संस्करण: 14अप्रेल-2008

लोकतंत्र की डगर पर
गिलानी के कदम
नवाज शरीफ़

पाकिस्तान में बरसों इंतजार के बाद लोकतंत्र का सूर्य उदय हुआ। यह सूरज पाकिस्तान की जनता को कितनी रोशनी दे पाएगा। यह कहानी अभी जल्दबाजी होगी। पाकिस्तान में लोकतंत्र का स्वागत न सिर्फ़ पाकिस्तानी जनता ने किया है, बल्कि दुनिया के प्रमुख राष्ट्रों ने स्वागत किया है। कहते है जब पड़ोस के घर शादी हो तो शहनाई की आवाज खुद के घर तक भी आती है, जिसे सुनकर आप-चाहे न चाहे मुग्ध हो जाते है ठीक ऐसी ही हालत भारत की भी है। इसी अवसर पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पाक के निर्वाचित प्रधानमंत्री को बधाई देते हुए यह आशा जताई है कि भारत-पाक के रिश्ते अब तक के सबसे बेहतर स्वरूप में उभरेंगे किन्तु यह आशा कहीं आशा ही न रह जाए। निर्वाचित प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने जब शपथ ली तो कहा कि वह राष्ट्र को ठीक ढंग से संचालित करने के लिए सबको साथ लेकर चलेंगे। प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने भी पत्रकार वार्ता में औपचारिकता निभाते हुए आतंकवाद से निपटने की बात कही है। आतंकवाद से निपटना पाकिस्तान के लिए अब भी टेढ़ी खीर है किन्तु राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने गिलानी को अपना पूरा सहयोग देने की बात कही है। देखना यह है कि यह ताल-मेल कितने दिनों तक बना रहता है वैसे दूसरे शब्दों में कहा जाए तो गिलानी के सिर पर कांटो का ताज रखा गया है जिसे उनसे फूल में बदलने की उम्मीद की गई है। इस शपथ समारोह में अमेरिकी उप विदेश मंत्री जॉन बाउचर भी उपस्थित थे एवं इन्होंने राष्ट्रपति एवं निर्वाचित प्रधानमंत्री से वार्तालाप भी किया।अमेरिका पाकिस्तान की नई सरकार को घेरकर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है किन्तु देखना यह है कि इस नए सरकार की तालमेल अमेरिका से कैसी रहती है यह अमेरिका के स्वर में स्वर मिलाकर चलता है या कुछ अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ से भी काम करता है गिलानी ने प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान में अपदस्थ जजों की रिहाई के आदेश दिये। यह आदेश शायद राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को नागवार गुजरा हो, क्योंकि यह फैसला राष्ट्रपति के निर्णय को चुनौती देता है। गिलानी के सिर्फ़ तीन माह तक ही प्रधानमंत्री बनने की चर्चा पहले की गयी थी। किन्तु पीपीपी के सह-अधयक्ष आसिफ़ अली जरदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि गिलानी पूरे पाँच साल तक पीएम के पर अपनी सेवाएं देंगे।
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में जिला परिषद के अधयक्ष पद से अपनी शुरूआत करने वाले यूसुफ रजा गिलानी अब तक ऐसी भावी सरकार के मुखिया बन गए हैं जिन्हें आतंकवाद से लेकर महंगाई तक का सामना करना पड़ेगा।कहते है वफादारी इंसान को शिखर पर पहुँचा देती है यही कारण है कि गिलानी का नाम जरदारी ने पी.एम. पद के लिए सुझाया था।यह वही गिलानी है जिन्हें मुशर्रफ के शासनकाल में गैर कानूनी तरीके से कुछ नियुक्तियां करने के मामले में भ्रष्टाचार विरोधी अदालत ने 2001 में गिलानी को दस साल कैद और 10 करोड़ रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अब राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के सिर पर महाभियोग की तलवार लटक रही है। पीपीपी और इसके सहयोगी दल आगामी कुछ दिनों के भीतर महाभियोग चलाने की योजना बना रहे है। अगर ऐसा होता है तो पाकिस्तान के इतिहास में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग का यह पहला मौका होगा। यह महाभियोग मुशर्रफ पर 1973 के संविधान के उल्लंघन और उसे निष्प्रभावी करने के आरोप में चलाया जा सकता है। पाक संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव सफलतापूर्वक पारित करने के लिए नेशनल असेंबली और सीनेट की संयुक्त बैठक में सामूहिक रूप से दो-तिहाई वोट ज़रूरी है। राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग चलाकर गिलानी कहीं अपना हिसाब तो बराबर नहीं करना चाहते ?
इतनी मुश्किल, मेहनत और जोड़-तोड़ के बाद जो सरकार बनी है वह मुशर्रफ के साथ कितने दिनों तक कदम-से-कदम मिलाकर चल पाएगी यह कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। मुशर्रफ ने इस सरकार को हर प्रकार का सहयोग देने की घोषणा की है कहीं यह मुशर्रफ के बचाव का नया अंदाज तो नहीं है। इस बात से तो इंकार नहीं ही किया जा सकता कि मुशर्रफ ने अपने कार्यकाल में न सिर्फ़ मनमानी की बल्कि अमेरिका की हाथ की कठपुतली भी रही है। यही कारण है कि आज पाक की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर है। शायद यह कठपुतली का खेल मुशर्रफ की मज़बूरी भी रही हो। आज पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री गिलानी के सामने सबसे बड़ा मुद्दा है आतंकवाद अगर गिलानी पाक के दामन से आतंकवाद का यह दाग धुल पाए तो पाक के इतिहास में गिलानी अमर हो जाएंगे किन्तु इस संसार में मुर्दों को ही अमर कहा जाता है यह गिलानी को यह याद रखना होगा कि जीते जी कोई अमर नहीं हो सका। गिलानी ने अपने प्रथम प्रेसवार्ता में आतंकवाद का भी जिक्र किया है। क्या गिलानी पाक में आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए आतंकवादियों से वार्तालाप करेंगे या उनके विरूध्द कोई ठोस कदम उठाएंगे यह तो आने वाला समय ही बता पाएगा। किन्तु नि:संदेह यह कहा जा सकता है कि गिलानी की डगर आसान नहीं है। पाकिस्तान में राष्ट्रपति शासन के बाद लोकतंत्र का जो सूरज उगा है इसकी लाली विश्व की पृष्ठभूमि पर अपनी गर्माहट छोड़ पाती है कि नहीं यह चंद दिनों में ही पता लग जाएगा। आतंकवाद पाकिस्तान के लिए शुरूआत के दौर से ही गंभीर समस्या रही है, अगर गिलानी मात्र औपचारिकता नहीं निभा रहे तो उन्हें सबसे पहले यह जनता आवश्यक होगा कि आखिर पाकिस्तान की भोली जनता आतंकवाद की आग में अपना हाथ क्यों सेक रही है कोई जन्म से आतंकवादी नहीं होता हालत उसे आतंकवादी बना देती है, गिलानी को उसी हालत का मुआएना करना होगा और कुछ ऐसे रास्ते निकालने होंगे जो लोगों के दिलों से नफरत मिटाकर मुहब्बत का भाव पैदा कर सके। रही बात भारत की तो भारत सदैव पाक से मित्रता का इच्छुक रहा है किन्तु ताली एक हाथ से नहीं बजती इसलिए पाक को भारत से मित्रता के लिए खुले दिल से अपने हाथ आगे बढ़ाने होंगे, अगर पाक भारत से मित्रता कर चले तो दोनों ही देशों का फायदा है एवं पाकिस्तान है एवं पाकिस्तान को हर प्रकार का लाभ भारत से मिल सकता है। अगर नवोदित प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने कुछ ऐसे ही कदम उठाए तो शायद पाक का भला हो जाएगा नहीं तो गिलानी को यह याद रखना होगा कि हर उगते हुए सूरज का एक ही परिणाम होता है डूब जाना और उगते हुए सूरज को सभी प्रणाम करते है किन्तु डूबते हुए सूर्य में लोग सिर्फ़ मज़ा लेते है और कुछ नहीं।

 नवाज शरीफ़

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