संस्करण: 14अप्रेल-2008

तिब्बत पर भारत की
खामोशी जायज
नीरज नैयर

तिब्बत पर मचा बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है. आजदी की मांग कर रहे बौद्ध भिक्षुओं की आवाज हर रोज तेज होती जा रही है. विश्व समुदाय भी तिब्बतियों के समर्थन में बोलने लगा है. ब्रिटेन, फ्रांस और यूरोपीय संघ ने जहां बीजिंग में होने वाले ओलंपिक खेलों के बहिष्कार की धमकी दी है वहीं अमेरिका पहले ही चीन को शांति बरतने की सलाह दे चुका है. ऐसे में भारत की खामोशी किसी के गले नहीं उतर रही है. चूंकी दलाई लामा को भारत ने शरण दे रखी है और तिब्बतियों के प्रति भी उसका रवैया हमेशा उदारवादी रहा है, इसलिए उसका चीनी दमनकारी नीति की मुखालफत न करना तिब्बतियों को भी सोचने पर मजबूर कर रहा है. दरअसल तिब्बत के रिश्ते जितने गहरे भारत के साथ हैं उतने किसी भी देश के साथ नहीं. चीन तथा भारत के मध्य बसा एशिया के बीचों-बीच 25 लाख वर्ग किलोमीटर वाला तिब्बत चीन के जैसे पहले स्वतंत्र था. तिब्बत और भारत के बीच संबंध शुरू से ही बड़े घनिष्ट रहे हैं. विशेषकर 7 वीं शताब्दी से जब भारत से बौद्ध धर्म का तिब्बत में आगमन हुआ. जब तिब्बत स्वतंत्र था तो तिब्बती सीमाओं पर भारत के केवल 1500 सैनिक रहते थे और अब अनुमान है कि भारत उन्हीं सीमाओं की सुरक्षा के लिए प्रतिदिन 55 से 65 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है. 1950 के दौरान चीन ने तिब्बत के आंतरिक मामलों में दखल देना शुरू किया. चीन से लाखों की संख्या में चीनी तिब्बत में लाकर बसाए गये. जिससे तिब्बती अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएं और आगे जाकर तिब्बत चीन का अभिन्न अंग बन जाए. 1959 में जब तिबती जनता ने चीनी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया तो चीन ने उसे पूरी शक्ति से कुचल दिया. दलाई लामा को प्राणरक्षा के लिए भारत आना पड़ा. इसके बाद तिब्बत की सरकार भंग कर दी गई और वहां सीधे चीन का शासन लागू कर दिया गया. अत: हर कोई यह आस लगाए बैठा था कि भारत इस मसले पर कोई कड़ा रुख अख्तियार करेगा. तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है निश्चित ही उसकी भर्त्सना करनी चाहिए पर सवाल यह उठता है किया गया।
भारत तिब्बतियों के घाव पर मरहम लगाकर चीन को अपनी खाल नोंचने देने की स्थिति में है? और वो भी तब जब दोनों देश एक दूसरे के करीब आने की कोशिशों में लगे हैं. भले ही भारत 1962 की स्थिति से बहुत आगे निकल आया है मगर फिर भी चीन को टक्कर देने के लिए उसे सौ बार सोचना होगा. चीन हमेशा से ही अपनी कूटनीतिक और सामरिक चालों से हमें कसता रहा है, ऐसे में तिब्बत का समर्थन और ड्रैगन की मुखालफत करना किसी भी लहजे में भारत के सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा.
अभी हाल ही में चीन यात्रा के वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जिस गर्मजोशी के साथ स्वागत हुआ, ऐसा पहले शायद ही कभी देखने को मिला हो. ग्रेट पीपुल हॉल में रात्रिभोज के बाद चीनी प्रधानमंत्री के शून्य से साढ़े तीन डिग्री नीचे तापमान में मनमोहन सिंह को विदाई देने के लिए कई मिनट खड़े रहना दर्शाता है कि चीन अब दुश्मनी भुलाना चाहता है. प्रधानमंत्री न सिर्फ सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की पुरजोर मांग पर चीन का रुख बदलने में कामयाब हुए बल्कि परमाणु ऊर्जा उत्पादन में भी उससे सहयोग का वायदा लेने में सफल रहे. इससे कहीं न कहीं यह संकेत जाता है कि दोनों देशों के पथरीले हो चुके रिश्तों में अब फिर से नमी लौटने लगी है. मनमोहन सिंह की इस यात्रा में सबसे बड़ी उपलब्धि रही आर्थिक संबंधों को और नजदीक लाना. दोनों देश 2010 तक द्विपक्षीय व्यापार 40 से बढ़ाकर 60 अरब डॉलर करने पर सहमत हुए हैं. यहां यान देने वाली बात यह है कि 1999 में दोनों देशों के बीच महज 2 अरब डॉलर का ही व्यापार था. ऐसे में 60 अरब डॉलर का लक्ष्य अपने आप में एक उपलब्धि है. 2007 में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी बनकर उभरा है. पिछले साल भारत-चीन व्यापार में लगभग 57 फीसदी का इजाफा हुआ है. चीन ने भारत के साथ संयुक्त बयान में यह भी कहा था कि दोनों देश उन नदियों पर निगरानी के लिए साझा तंत्र बनाएंगे, जो भारत और चीन दोनों में बहती हैं. पर यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि विगत वर्ष अमेरिका और ब्रिटेन के प्रमुख समाचार पत्रों में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ था कि चीन जोरशोर से प्रयास में लगा हुआ है कि तिब्बत से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की धारा को मोड़कर उत्तार में येलो रिवर में मिला दिया जाए. ताकि उत्तरी चीन का सुखा भाग फिर से हरा भरा हो सके. अब अगर भारत तिब्बत का समर्थन कर चीन को चेताने की हिमाकत करता है तो चीन भी खामोश नहीं बैठने वाला, उसने पहले ही यह चेतावनी दे डाली है कि तिब्बत चीन का आंतरिक मामला है और इसमें टांग अढ़ाने वाले देशों को अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. ऐसे में तिब्बत के समर्थन की कीमत कहीं हमें ब्रह्मपुत्र को खोकर न चुकानी पड़े. जानकारों का भी मानना है कि चीन अगर इसी तरह अपनी चाल चलने में लगा रहा तो आने वाले दस सालों में वह हमसे ब्रह्मपुत्र को छीनने में सफल हो जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो असम सहित भारत का उत्तरी-पूर्वी इलाका बंजर में तब्दील हो जाएंगा। मेकांग नदी इसका उदाहरण है. राजनयिक मामलों के जानकारों में से अधिकतर मानते हैं कि भारत को सतर्कता से न केवल तिब्बत के आंदोलन के प्रति नैतिक समर्थन दिखाना चाहिए साथ ही इस बात का भी यान रखना चाहिए कि वह किसी भी सूरत में ऐसे देश के रूप में नजर नहीं आए जो चीन विरोधी गतिविधि में शामिल है और वहां होने वाली ओलंपिक गतिविधियों को मुश्किल बनाने का काम कर रहा है. जानकारों की नजर में भारत के लिए ऐसा करना राष्ट्रीय हित में नहीं होगा. 1980 में अफगानिस्तान के नाम पर जब कुछ देशों ने रूस में ओलंपिक खेलों का विरोध किया था तो तकालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रहित में नहीं होने के कारण इस मुहिम को अपना समर्थन देने से इंकार कर दिया था. भारत को इस बात का अच्छी तरह अहसास है कि चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति है जिससे रिश्ते बिगाड़ने में बुद्धिमानी नहीं होगी. वर्तमान में चीन का कद इस कदर बढ़ गया है कि दुनिया का कोई भी देश सीधे तौर पर उससे पंगा लेने की सोच भी नहीं सकता. अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश जो कोसोवो की आजादी एंव रक्षा के लिए नाटो के तत्वाधान में अपनी सेना भेज सकते हैं, वे भी तिब्बत पर केवल बयानबाजी ही कर रहे हैं. हिंसा पर चिंता व्यक्त करके यह कहना कि चीन को दलाई लामा से बात करनी चाहिए, औपचारिक खानापूर्ति से यादा कुछ नहीं है. स्वयं दलाई लामा जब कह चुके हैं कि वो चीन से अलग नहीं होना चाहते केवल स्वायाता चाहते हैं तो हम कौन होते हैं जो तिबत की आजादी का झंडा बुलंद करें. पिछले दिनों भारत में चीनी दूतावास में तिबतियों के प्रदर्शन को लेकर ही चीन ने जो कड़ा रुख दिखाया था उससे यह अंदाजा लगया जा सकता है कि वो इस मामले पर कितना भर्राया हुआ है. चीन ने प्रदर्शन के बाद रात दो बजे चीन में भारत की राजदूत निरुपमा राव से नाराजगी का इजहार किया. दूसरे दिन निरुपमा राव को एक बार फिर दिन में बुलाया गया और उन्हे उन तिब्बती संगठनों की एक फेहरिस्त भी सौंपी गई जो भारत में चीन के खिलाफ बढ चढ़ कर प्रदर्शन कर सकते हैं. दूसरे देशों के राजदूतों को बुलाकर प्रतिक्रिया जताना सामान्य बात है मगर किसी राजदूत को इतनी रात में बुलाना आम बात नहीं मानी जा सकती.
वैसे भी चीन का तीन हजार वर्षो का इतिहास बताता है कि वह सदा विस्तारवादी रहा है. चीन जब किसी पड़ोसी की जमीन छीन लेता है तो उसे आसानी से अपने हाथ से जाने नहीं देता. इसलिए यह सोचना कि चीन हमारे विरोध के चलते तिबत को छोड़ या अपनी विस्तारवादी आदत बदल देगा देगा गलत होगा. हां भारत इतना जरूर कर सकता है कि कूटनीतिक तौर पर तिब्बती आंदोलन का समर्थन करें जैसा चीन पाकिस्तान के सहारे करता आया है. इसमें न तो कोई बुराई है और न ही कोई नुकसान मगर यह कहना कि तिब्बत के समर्थन में भारत को खुलकर सामने आना चाहिए कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है. हर देश के अपने हित होते हैं और उनकी बलि चढ़ाकर दूसरों की मदद नहीं की जा सकती
नीरज नैयर