संस्करण: 14 जनवरी-2013

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हिन्दुत्व विमर्श में स्त्री

अपने समय में 'भागवतपुराण'

       पनी साफगोई के लिए मशहूर जनता दल यू नेता शिवानन्द तिवारी ने अपने हालिया वक्तव्य में संघ सुप्रीमो मोहन भागवत एवं मजलिस इत्तेहादिल मुसलमीन के नेता अकबरूद्दीन ओवेसी को ही एक ही सिक्के के दो पहलू कहा। उन्होंने कहा कि जहां संघ की विचारधारा हिन्दुओं में प्रचारित की जाती है और एमआईएम मुसलमानों के बीच जाता है,वहीं हम यहभी देख सकते हैं कि दोनों उसी विचारधारा के ही प्रतीक हैं,जिनमें कोई फरक नहीं है। वैसे जनाब भागवत अपने हाल के बयानों से -जिसमें वह स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों के लिए पश्चिमी संस्कृति को जिम्मेदार ठहराते हैं

?   सुभाष गाताड़े


भागवत जी और कैलाश विजयवर्गीय जी आप भी तो लक्ष्मण रेखा न लांघे

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत एवं मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने महिलाओं को जो परामर्श दिया और बलात्कार के जो कारण बताये हैं वे इन दोनों व्यक्तियों की पुरूषोचित प्रवृत्ति का प्रतीक हैं। डॉ.भागवत ने कहा कि बलात्कार इंडिया में होते हैं भारत में नहीं। यह कहना कठिन है कि डॉ.भागवत का इंडिया या भारत से क्या अर्थ है। डॉ.भागवत के इस विचार के दो अर्थ निकाले जा सकते हैं एक अर्थ हो सकता है प्राचीन भारत से।

? एल.एस.हरदेनिया


भागवत जी, कहां सुरक्षित हैं महिलाएं?

      राष्टीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में इस आशय का बयान दिया है कि ''बलात्कार भारत में कम और इंडिया में ज्यादा होते हैं।'' संस्कृति,सस्कार  के आधार पर अखण्ड भारत का सपना देखने का उनका अपना नजरिया हो सकता है परन्तु महिला अत्याचार के मामले में उनका दृष्टिकोण ठीक नहीं है। उनका यह दृष्टिकोण कई सवाल खडे करता है। क्या वे यह बता सकते है स्त्री कहॉ सुरक्षित है ?बेटियॉ कहॉ अपने बचपन को बैखोफ और बेफिक्र तरीके से जी सकती है ? कहॉ उनके सम्मान और सुरक्षा की पूरी गारन्टी है?

? अमिताभ पाण्डेय


संवेदनहीनता को रोकने की

कोई कोशिश क्यों नहीं

         दिल्ली की गैंग रेप पीड़िता 'दामिनी' के साथी के बयान सुन पढ कर इंसानियत शर्मसार हुयी है, किंतु हमने अपने नागरिकों के स्वार्थी होते जाते के कारणों को जानने और समझने की जरूरत महसूस नहीं की है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता,व्यक्तिगत सम्पत्ति,से भी आगे एकल परिवार ही नहीं दो व्यक्तियों के परिवार में भी सब कुछ साझा नहीं रह गया है। समाज अब राजनीतिक स्वार्थों के लिए मजबूत कर दिये गये जातिवाद तक सीमित होता भर दिख रहा है। सोशल मीडिया की सक्रियता,राजनेताओं द्वारा कुछ अन्य प्रमुख समस्याओं से धयान बँटाने के कारण दिये अतिरिक्त महत्व से और देश की राजधानी में केन्द्रित मीडिया के कारण यह घटना सुर्खियों में आ गयी है

? वीरेन्द्र जैन


हम बेशरम

       ''अब समय आ गया है कि हम सिर्फ राजनेताओं को कोसना बंद करें और स्वयं के भीतर झाँके।''

                विगत दिनों भाजपा ने न सिर्फ गडकरी को बचाया बल्कि उन्हे पुन: पार्टी अध्यक्ष बनाने का भी समर्थन किया। गडकरी जो शक्कर का व्यवसाय चलाते थे, ने अपने कार्पोंरेशन के लिये अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया जिसमें उनकी दर्जनों छद्म कंपनियाँ फर्जी पते और संदिग्ध डायरेक्टरशिप है। कहा जाता है कि उन्होने उन्ही कंपनियों से ऋण लिया जिनको उन्होने लोक निर्माण मंत्री रहते हुये ठेके दिये थे।

 ?   चेतन भगत


किसे भाते हैं

हनीसिंह के गाने ?

                  धर बीच पंजाबी मूल के गायक हनी सिंह अचानक सूर्खियों में आए हैं। यूं तो उनकी शोहरत पहले से रही है कि वे ऐसे अकेले गायक हैं जिनके एक गाने पर संगीतकार 70 लाख रूपए तक देने को तैयार होते हैं या यूटयूब पर डाउनलोड होने वाले हिन्दी-पंजाबी गीतों में भी वे आगे रहते हैं। इस बार यह सूर्खियां उनके इर्दगिर्द खड़े विवादों के चलते हैं। यह विवाद इस कदर बढ़ा दिखता है कि उनके गानों को लेकर उनके खिलाफ केस दायर हुए हैं, नए साल की पूर्वसंधया पर गुड़गांव के किसी बड़े होटल में आयोजित उनके कार्यक्रम को जनदबाव के चलते रद्द करना पड़ा है या उनके इन गानों पर पाबन्दी लगाने के लिए सोशल मीडिया पर मुहिम भी चलती दिखती है।  

? अंजलि सिन्हा


उधार की बुध्दि, चोरी का ज्ञान

कतिपय नेताओं की यही पहचान

      ह ज़रूरी नहीं है कि हरेक व्यक्ति में बुध्दि हो और हरेक व्यक्ति में ज्ञान हो। यह भी जरूरी नहीं है कि जिसमें बुध्दि हो उसमें ज्ञान भी हो या जिसमें ज्ञान हो उसमें बुध्दि भी हो। बुध्दि व्यक्ति के अंदर विद्यमान होती है जबकि ज्ञान का उद्गम बाह्य जगत है। ज्ञान आता है अध्ययन और अनुभव से। बाहरी जगत से ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति ज्ञानवान तो हो जाता है किंतु यदि उसमें सोचने-समझने की शक्ति नहीं है अर्थात बुध्दि नहीं है तो वह कहीं भी और कभी भी धोखा खा सकता है।

? राजेन्द्र जोशी


झारखंड में अब क्या होगा?

चाभी लालू के हाथ

      झारखंड में इतिहास ने एक बार फिर अपने आपको दुहराया है। वहां फिर सरकार का पतन हो गया है और एक नई सरकार के गठन की कवायद चल रही है। बिहार से अलग एक नये राज्य की मांग के पीछे इस क्षेत्र का विकास सबसे बड़ा तर्क था, लेकिन गठन के बाद ही यहां राजनैतिक अनिश्चय का माहौल बन गया और यह माहौल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। इसके कारण इसका विकास प्रभावित हुआ है। जहां बिहार 13 फीसदी प्रति साल की दर से विकास कर रहा है, वही झारखंड एक अदद सरकार के लिए हमेशा संघर्ष करता दिखाई पड़ रहा है।

? उपेन्द्र प्रसाद


संदर्भ :- सुप्रीम कोर्ट ने दवा परीक्षण पर रोक न लगाने

के कारण केंद्र और राज्य सरकारों को लगाई फटकार।

 सर्वोच्च न्यायालय की फटकार

से सरकार बेअसर

        वाओं के गैर कानूनी तरीकों से होने वाले परीक्षणों पर देश की शीर्ष न्यायालय ने एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाई है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारों पर कोई असर दिखाई नहीं दे रहा है। पिछलें करीब तीन साल से देश के कोने-कोने से चिकित्सीय परीक्षणों के दुशप्रभाव के चलते लगातार मौत की खबरें आ रही हैं। गरीब लोगों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। बावजूद परीक्षण में लगी दवा कंपनियों, अस्पतालों और चिकित्सकों के लालच व मनमानियों पर केंद्र व राज्य सरकारें  प्रतिबंध लगाने में नाकाम नजर आ रही हैं।

? प्रमोद भार्गव


बैंक से किसानो कें लिए कर्ज: एक दिवा स्वप्न !

       गिरधारी लाल देश के उन 64.8फीसदी किसानों में शामिल है जिनके पास खेती के लिए एक हेक्टेयर से भी कम भूमि है। लेकिन इसके जरिए वो अपने परिवार की गाड़ी खींच रहे हैं। गिरधारी लाल कुछ प्रगतिशील सोच रखते हैं वो अपनी इस अल्पभूमि पर खेती के जरिए आय बढ़ाने के तरीकों की खोज में लगे रहते हैं कभी वो जैविक खेती के विषय में जानकारी हासिल करते हैं तो कभी बागवानी की।गिरधारी लाल खेती में आधुनिक उपकरणों के उपयोग की इच्छा भी रखतें हैं।खेती में विकास के चिंतन में उनको समझ में आया कि छोटा 15 हार्सपावर का ट्रेक्टर उनके लिए काफी उपयोगी हो सकता है।    

? डॉ. सुनील शर्मा


ऐसे कलियुगी गुरुओं को कठोर दण्ड मिले !

        ह अत्यंत दु:ख की बात है कि जिन शिक्षकों पर देश के नौनिहालों का भविष्य निर्भर है और जिन्हें समाज में ईश्वरतुल्य समझा जाता है, वे आज विद्यार्थियों के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जिनसे शिक्षक का पद कलंकित हो रहा है। कहीं बच्चों को बर्बरतापूर्वक पीटा रहा है, कहीं अमानवीय दण्ड दिया जा रहा है, कहीं विद्यार्थियों के साथ अप्राकृतिक कृत्य किया जा रहा है, कहीं बालिग/नाबालिग छात्राओं के साथ दुराचार कर गुरुत्व पर दाग लगाया जा रहा है। कहीं-कहीं तो शिक्षकों की पाशविकता ने विद्यार्थियों के प्राण तक हर लिये हैं।

? डॉ. गीता गुप्त


  14 जनवरी-2013

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