संस्करण: 14अप्रेल-2008

क्या उमा भारती रघुनंदन शर्मा की राह पर चलेंगी ?

एल.एस.हरदेनिया

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना की भारतीय जनता पार्टी में वापसी के बाद उमा भारती के भी भाजपा में वापसी की चर्चा प्रारंभ हो चुकी है। इस चर्चा को बल इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि उमा भारती की स्वयं द्वारा स्थापित पार्टी में (भारतीय जनशक्ति पार्टी) की फजीहत हो गई है। भारतीय जनशक्ति पार्टी में फूट पड़ गई है और एक समय उनके प्रमुख समर्थक रहे प्रहलाद पटेल एक गुट के अखिल भारतीय अधयक्ष बन गए हैं। इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से उनने उमा भारती को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। पटेल उमा की ढुलमुल नीति से परेशान थे। उनकी नाराजी उस समय बढ़ गई जब उमा भारती ने अपने सहयोगियों से परामर्श किये, बिना गुजरात चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को हटाने का फैसला कर लिया था। यद्यपि उमा भारती के फैसले के बाद भी भारतीय जनशक्ति पार्टी के अनेक उम्मीदवार मैदान में डटे रहे थे। गुजरात के अलावा अनेक मुद्दों पर उमा भारती व पटेल के बीच मतभेद बढ़ते गए अंतत: कुछ दिन पहले भाजश के एक धड़ ने उमा भारती के स्थान पर प्रहलाद पटेल को पार्टी का राष्ट्रीय अधयक्ष चुन लिया।
इसके पहले भी उमा भारती के अनेक विश्वस्त साथी भाजपा में वापस पहुंच चुके थे। उनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली रघुनंदन शर्मा थे। रघुनंदन शर्मा ने अपनी वापसी की कीमत मय ब्याज के चुकवा ली। वे अभी हाल में संपन्न चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के कोटे से राज्यसभा सदस्य चुन लिए गए। बताया जाता है कि उनने भाजपा इसलिए छोड़ी थी क्योंकि उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा गया था। शर्मा के अलावा उमा भारती के कुछ अन्य प्रमुख समर्थक भी भाजपा में वापस पहुँच चुके हैं। इस कारण वो लगभग अलग-थलग पड़ गई हैं।
वैसे इस संदर्भ में यह उल्लेख करना उचित होगा कि भाजपा ने मदनलाल खुराना और रघुनंदन शर्मा को वापस लेकर यह प्रदर्शित किया है कि वह बड़े से बड़ा अपमान का घूंट पीकर उनको वापस लेने को तैयार है जो भाजपा को छोड़कर चले गए। खुराना व शर्मा सरीखे नेताओं ने भाजपा छोड़ने के बाद भारतीय जनता पार्टी को गद्दार, देशद्रोही, अवसरवादी कहा है। इनने अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, स्वर्गीय प्रमोद महाजन, अरूण जेटली आदि पर भद्दी से भद्दी भाषा में हमला किया है। इस सबके बावज़ूद खुराना व शर्मा को वापस लिया गया। इससे सिध्द होता है कि राजनीतिक पार्टियों में स्वाभिमान नहीं होता है। अपनी ताकत बनाए रखने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। कैसा भी समझौता कर सकते हैं।
रघुनंदन शर्मा ने भाजपा छोड़ने के बाद समाचार पत्रों में एक विज्ञापन छपवाया था जिसमें उनने लगभग गाली गलौज की भाषा में भाजपा व उसके नेताओं पर कीचड़ उछाला था। विज्ञापन उमा भारती पर उन्हीं के क्षेत्र में हुए प्राणघातक हमले के बाद पिछले वर्ष (2007) मार्च के महीने में छपाया गया था।विज्ञापन पर रघुनंदन शर्मा के हस्ताक्षर थे और वह उन्हीं की ओर से छपाया गया था। विज्ञापन में कहा गया था-
 

न रहे मुखर्जी, न रहे दीनदयाल....
बचे केवल सत्ता दलाल ?
भाजपा को सबक सिखाओ ?
भक्त शिरोमणि
राष्ट्रभक्त, हिन्दुत्व प्रहरी
भारतीयता की प्रतीक
साधवी उमाश्री पर बड़ा मलहरा में
प्राणघातक हमला करने का उत्तरदायी
भाजपा नेतृत्व क्या दंड का हकदार नहीं ?
प्रहलाद पटेल
राष्ट्रीय महामंत्री

करांची हो या कंधार,
राष्ट्रीय अस्मिता को बेचने वाले राष्ट्रद्रोही
क्या भारत माता के अपराधी नहीं ?
चन्द्रराज सिंघवी
राष्ट्रीय उपाधयक्ष

हिन्दुत्व, राम मंदिर,
गौवंश संरक्षण, राष्ट्रीय स्वाभिमान,
समान आचार संहिता,
सत्ता के दलदल में सिध्दांतों को डुबाने वाले
क्या नफरत के हकदार नहीं ?
रघुनंदन शर्मा
अधयक्ष-मधयप्रदेश भारतीय जनशक्ति
न अयोधया में रूकेंगे, न विदेश में झुकेंगे
करांची हो या कंधार, वो बन के रह गए गद्दार
हम खुद्दार हैं, खुद्दार ही रहेंगे।
भाजपा एक धोखा है, धक्का मारो मौका है


इतनी अपमानजनक भाषा के बावजूद भाजपा ने रघुनंदन शर्मा को पुन: वापस ले लिया और राज्यसभा का सदस्य भी बना दिया।
लगभग इसी तरह की भाषा में उमा भारती ने अनेक बार भाजपा की व उसके नेतृत्व की आलोचना की थी। सच पूछा जाए तो उमा भारती की भाषा व शैली इससे भी ज्यादा कटु थी।
न सिर्फ़ इस मामले में भाजपा ने इसके पूर्व भी जबरदस्त अवसरवादिता दिखाई है। हिमाचल प्रदेश के सुखराम केन्द्र में संचार मंत्री थे। मंत्री की हैसियत से उनके कुछ कारनामों को लेकर भाजपा ने उनके उपर भारी भरकम हमला किया था। और यहाँ तक कि इस मामले को लेकर लगभग सात दिन लोकसभा नहीं चलने दी थी। उन्हीं सुखराम को भाजपा ने अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। मेनका गांधी न सिर्फ़ संजय गांधी की पत्नी थी वे उनके विचारों से सहमत थीं। उन्हीं मेनका गांधी को भाजपा ने केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में स्थान दिया।आपातकाल के दौरान एक लोकप्रिय नारा था ''आपात काल के तीन दलाल संजय, विद्या, वंशीलाल''। जहां मेनका गांधी को मंत्री पद दिया वहीं विद्याचरण शुक्ल को अपनी पार्टी की टिकट पर लोकसभा के लिए चुनाव लड़ाया। भारतीय जनता पार्टी के अवसरवादिता के ऐसे अनेक उदाहरण हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि किसी दिन यह समाचार पढ़ने व सुनने को मिले कि उमा भारती भाजपा में वापस आ गई है। यदि ऐसा होता है तो कहावत के अनुसार दोनों ही अर्थात उमा भारती और भाजपा थूंक कर चाटेंगे।
एल.एस.हरदेनिया