संस्करण: 14  नवम्बर- 2011

  तो मुझे बताईये, किसका पतन हो रहा है?

?       बद्री रैना

               केन्द्र में यू.पी.ए. सरकार को बदनाम करने, नुकसान पंहुचाने तथा उससे सत्ता छीनने के लिये घरेलू और विदेशी ताकतों द्वारा प्रायोजित अभियान ने दो सिध्दान्तों पर काम किया है:एक यह कि प्रधानमंत्री स्वयं में कोई निर्णय नही ले सकते,उन्हे देश को सुधार के अगले युग में ले जाने से सोनिया गाँधी और समाजसेवी व सिविल सोसायटी पर प्रहार करने वाले उनके लोगों द्वारा रोका जा रहा है। दूसरा यह कि यदि वे ऐसा नही कर रहे है तो यह अवश्य प्रचारित होना चाहिये कि वर्तमान केन्द्र सरकार आजादी के बाद की सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार है।

 

               यह निश्चित रूप से कार्पोरेट एजेण्डा है जिसे कट्टरपंथी हिन्दूवादी संगठनों ने समर्थन दिया व कार्पोरेट जगत के मालिकों द्वारा संचालित 24घंटे चलने वाले टी.वी.चैनलों ने भारी समर्थन किया,वह भी एक ऐसे मुद्दे पर जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पाखण्डी लोग भ्रष्टाचार को रोकने, उस पर नजर बनाये रखने और कथित चैनलों द्वारा आयोजित बड़ी-बड़ी बहसों में विरोधा के स्वर उठा रहे हैं।

 

               इन्होने कुपोषण से पीड़ित, बेरोजगार, आवासहीन, पेयजल से वंचित, स्वच्छता रहित, स्वास्थ्य सुविधाओं से रहित, न्याय से वंचित भारत के लोगों की ओर से इन बहसों में कोई आवाज नही उठाई। आज कम से कम 10 में से सात भारतीयों की निर्दयतापूर्वक हँसी उडाई जा रही है तथा ये लोग देश के सामने घड़ियाली ऑंसू बहाने का दिखावा करके लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे है।

 

               और जैसा कि द्वितीय विश्वयुध्द के पूर्ववर्ती इतिहास में महीनों तक कार्पोरेट तानाशाही छाई रही। उस समय ''भ्रष्टाचार'' ही एक मात्र नारा और प्लेटफार्म था जिस पर सभी लोग जिसमें आदतन भ्रष्ट भी शामिल थे, उन्हे लाया गया। उन्होने कुशल छद्म चाल चली जिसमें कहा गया कि भ्रष्टाचार एकमात्र सत्ताधारी पार्टी में ही समाया हुआ है! अतएव सत्ताधारी दल को अपने निर्धारित समय 2014 के पूर्व ही देशहित में सत्ता से हटा देना चाहिये।

 

                 (''ऑक्युपाइ वॉल स्ट्रीट'' अर्थात अमेरिका में कार्पोरेट सेक्टर के विरूध्द चल रहे आंदोलन'' में क्या कहा जा रहा है? इस आंदोलन पर गौर कीजिए कि आम अमेरिकन अब पूॅजीवाद से नही अपितु कार्पोरेट तानाशाही से लड़ रहे हैं। जबसे वहाँ पूॅजीवाद को ''प्रतियोगिता'' कहा गया है, तब से वहाँ एकाधिकारिक लूट के लिये फासीवादी बैंकिंग और वित्तीय संस्थाओं द्वारा पूॅजीवाद को कार्पोरेट फासीवाद का रूप दिया जाने लगा है। अमेरिका जैसे कथित प्रजातांत्रिक राज्य में सरकार द्वारा आर्थिक मदद के पेकेज जनता को नही बल्कि बैंक और उद्योंगों को दिये जा रहे है।)

 

                 इसके साथ ही, इस आंदोलन में कुछ चौंका देने वाले अराजक तत्व और एक ताकतवर देश के कट्टर फासीवादी विचारधारा के समर्थक आपस में हाथ मिलाते प्रतीत हो रहे हैं। हाय! दोनों जैसा कि पहले से ही प्रमाणित है, दोनों का अपनी विवशता के कारण बनाया गया बहुत अल्पकालीन गठजोड़ है।

 

                इस प्रकार हमें कहा जा रहा है कि यू.पी.ए. सरकार पतन होने वाला है, सिर्फ इसलिये नही, कि उसे गिराने के लिये कोई कोई बाहरी ताकत काम कर रही है बल्कि वह तो अपने स्वयं के बोझ को नही सह पा रही है और स्वयं के विवादों और विरोधाभासों खासकर अपने न सुधारने योग्य भ्रष्ट चरित्र के कारण गिरने जा रही है।

               क्या यह बात महत्वपूर्ण नही है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद प्रथम सरकार हो सकती है जो राजनीतिक वर्ग और नौकरशाहों दोनों में ही भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने और भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने के लिये बहुआयामी वैधानिक एजेण्डा ला रही है? इसमें चुनाव सुधार और भूमि अधिग्रहण सुधार, संपत्ति के स्वामित्व के वर्तमान स्वरूप और संपत्ति के क्रय तथा विक्रय ,न्यायिक व्यवस्थाओं में सुधार और उससे भी ज्यादा औद्योगिक और कार्पोंरेट सेक्टर में छुपे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण शामिल है। जरा गंभीरता से विचार कीजिए?मीडिया में पेड न्यूज की प्रवृत्ति पर ध्यान दीजिये जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दोहरे मापदण्डों को दर्शाता है। इस पर यह सरकार नियंत्रण करने के प्रयास कर रही है और इसमें यह भी जोडना होगा कि व्हिसल ब्लोअर संरक्षण कानून भी बहुत जल्दी बनने वाला हैं। हो सकता है कि यह सब दबाव में किया जा रहा हो किन्तु एन.डी.ए. सरकार ने तो ऐसा करना तो दूर, इस बारे में कभी सोचा सोचा भी नही, जब उसने 1998 से 2004 तक देश पर शासन किया। यह याद रखना भी अच्छा होगा कि वह यू.पी.ए. का ही कार्यकाल था जिसने देश को पहला सूचना का अधिकार दिया- जो सरकार और उसकी एजेंसियों के लिये भारी सिरदर्द बन गया है। प्रजातांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिये उठाये गये कदम अक्सर उन्ही लोगों के लिये सहायक होते है जिन्होने ये कदम उठाये है।

               सम्राट अशोक, जिसने कलिंग युध्द में लाखों लोगों का कत्ल कर दिया किन्तु अंत में शांति की राह पर चल पड़ने के कारण 2000 साल बाद भी वह प्रशंसा का पात्र बना हुआ है, किन्तु इससे भिन्न यू.पी.ए. सरकार में कुछ घोटालों के प्रकाश में आने के बाद वह निरंतर विपक्ष के आसान निशाने पर है जो कह रहा है कि मनमोहन सिंह सरकार घोटालों के लिये जानी जाती है। किन्तु सरकार के उन महत्वपूर्ण कदमों की उपेक्षा नही की जा सकती जो उसने भ्रष्टाचार के विरूध्द उठाये। यह सरकार देश में भ्रष्टाचाररोधी कानून लाई है और उस वर्ग के लिये वफादार बनी हुई है जो अभी तक प्रजातांत्रिक संस्थाओं जैसे- पंचायत और ग्रामसभाओं आदि में आर्थिक और प्रशासकीय शक्तियों से वंचित है।

               और अब, पहले से ही स्पष्ट है कि चाहे यू.पी.ए. सरकार उसके अपने कर्मों के कारण गिरे या न गिरे, किन्तु उसे धक्का मारने के लिये सामने आ रहे ढोंगी साधुओं की जरूर बखिया उधड़ेगी क्योंकि इन विविध पाखण्डियों और उनके मोर्चे को अब लोगों ने उन्हे अच्छी तरह देख लिया है। जरा इन्तजार कीजिए।

               अडवाणी की ''भ्रष्टाचार विरोधी'' टोयोटा मौज-मस्ती

                  जैसा कि भाजपा में प्रथम दिन से एकमत और स्पष्ट रूप से यह सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है कि एल.के. अडवाणी की रथ यात्रा का भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से कम ही लेना-देना है बल्कि, इसका अधिक लेना-देना आर.एस.एस. और उनकी अपनी पार्टी से है, वे चाहे इसे पसंद करने या न करें वे यह कहते हुये देखे जा रहे है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से अभी भी मैं ही सबसे उपयुक्त हूँ।

                 जैसा कि आप अधिक सोच सकते है कि गाँधी नगर में मोदी सत्तासीन है और वे चुनाव में अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये उनके प्रति जितना अधिक कृतज्ञ हो सकते है और उनके 2002के घृणित कार्यों के लिये उनका लोगों में बचाव कर सकते है,कर रहे है। आप और हम जानते है कि अडवाणी जी को उनके ही लोग उन्हे भयभीत और कॉपते हुये देख रहे है और वे सभी भारतीय भी जो भारत के धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक प्रजातंत्र के प्रति निष्ठा महसूस करते हैं।

                 क्या अडवाणी जी एक राजनेता की भॉति भ्रष्टाचार के विरूध्द संघर्ष कर रहे है, शायद नही क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो क्या उन्हे अपनी यात्रा की शुरूआत या तो कर्नाटक या उत्तराखण्ड से नही करनी चाहिये थी--जहाँ उनकी ही पार्टी और सरकारें भ्रष्टाचार और लूट में सिर तक डूबी हुई है?

              सोचिये कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एकबार मध्यप्रदेश के एक क्षेत्र में चुनाव प्रचार करते समय अपनी ही पार्टी के व्यक्ति को वोट नही देने के लिये मतदाताओं से कहा था क्योंकि वह प्रत्याशी भ्रष्ट था! आप इस पर भलीभॉति विश्वास करते है, क्योंकि यह बात रिकार्ड में है।

               एक जमाने में राजनेता अनुकरणीय था। किन्तु जैसा कि हमने कहा कि एन.डी.ए. शासन (1998-2004) के दौरान भारी भ्रष्टाचार पनपा और घोटाले हुये, एक कार्पोरेट प्रेमी, बाजार के सिध्दान्तों पर काम करने वाली पार्टी भाजपा (अपने चालाक वाणिज्यिक मतदाता आधार से जो व्यवसायी वर्ग है जिनमें से अधिकांश के धन का लेखा मुश्किल से ही होता है) के अडवाणी जी किस नैतिकता और पारदर्शिता की बात करते है?

               भ्रष्टाचार के विरूध्द जनजागरण अभियान के नाम पर लोगों में सहानुभूति पैदा करने निकली अडवाणी जी की यात्रा मध्यप्रदेश में सिर्फ एक रही, जहाँ पर उनकी अपनी ही पार्टी की भ्रष्ट सरकार है।

               सतना शहर में उनकी रथ यात्रा (टोयोटा यात्रा) में शामिल होने के लिये 13 अक्टूबर को थोड़े से लोग थे, तब एक दिन पहले उनकी पार्टी की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई, संवाददाताओं और पत्रकारों को 500 और 1000 के नोटों से युक्त लिफाफे बाँटे गये! यह इसलिये किया गया कि जो भ्रष्टाचार के विरूध्द नही बोले थे, उन्हे यह टोकन देकर खुश किया जा सके। यद्यपि हिन्दी दैनिक ''नईदुनिया''एक पत्रकार ने इसके विरूध्द आवाज उठाई और उसी ने अपने अखबार में इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया। हम उसकी प्रशंसा करते है।

               यह घटना अडवानी और उनकी पार्टी के ईमानदारी के दावों से भिन्न है। स्पष्ट रूप से यह सब लोगों ने टी.वी. चैनलों पर देखा है जो दर्शाता है कि अब उनकी यात्रा और मकसद से पर्दा उठ गया है। हो सकता है कि उनका रथ आगे तक जाये, किन्तु यह एक लंगड़े आदमी द्वारा दोनों पैरों वाले अच्छे आदमी की भॉति चलने का नाटक करने की भॉति निरर्थक है।

               टीम अन्ना और आर.एस.एस.

              अन्ना हजारे साधारण व्यक्तिगत जीवन और आवश्यकताओं वाले एक अच्छे आदमी है। और वे ऐसे आदमी है जो बिना खाना खाये कुछ दिनों तक रह सकते है। किन्तु एक बार सेना में सेवा करने के बाद वे सैनिक अनुशासन से युक्त कठोर राष्ट्रवाद लाना चाहते है जो सिर्फ आर.एस.एस.के राष्ट्रवादी ढॉचे में सही बैठता है। उनकी राष्ट्रभक्ति उन भारतीय प्रजातांत्रिक संस्थाओं के साथ नही जो समय के साथ तथा कई परीक्षण और गलतियों से सबक सीखकर विकसित हुई है की बल्कि एक काल्पनिक राष्ट्र के प्रति है जो अस्तित्व में ही नही है।

               उनकी कल्पना का राज्य गाँधी के ग्राम स्वराज के प्रतिमान की भॉति नही हो सकता जहॉ पर कठोर परिश्रम, धर्मनिरपेक्ष मानववाद और बौध्दिक उदारता का शासन हो। और जहॉ दण्ड दण्डात्मक नही है जैसा कि अन्ना के गॉव रालेगण सिध्दि में बल्कि नैतिक सुधार और आत्म अवलोकन के लिये है।

               प्रशान्त भूषण के भारतीय संघ विरोधी, राष्ट्रविरोधी बयानों के की निश्चय ही तीव्र आलोचना होनी चाहिये। और जहाँ तक मैं सोचता हूॅ उनकी ही टीम की किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल और यहाँ तक कि संतोष हेगड़े भी। इनमें से कोई भी कश्मीर पर प्रशान्त भूषण की बात का समर्थन नही कर सकते और न ही भारतीय प्रजातंत्रिक व्यवस्था पर उनके विचारों का।

               टीम अन्ना द्वारा कांग्रेस विरोधी एजेण्डा को लेकर चलना वह भी तब जब उसके एक सदस्य  जस्टिस हेगड़े जो कर्नाटक में लोकायुक्त थे और उनका कर्नाटक की भाजपा सरकार के साथ भष्टाचार का सबसे ताजा अनुभव रहा है। उनके येदुइरप्पा मंत्रीमण्डल पर दिये गये बयान के बाद यह बात गले नही उतरती कि कांग्रेस ही भ्रष्टाचार का घर है।

               अन्ना के स्वयं के बारे में क्या? वे अपने आंदोलन में आर.एस.एस. से खुला समर्थन प्राप्त कर रहे है और जिसका उनके पत्राचार में भी रिकार्ड है और मैदान में भी वह दिखाई दे रहा है। उनका कांग्रेस के चाणक्य (दिग्विजय सिंह) के साथ कौनसा संबन्ध है जो सारे मुश्किल भरे और कठोर प्रश्न कर रहे है। जैसे उदाहरण के लिये, ''अन्ना हजारे आर.एस.एस. के समर्थन को स्वीकार करने में क्यों संकोच कर रहे है? अन्ना यह जानते है कि यदि वे स्वीकार करते है तो उनकी आलोचना होगी और नही करते है तो भी। ऐसी स्थिति में मौन व्रत से अच्छी रणनीति क्या हो सकती है!''

               सहयोग के लिये धन्यवाद देने के बजाय जैसा कि उन्हे करना चाहिये आप उनसे रिश्ते को ही स्वीकार नही कर रहे है। पहले से ही यह कहा जा रहा है कि चाणक्य (दिग्विजय सिंह) जो कह रहे है वह सिर्फ उन्हे बदनाम करने के लिये है, और इसलिये उन्हे पागलखाने भेज देना चाहिये। अन्ना आर.एस.एस.की नजर में मुश्किल से ही अच्छे हों सकते है। अन्तत: उन्हे या किसी और को भी यह क्यों सोचना चाहिये कि उनका आर.एस.एस. के साथ संबंध उनकी छवि को खराब करेगा?

               सचमुच, आर.एस.एस. के सुरेश जोशी का ताजा बयान (जो अन्ना को पूर्व में अपने समर्थन का पत्र भेज चुके है) आघात से भरा हुआ है क्योंकि यह अन्ना का आर.एस.एस. से रिश्तों और उसके सहयोग को नकारने वाला कृतघ्नता से भरा हुआ प्रयास है। (कृपया 16 अक्टूबर का द हिन्दू अखबार देखें) यह निश्चय ही आर.एस.एस. के लिये चिन्तन की बात है कि इतना बड़ा सामाजिक कार्यकर्ता जो संघ के साथ काफी निकटता से जुड़ा हुआ है, वह संघ से अपने रिश्तों को स्वीकार करने को मुश्किल पा रहा है।

               इन सबको लेकर और अधिक आलोचनाओं की आशंका थी, अतएव अन्ना को लगा कि जो भी जन लोकपाल पर प्रश्न करे उसे भ्रष्टाचार का पक्षधार घोषित कर दिया जाना चाहिये और उसका बहिष्कार किया जाना चाहिये। अथवा यह कि संसद भ्रष्टाचारियों से भरी हुई है उसे अपनी प्रक्रियाओं, विशेषाधिकारों, संवैधानिक अधिकारों को जनता की इच्छा को देखते हुये छोड़ देना चाहिये। अगला प्रश्न कि वे ''लोग'' कौन है जो अन्ना की ओर से सोचा समझा विश्लेषण करते है, यद्यपि दलित, मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग संगठन, लगभग तीन चौथाई भारतीय- इस बात को लेकर खुलकर सामने आ गये यह स्वीकार करने के लिये कि अन्ना द्वारा संसद का अपमान निश्चय रूप से एक फासीवादी अधीरता को दर्शाता है। जिस संस्था (संसद) में तीन चौथाई भारतीयों के प्रतिनिधि हो उस संस्था की अनदेखी इसलिये नही की जा सकती कि चंद सामाजिक रूप से प्रभावशाली लोग ऐसा चाहते है।

               अब साम्प्रदायिक प्रश्न पर: आते है। मल्लिका साराभाई जैसा कोई व्यक्ति जो नरेन्द्र मोदी के सेक्टेरियन फासीवादी शासन का विरोध करने में एकदम सामने रही है और इस विरोध के कारण वह बहुत कुछ सह चुकी है, वह अन्ना द्वारा मोदी की विकास के प्रतीक के रूप में सराहना करना कैसे स्वीकार कर सकती है? इस बात का विचार किये बगैर कि मोदी का मानव अधिकारों का हनन करने के मामले में रिकार्ड कैसा रहा है?या इस बात की परवाह किये बगैर कि, उनके द्वारा जिस विकास का दावा किया जा रहा है उसका वास्तविक सच्चाई क्या है?  या पूर्ण रूप से भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा करने वाली गुजरात सरकार के बारे में जैसा कि सी.ए.जी. ने बताया कि वहाँ 26,000 करोड़ रूपये की अनियमितताएं और भ्रष्टाचार हुआ है जिसका श्रेय सरकार को जाता है।

                 इसलिये दोनों के बीच विरोधाभास स्पष्ट प्रतीत होता है। जहाँ एक ओर भाजपा और टीम अन्ना ढहती हुई दिखाई दे रही है वहीं सोनियाँ गॉधाी की कांग्रेस पार्टी शांतिपूर्वक और बिना शोर मचाये देश हित में अच्छे क़े काम कर रही है और उसके प्रयासों को असफल नही किया जा सकता।

 

? बद्री रैना