संस्करण: 14अप्रेल-2008

बेमानी होता लता मंगेशकर पुरस्कार

महेश बाग़ी

मधयप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा स्थापित लता मंगेशकर पुरस्कार इस वर्ष पार्श्व गायक नितिन मुकेश को देने की घोषणा की गई है। इसी के साथ इस पुरस्कार के औचित्य पर एक बार फिर प्रश्नचिन्ह लग गया है। जहाँ तक नितिन मुकेश की बात है, उन्होंने गायन के क्षेत्र में कोई झंडा नहीं गाड़ा है। अपने पिता स्व. मुकेश की भौंडी नकल कर के उन्होंने जो थोड़े-बहुत गाने गाए हैं, उन्हें आज कोई सुनना नहीं चाहता। इसके अलावा उन्होंने अपने पिता द्वारा गाए गीतों को दोबारा गाकर अपनी प्रतिभा पर भी बट्टा लगवा लिया है। संभवत: यही वजह है कि संगीत जगत में वे 'आउट डेटेड' हो चुके हैं। ऐसे में उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार से नवाजने का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है। ऐसा लगता है कि यह पुरस्कार हर साल बांटना सरकार की मज़बूरी बन गया है। सरकार ने इस पुरस्कार की चयन समिति में जिन्हें भी रखा है, उनका संगीत जगत से दूर-दराज का रिश्ता भी नज़र नहीं आता है वरना वे इस पुरस्कार के लिए गुमनाम हो चुके नितिन मुकेश का नाम प्रस्तावित नहीं करते।
वैसे भी जब यह पुरस्कार स्थापित किया गया था, तब भी इसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया था। वज़ह यह थी कि यह पुरस्कार देश के जाने-माने पार्श्व गायकों को दिया जा रहा था। तब यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या मधयप्रदेश के संस्कृति विभाग ने देशभर के शीर्ष लोगों को पुरस्कार बांटने का ठेका ले रखा है ? मधयप्रदेश की जनता से कर के रूप में वसूली गई राशि चंद बड़े लोगों को पुरस्कार स्वरूप बांटना सांस्कृतिक अय्याशी नहीं तो क्या है ? होना तो यह था कि यह पुरस्कार प्रदेश की उभरती हुई प्रतिभाओं को दिया जाता। इससे उनका उत्साहवर्ध्दन होता तथा वे और अधिक बेहतर प्रदर्शन कर अपने प्रदेश का नाम रोशन करते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब तक यह पुरस्कार देश के जाने-माने गायकों को दिया जाता रहा है और अब ऐसी कोई हस्ती नहीं बची है, जिसे इस पुरस्कार से नवाज़ा जाए।
पिछले साल प्रसिध्द संगीतकार तथा पार्श्व गायक ए.आर.रहमान को यह पुरस्कार दिया गया था।सरकारी पुरस्कार और एक लाख की रकम के मोह में रहमान यहाँ आए तो सही, पर आयोजक उनसे एक भी गीत नहीं गवा सके। इधर पुरस्कार लिया, उधर रहमान फुर्र से उड़ गए। आयोजन में आए प्रदेश के कलाकारों को सुनने और उनकी हौसला अफज़ाई करने की जुर्रत भी उन्होंने नहीं की। आयोजक उन्हें रूकने तथा गाना गाने के लिए मनाते रहे, पर रहमान एक लाख का पुरस्कार लेकर चलते बने। इसके पूर्व जब आशा भोंसले को यह पुरस्कार दिया गया था और उन्हें भी एक-दो गीत सुनाने को कहा गया था, तब उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा था कि खाना खाने बुलवाते हो तो क्या बर्तन भी मांजने पड़ेंगे ? ज़ाहिर है कि बड़े कलाकार बड़ी रकम पाने के लालच में आ तो जाते हैं, पर इसके एवज में गाना उन्हें नाग़वार लगता है। ऐसे में इन बड़े कलाकारों को यह पुरस्कार देते रहना कहाँ की बुध्दिमानी है ? वैसे आयोजक इस बार खुश हो सकते हैं कि अब ऐसे शख्स को पुरस्कार दिया जा रहा है जो मंच पर खूब गाएगा। लेकिन अहम सवाल यह है कि कार्यक्रम में आमंत्रित जनता उसे क्यों सुनेगी ? पिछले तीन-चार साल से नितिन मुकेश को एक भी गीत गाने का मौका नहीं दिया गया है। यहाँ तक कि इस दौरान उनका कोई एलबम तक बाज़ार में नहीं आया है। गीत-संगीत के बाज़ार में उनकी एक भी सीड़ी तक उपलब्ध नहीं है। जीविकापार्जन के लिए उन्हें रिएलिटी शो का सहारा लेना पड़ रहा है। ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है कि लता मंगेशकर पुरस्कार पाने के बाद जब वे गाएंगे तो श्रोता झूम उठेंगे ?
इन तमाम स्थितियों से यह लगता है कि पुरस्कार बांटना सरकार की मज़बूरी है और इस मज़बूरी के निर्वहन पर हर साल पांच-दस लाख रुपए फूंके जा रहे हैं। इस संदर्भ में ख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी का कथन याद आता है। 80 के दशक में 'धर्मयुग' पत्रिका ने देश के शीर्षस्थ साहित्यकारों की एक परिचर्चा आयोजित की थी, जिसका विषय था-आत्मकथ्य। स्व. शरदजी ने अपने तेवर के अनुरूप कहा था-काहे की आत्मा और कैसा कथ्य ? साहित्य, कला तथा संस्कृति के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप पर सवालिया निशान लगाते हुए उन्होंने कहा था कि संस्कृति की फटी ज़मीन में सरकारी टांग अड़ाने की ज़रूरत ही क्या है ? लता मंगेशकर पुरस्कार की दुर्गति के बरबक्स स्व. शरदजी की उक्त टिप्पणी एकदम मुप्रीद बैठती है। बेहतर होगा कि सरकार संस्कृति के क्षेत्र में फिजूल की दखलंदाज़ी बंद करे और लता मंगेशकर पुरस्कार की दशा और दिशा पर चिंतन करे। सबसे अच्छा कदम तो यह होगा कि सरकार लता मंगेशकर पुरस्कार देना ही बंद कर दे। इसके बावजूद अगर इसे देना ज़ारी रखना ही हो तो बड़े या स्थापित लोगों को इससे कतई नवाज़ा नहीं जाए और यह पुरस्कार सिर्फ़ मधयप्रदेश की उभरती प्रतिभाओं को ही दिया जाए वरना कल हिमेश रेशमिया और अन्नू मलिक जैसे जबरिया गायक बने लोग यह पुरस्कार पा जाएंगे और हम मज़बूरीवश ताली पीटते ही रह जाएंगे।
महेश बाग़ी