संस्करण: 14अप्रेल-2008

कांग्रेस की धमनियों में नया खून
विपक्ष की बेतुकी टिप्पणियां
राजेन्द्र जोशी  

आज़ादी के पहले और फिर आज़ादी मिलने के बाद से, या यूं कहें कि जब से कांग्रेस पार्टी अस्तित्व में आई है तभी से उसके एजेंडे में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों, पिछड़े वर्ग के लोगों और गरीब तथा कमजोर वर्ग के लोगों के कल्याण के विषय शामिल रहे हैं। कांग्रेस केन्द्र में या राज्यों में सत्ता में रही हो, या नहीं भी रही हो,तब भी वह इन वर्गों के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए निरंतर कार्य करती रही है। इन वर्गों के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने, उन्हें नेतृत्व के अवसर उपलब्ध कराने तथा समाज में आर्थिक असमानता को दूर करने में कांग्रेस इन वर्गों के लिए प्राथमिकता से अनेक योजनाएँ, बनाती आई है और गांधीजी के सपनों को साकार करने के लिए उनहें राजनीति, समाजसेवा, शासकीय सेवाओं, व्यवसायों और शिक्षा तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने और अपनी भूमिका प्रदर्शित करने के लिए उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित करनी आई है। इन सभी वर्गों के प्रति समर्पित भाव से सदैव कार्यरत रही कांग्रेस देश के चौतरफा विकास के अभियान में सदैव इन वर्गों को आगे लेकर बढ़ती आ रही है। कांग्रेस के इन्हीं सिध्दांतों और कार्यक्रमों को संचालित करने की बागड़ोर थामने के लिए वर्तमान में, युवाशक्ति की भूमिका का एक महत्वपूर्ण अवसर आया है। जिस दृढ़ता के साथ नेहरू, गांधी के परिवार की परम्पराओं को मज़बूती के साथ आगे बढ़ाने के लिए राहुल गांधी राजनैतिक मैदान में उतरे हैं उससे कांग्रेस अपने सिध्दांतों और मानदंडों को मूर्तरूप देने में कामयाबी महसूस करने लगी है। राहुल गांधी ने देश के युवाओं की ताकत और उनकी उर्जा को सकारात्मकता देने के उद्देश्य से भारत खोज यात्रा का देशव्यापी अभियान शुरू किया है, वह भारत के भावी स्वरूप को निखारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। केन्द्रिय मंत्रिपरिषद में हाल ही में युवा शक्ति को जिस तरह से तरज़ीह दी गई है, उससे कांग्रेस ने आप इरादा साफ़ कर दिया है कि वह अपने सिध्दांतों और मान्य परम्पराओं के साथ ही देश के चौतरफा विकास में युवा-भागीदारी को काफ़ी सशक्त बना रही हैं। कांग्रेस में बढ़ते हुए युवाशक्ति के हौसले से विभिन्न राजनैतिक दलों में खलबली मच गई है। युवाओं की इस टीम को विशेषकर राहुल गांधी के बढ़ते प्रभाव को देखकर कतिपय पार्टियों का झल्ला उठना स्वाभाविक है। ऐसी पार्टियों के नेतागण राहुल गांधी के व्यक्तित्व और उनकी क्षमताओं पर खूब कटाक्ष करने लगे हैं, यहाँ तक उनके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए उनकी राह में रोढ़े बिछाने लगे हैं।
प्रजातांत्रिक प्रणाली के खुले आकाश के नीचे कांग्रेस और आज़ाद भारत में जन्म लेते जा रहे विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा देश के विकास में और आम आदमी की तरक्की के कार्यक्रमों में खूब दिलचस्पी दिखाई जा रही है। सत्ता की लालच और उसके ग्लेमर से जुड़ने की चाहत में विभिन्न राजनैतिक दलों ने राजनीति के क्रीड़ांगन में अपने आपको उतारकर सत्ता का ताज़ हासिल करने की प्रतिस्पर्धा में कुछ ऐसे-ऐसे पैतरे दिखाने शुरू कर दिये जिससे नैतिकता, अनुशासन और राजनैतिक मर्यादाओं के नियमों का भी उल्लंघन होने लग गया है। सत्ता लोलुपता के वशीभूत होकर कांग्रेस से फूटकर कुछ व्यक्तियों और समूहों द्वारा बनाये गये समाजवादी, बहुजन समाजवादी और कुछ अन्य प्रादेशिक दलों ने विकास और जनकल्याण को तो अपनी-अपनी पार्टियों के मुद्दे बनाये किंतु उनमें कोई नये न होकर वे सब कांग्रेस की विषयसूची से ही उध्दत किए गये मुद्दे हैं। समाजवादी पार्टी के मुद्दों में पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों के उत्थान को प्राथमिकता है तो बहुजन समाजवादी ने अपनी स्थापना के समय मुख्य मुद्दा सत्ता को हथियार बनाना था। ''तिलक, तराजू और तलवार-इनको मारो जूते चार'' जैसे नारे को अपनाने से बहुजन समाजवादी पार्टी ने देखा कि कुर्सी तक पहुँचने में यह नारा बाधक बन रहा है, तो उसने ब्राम्हण, क्षत्री,वैश्य और अन्य सवर्णों को अपने साथ लेकर सत्ता-रस चूसना शुरू कर दिया।दलितों के नाम पर अपनी राजनीति चलाने वाली इस पार्टी को सवर्ण प्रिय लगने लगे हैं। कुछ सवर्ण भी सत्ता-लोलुपता के कारण उनके पिछलग्गू हो गये हैं। फिर भी इस पार्टी की राजनीति आज भी दलितों के नाम पर चल रही है। पार्टी की सुप्रिमों को ऐसा लगने लगा है कि दलितों के हित की बात का उन्होंने कॉपीराइट करा लिया है। कुछ इसी तरह समाजवादियों की भी पिछड़े और अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुस्लिमों) के नाम पर राजनीति चल रही है। ये सभी मुद्दे जो इन दोनों पार्टियों के है, काँग्रेस की विषय सूची के ही हैं।
इधार भारतीय जनता पार्टी जब विकास और जनकल्याण के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में नाकामयाब सी होने लगी तो उसने अपने कुछ गुप्त एजेंडे बना लिये। इनके तहत धर्म, जाति, वर्ग, संप्रदाय और सांस्कृतिक-परम्पराओं को अपने ढंग से परिभाषित करते हुए और जनता की भावनाओं को भ्रमित करते हुए सत्ता तक पहुँचने का मार्ग अपनाना बेहतर समझा। कुछ हद तक प्रारंभिक प्रयोगों के इस पार्टी को मतदाताओं ने कामयाबी भी दी। बाद में पार्टी की सत्ता-पहुँच-थ्योरी की धीरे-धीरे कलई खुलती चली जा रही है। भाजपा का जनभावना को अपने पक्ष में भ्रमित करने का एजेंडा एकमात्र ऐसा है जो धर्म, जाति, संप्रदाय के बीच भेदभाव पैदा करता आया है। यह एजेंडा संविधान की धर्मनिरपेक्षता की मंशा के विपरीत सिध्द हो रहा है। इस पार्टी के पास भी विकास और जनकल्याण की योजनाओं के तो फार्मूले हैं, वे सब वे ही है जो आज़ादी के बाद पहली बार देश के संचालन की बागडोर सम्हालते हुए कांग्रेस ने निर्धारित किए थे। इस पार्टी ने पूर्व से चल रही योजनाओं और कार्यक्रमों के नाम अपने नेताओं के नाम पर बदले भर हैं, बाकी सूत्र वे ही हैं जो सभी दलों के होते हैं।
विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा अपनी अलग हैसियत बनाने के लिए कांग्रेस से कुछ मुद्दे छीन लिये गये हैं। इन्हीं मुद्दों के आधार पर इन दलों ने अपनी पहचान बनाकर जब राजनीति शुरू की तो मतपेटी में गिरने वाले मतपत्रों पर कांग्रेस के बजाय इन नये दलों के वायदों और आश्वासनों के वशीभूत होकर लोगों ने अपने-अपने ठप्पे लगा दिए। परिणाम स्वरूप कांग्रेस के मतदाताओं ने उन पार्टियों को वोट दिए जो कांग्रेस के अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों-जनजातियों और कमजोर वर्गों के कार्यक्रमों के नाम पर कांग्रेस से अलग हो चुकी हैं।
अपने पिछले कुछ अनुभवों से सबक लेते हुए कांग्रेस अपने आपको फिर अपने मूल मुद्दों को दृढ़ता के साथ उठा रही है और इन सबका क्रियान्वयन युवा वर्ग के हाथों में सौंप रही है। कांग्रेस में युवाशक्ति का प्रादुर्भाव शुरू हो चुका है। कांग्रेस में युवा नेतृत्व की एक ऐसी टीम तैयार हो रही है, जो भावी भारत के स्वरूप को निखारने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होकर मैदान में आई है। अब कांग्रेस अपनी धमनियों में बह रहे नये खून के संचार से शक्तिमान दिखाई देने लगी हैं युवा टीम के राजनैतिक मैदान में उतरने से विभिन्न पार्टियों के बीच एक तरह से खलबली मच गई है। ये पार्टियाँ युवाओं के जोश को आगे बढ़ने में राह का रोढ़ा बनने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। राहुल गांधी  के उदय से और युवाओं के दिलों में उनकी बढ़ती रही पैठ से कुछ पार्टियां तिलमिलाने लगी हैं।
दलितों का उत्थान कांग्रेस का अपना महत्वपूर्ण मुद्दा है। बसपा ने दलित-उत्थान के नाम पर एक ऐसा माहौल बना रखा है कि सिवाय बसपा के कोई दलितों के उत्थान-कार्यक्रमों की बात नहीं कर सकता है। हाल ही में उत्तरप्रदेश की यात्रा के दौरान जब राहुल गांधाी के कार्यक्रम में एक गांव के दलित परिवार के बीच पहुँचने का कार्यक्रम जुड़ा तो बसपा को अपने हाथ की बाज़ी खसकती नज़र आने लगी। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी  के बढ़ते प्रभाव से झल्लाई बसपा ने राहुल के इस कार्यक्रम का कुछ इस तरह मज़ाक बनाने का प्रयास किया जिससे कि लोगों की नज़र में राहुल गांधी  की छवि गिर जाय। बसपा की सुप्रीमों ने इसे कांग्रेस का एक राजनैतिक हथकंडा बताया और यहाँ तक कह डाला कि राहुल गांधी  दलितों से मुलाकात के बाद घर जाकर साबुन से नहाते हैं। अपने राजनैतिक वर्चस्व पर आ रही आंच को बचाने के खातिर इस तरह की टिप्पणियां यही साबित करती है कि कांग्रेस में युवा शक्ति का प्रादुर्भाव अन्य दलों को हज़म नहीं हो पा रहा है।
राजेन्द्र जोशी