संस्करण: 14अप्रेल-2008

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा-
हे मनमोहन ! तेरा तुझको अर्पण-
बालकवि बैरागी

मधयप्रदेश की शिवराज सरकार 'जो कर दे सो कम है।2007-08 का वित्त वर्ष 31 मार्च' 2008 को समाप्त हो गया।पहली अप्रैल 2008 से नया वित्त वर्ष' 2008-2009 शुरू हो गया। वित्त प्रबन्धन के विशेष शो के लिए पिछला वित्त वर्ष शोध और अधययन के लिहाज से बहुत काम का रहेगा।शिवराज सरकार के कई चमत्कारों में एक चमत्कार यह भी है कि केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार ने प्रदेश की जनता के हितों के लिये जो कई हज़ार करोड़ रुपयों की राशि इस सरकार को पिछले वित्त वर्ष में खर्च करने को दी थी उसमें से शनै:शनै: छन कर आने वाली जानकारी के हिसाब से जो आंकड़े बाहर आये हैं वे बताते हैं कि दो हजार एक सौ अस्सी करोड़ रुपयों की राशि लेप्स हो गई है। लेप्स होने का मतलब है सरकार के सम्बन्धित विभाग उस राशि को खर्च नहीं कर पाये। यह राशि चालू शब्दों में कहा जाये तो कहा जायेगा कि डूब गई। अपने आपकी पीठ ठोकने और गाल बजाने वाली सरकार के लिये यह एक राष्ट्रीय शर्म की बात है कि इस 2188 करोड़ रुपयों की डूबत खाते जाने वाली राशि में 1000 एक हज़ार करोड़ रुपये की राशि तो केवल एक ही विभाग 'राजीव गांधी शिक्षा मिशन' की राशि है। बाकी 1180 करोड़ की राशि जिन विभागों की लेप्स हुई है वे हैं-पहला 'स्वास्थ्य विभाग' जिसकी 500.00 पांच सौ करोड़ रुपयों की राशि लेप्स हुई। दूसरा 'नर्मदा घाटी विकास विभाग' जिसका 350 तीन सौ पचास करोड़ रुपया डूबा। तीसरा विभाग है जिसका कि रुपया डूबा उसका नाम है 'ग्रामीण विकास विभाग' और इस विभाग की राशि गई 150-एक सौ पचास करोड़ रुपया। बात यहीं खत्म नहीं होती है। चौथा विभाग निकला 'महिला एवं बाल विकास विभाग' जो 100 एक सौ करोड़ रुपया खर्च नहीं कर पाया और पाँचवा विभाग रहा 'पुलिस व जेल विभाग' जिसने 80 अस्सी करोड़ रुपया वापस किया। राजीव गांधी शिक्षा मिशन की राशि खर्च नहीं कर पाने का खमियाजा इस विभाग के कमिश्नर श्री आर.एस. गुलानिया को अपनी कुर्सी गंवा कर चुकाना पड़ा। प्रदेश के मुख्य सचिव श्री राकेश साहनी की त्यौरियाँ इन सभी छ: विभागों पर और विभागों के जिम्मेदार विभागाधयक्षों तथा निकम्मे अमले पर बराबर तनी हुई है। जो सरकार अपनी तेज़ तर्रारी और कीर्तिमानों का ढिंढोरा सारे देश में पीटती फिरती है उस सरकार के केवल आधा दर्ज़न विभागों द्वारा सवा दो हज़ार करोड़ रुपया खर्च नहीं कर पाना विदेशी पूंजी निवेश को और ग्लोबल इन्वेस्टर्स महानुभावों के चेहरों पर चौंकाने वाली मुद्राएँ चस्पा करने वाली घटना है। यह एक सुस्त और निकम्मी सरकार का प्रमाण है जो इतने बड़े अमले और इतनी विकट समस्याओं में उलझी होने के बावज़ूद केन्द्र से प्राप्त राशि को खर्च नहीं कर पा रही हैं। समयावधि एक वर्ष भी कम नहीं होती है। यह अवधि सभी राशियों पर लागू होती है। प्रमुख सचिव श्री राकेश साहनी की मुख्य चिंता यह है कि यह सारी राशि इन विभागों और इस सरकार की डिपाजिट राशि में जमा होगी या नहीं या कि इस लेप्स राशि को वापस प्राप्त करने के लिये उन्हें मनमोहन सरकार से पुन: उतना ही सम्वाद और सम्पर्क करना होगा जितना कि पहले किया गया था। अफसोस और शर्म की बातों में ग्रामीण विकास विभाग का वह 150 करोड़ रुपया लेप्स होना भी है जो कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के लिये प्राप्त रुपया है। सड़कों के मामले में मधयप्रदेश की शिवराज सरकार का अपयश अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कुख्यात है। सामान्य जन का यह सोचना और कहना बहुत मतलब रखता है कि मधयप्रदेश की भाजपायी शिवराज सरकार और इस सरकार के मुखियाओं को 'राजीव' 'मनमोहन' 'सोनिया' और 'गांधी जैसे नामों तथा शब्दों से ही चिढ़ है। और तो और 'महिला बाल विकास विभाग' की जो एक सौ करोड़ रुपयों की राशि लेप्स हुई है वह बच्चों के पोषण आहार की राशि है। इस राशि के टेंडर विवादों में आ गए थे सो विभाग ने इस रकम को लेप्स करना ही ठीक समझा।पता नहीं कौन से विभागाधयक्ष का फैसला था।
कुछ महीनों पहले राज्य योजना आयोग ने कई विभागों के वित्तीय प्रबंधन और भूमिकाओं की समीक्षा करके करीब 300 तीन हज़ार करोड़ रुपयों की राशि को फिर से बाँटा था।यह वही राशि थी। दूसरी बार की अनुपूरक अनुमान राशि में खर्च नहीं कर पाने वाले विभागों से यह रकम लेकर उन विभागों को वह पैसा नहीं दिया गया था जो कि और भी पैसा माँग रहे थे। ऐसा नहीं होता तो लेप्स होने वाली राशि और भी अधिक होती।
देश और प्रदेश के अर्थशास्त्रियों तथा विभाग एवं प्रशासन प्रबन्धनों के अधयेताओं के लिये मधयप्रदेश की भाजपा सरकार का यह अर्थ प्रबन्धन चिंता और व्यथा का विषय है। समीक्षा दूसरे विभागों की डूबी राशियों की भी होना चाहिये।
बालकवि बैरागी