस्करण: 14  नवम्बर- 2011

खुद गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ संघ परिवार

अन्ना के सहारे सत्ता पर कब्जा करना चाहता है

? एल.एस.हरदेनिया

               अब तो यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान पूरी तरह से संघ परिवार की बैसाखियों पर चल रहा है। कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक ने कहा था कि अन्ना हजारे के आंदोलन को संघ का मैदानी समर्थन प्राप्त था। उसके अतिरिक्त अभी हाल में भारतीय जनता पार्टी के अधयक्ष नितिन गड़करी ने यह दावा किया कि यदि हमारी पार्टी का समर्थन नहीं होता तो अन्ना का आंदोलन टायं-टायं फिस्स हो जाता। संघ के दावे के संदर्भ में स्वामी रामदेव ने कहा कि यह वास्तविकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हर तरह का सहयोग अन्ना हजारे को प्राप्त था। इस बात को अन्ना हजारे को स्वीकार करना चाहिए। इस तरह तो स्वामी रामदेव को भी संघ का आभार मानना चाहिए। यहां यह स्मरणीय है कि जिस बड़े पैमाने पर रामलीला मैदान में प्रबंध था स्पष्ट है उसके पीछे किसी मजबूत संगठन का हाथ था। जो हजारों लोग रामलीला मैदान में एकत्रित थे उन्हें चाय'नाश्ता और खाना नियमित रूप से प्राप्त हो रहा था।

               वैसे सिध्दांत में किसी को इस बात पर एतराज नहीं होना चाहिए कि किसी आंदोलन या अभियान को संघ का समर्थन प्राप्त है। यह अपने आप में आपत्ति का आधार नहीं होना चाहिए। परंतु अनुभव यह बताता है कि संघ जिस भी आंदोलन का हिस्सा बनता है उस पर वह पूरा कब्जा करना चाहता है और उसका उपयोग अपनी राजनीतिक शाखा (भारतीय जनता पार्टी) को सत्ता में लाने के लिए करता है। इस प्रवृत्ति का बड़े पैमाने पर अनुभव उस समय हुआ जब संघ ने 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को समर्थन दिया था। इस आंदोलन के बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस की हार हुई। यहां तक कि स्वयं इंदिरा गांधी भी चुनाव हारी। चुनाव के बाद देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार ने सत्ता सम्हाली। सत्ता में आने के बाद आंदोलन में शामिल सभी दलों ने अपने अस्तित्व को समाप्त कर दिया। संघ से नियंत्रित जनसंघ ने भी ऐसा किया। परंतु जनसंघ से जुड़े लोगों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपना नाता नहीं तोड़ा। जनता पार्टी में शामिल अन्य दलों ने यह मांग की कि जनसंघ के सदस्यों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपना संबंधा छोड़ना चाहिए। विशेषकर समाजवादियों ने यह मांग काफी जोरदार तरीके से उठाई। प्रखर समाजवादी नेता मधु लिमये ने अपने तर्कों को लेकर अभियान भी चलाया पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ टस से मस नहीं हुआ। अंतत:संघ के हठी रवैये के कारण जनता पार्टी की सरकार ही धाराशायी हो गई और पार्टी में आये बिखराव का जबरदस्त लाभ कांग्रेस को मिला और मात्र तीन वर्ष के अंतराल से कांग्रेस और इंदिरा गांधी के हाथ में पुन: सत्ता आ गई।

               परंतु जितने समय गैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में रही संघ ने पूरी तरह उसका लाभ उठाया। लगभग ऐसा ही अनुभव राम मंदिर आंदोलन का हुआ। राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर संघ परिवार ने सत्ता पर कब्जा तो कर लिया परंतु आंदोलन के मुख्य उद्देश्य यानि राम मंदिर के निर्माण की दिशा में एक कदम भी नहीं उठाया। इस तरह एक बार फिर संघ परिवार ने उन सबको और विशेषकर इस देश की रामभक्त जनता के साथ धोखा किया जिन्होंने आंख मूंदकर शर्तविहीन समर्थन राम मंदिर आंदोलन को दिया था। अब फिर संघ परिवार का इरादा इस समय आम जनता के मन में समाज,राजनीति व प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरूध्द आक्रोश का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने का है। यहीं कारण है कि आम लोगों ने अन्ना हजारे के आंदोलन को समर्थन दिया। परंतु बड़ी चालाकी से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को कांग्रेस विरोधी आंदोलन का रूप दे दिया गया। जिस भाषा में स्वयं अन्ना और उनके समर्थक बोल रहे हैं उससे लगता है कि अन्ना के आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य भ्रष्टाचार को समाप्त करना नहीं है वरन् कांग्रेस को चुनाव में हराना है। अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के हाथ से सत्ता छीनकर संघ परिवार की ताजपोशी करना है। अन्ना टीम का कहना है कि यदि हमारे द्वारा तैयार किये गये जनलोकपाल विधेयक को पारित नहीं किया गया तो हम चुनाव में कांग्रेस के विरूध्द प्रचार करेंगे। अन्ना टीम भलीभांति जानती है कि उनके द्वारा तैयार किया जनलोकपाल विधेयक उसी रूप में पारित नहीं हो सकेगा। चँकि ऐसा संभव नहीं होगा इसलिए हमारा कांग्रेस विरोधी प्रचार जारी रहेगा। चूँकि अन्ना हजारे और उनकी टीम ने यह रास्ता चुना है इसलिए यह स्पष्ट है कि वे संघ परिवार के इशारे और शायद यह कहना ज्यादा अच्छा होगा कि संघ परिवार के दबाव में ऐसा कर रहे हैं। क्या अन्ना हजारे और उनकी टीम के सदस्य यह नहीं जानते हैं कि जहां तक भ्रष्ट आचरण का संबंध है भाजपा इस मामले में कम नहीं है। कर्नाटक में जो कुछ हुआ वह स्पष्ट करता है कि संघ परिवार भी सत्ता का उपयोग काले धन की कमाई करने में करता है। कर्नाटक की भाजपा मंत्रिपरिषद के अनेक सदस्य भ्रष्ट आचरण में गले तक डूबे थे। कर्नाटक के दो मंत्री, जिन्हें रेवी बंधुओं के नाम से जाना जाता है, ने राष्ट्र की मूल्यवान संपत्ति (लोह अयस्क) का गैर-कानूनी ढंग से निर्यात किया था और उनकी इस गैर-कानूनी हरकत को संपूर्ण व्यवस्था मूक होकर देखती रही। संघ परिवार के द्वारा प्रशिक्षित नेता पूर्व में भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाये गये है। मध्यप्रदेश में सन् 1977के चुनाव के बाद कैलाश जोशी मुख्यमंत्री बने। मात्र छ: महीने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया और वीरेन्द्र कुमार सकलेचा मुख्यमंत्री बने। थोड़े अंतराल में उनके विरूध्द भ्रष्ट आचरण के आरोप लगे। बाद में संघ परिवार ने भी उनसे पल्ला झाड़ लिया। उसके बाद भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों कैमरे ने पकड़ा। इसी तरह का आचरण दिलीप सिंह जूदेव का भी सामने आया। अभी हाल में मध्यप्रदेश की सरकार के वरिष्ठ मंत्री एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने यह कहा कि देश की सभी राज्य सरकारों में से केवल गुजरात की  सरकार के विरूध्द भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि मध्यप्रदेश समेत अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी भ्रष्टाचार व्याप्त है। कुल मिलाकर यह एक वास्तविकता है कि जो भी राजनीतिक पार्टी सत्ता में है या रही उसके विरूध्द कभी न कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। इसका आशय यह है कि यदि भारत को भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाना है तो उस व्यवस्था पर चोट करनी होगी जो प्रशासन में भ्रष्टाचार को पोषित करती है। दु:ख की बात है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम इन मुद्दो पर चिन्तन तक नहीं कर रही है। साफ है कि अकेले लोकपाल की संस्था की निर्मिति से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा। आवश्यकता है एक गहन चिंतन की और दीर्घ कालीन योजना की। अभी तक जिस ढंग से अन्ना टीम का अभियान चल रहा है उससे यह कतई नहीं लगता है कि उनका इरादा भ्रष्टाचार को जड़ मूल से समाप्त करना है। शायद उनका मुख्य एजेन्डा कांग्रेस के हाथो से सत्ता छीनना है।

? एल.एस.हरदेनिया