संस्करण: 14अप्रेल-2008

हड्डियां गलाता जीवनदायी जल

प्रमोद भार्गव

मधयप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में जीवनदायी जल, अपंगता का कारण बना हुआ है। इस जल से प्रदेश के हजारों गांव अभिशप्त हैं। इस जल का प्रदूषण समाप्त करने के लिये प्रदेश सरकार के पास कोई फौरी उपाय नहीं है और न ही शुध्द जल के वैकल्पिक स्त्रोत तलाशने की मंशा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों में दिखाई दे रही है। हालात यहां तक बदतर हो गए हैं कि फ्लोरोसिस प्रभावित ग्रामों में लोग अपनी बेटियां तक ब्हायना नहीं चाहते। इसलिए इन ग्रामों में क्वांरों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है, जो कालांतर में एक नई समस्या के रूप में सामने आ सकती है। यही नहीं फ्लोरोसिस के अभिशाप से अभिशप्त ग्रामों की संख्या एवं जल स्त्रोतों की संख्या पर नियंत्रण पाने की बजाय इनकी संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।
पिछले साल तक गुना जिले के 126 गांवों में फ्लोरोसिस का खतरा मंडराने की जानकारी सामने आई थी, जो अब बढ़कर 400 गांवों में फैल गई है। जिन अभिशप्त जल स्त्रोतों की संख्या 128 थी वह अब 300 के आस पास हो गई है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा की गई इन ग्रामों में जांच के बाद ऐसे 184 जल स्त्रोत चिन्हित किए गए हैं जिनमें फ्लोरोसिस अपंग बना देने की स्थिति तक उपलब्ध है। इन जल स्त्रोतों में फ्लोराइड की मात्रा 10 मिलीग्राम प्रतिलीटर से भी ज्यादा है। नियमानुसार कोई भी सरकारी नलकूप खनन करने से पहले पीएचई द्वारा उस क्षेत्र के पानी की जांच प्रयोगशाला में कराई जाती है। प्रयोगशाला की अनूकूल रिपोर्ट आने के बाद ही नलकूप का खनन कराए जाने का प्रावधान है, लेकिन यह जांच केवल कागजी खानापूर्ति भर रह गई है। गुना जिले के राधौगढ और चांचौड़ा विकासखंडों के ग्रामों में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है। पैंची और उसके आसपास के 73 ग्रामों के 115 जलश्रोतों मे फ्लोराइड की मात्रा 10.5 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई है जो बेहद खतरनाक है। यदि पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन भोपाल द्वारा जारी आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश के गुना जिले में इस समय फ्लोराइड पेयजल स्त्रोतों में सबसे अधिक है। इसके बाद जबलपुर आता है जहां फ्लोराइड की अधिकतम मात्रा 5 मिलीग्राम प्रतिलीटर पाई गई है। इतनी गंभीर स्थिति होने के बावजूद अभी तक गुना प्रशासन द्वारा इस दिशा में समस्या के समाधान के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
शिवपुरी जिले के करैरा व नरवर विकासखण्डों के दो दर्जन से भी ज्यादा गांवों के ग्रामीणों पर घातक 'फ्लोरोसिस' का कहर बरपा है। यहां के पानी में हानिकारक तत्व फ्लोराइड की अधिकता से लोग असमय बूढे हो जाते हैं, उनकी हड्डियाँ गलने लगती हैं। फ्लोरोसिस से सर्वाधिक प्रभावित गांव नरवर विकासखण्ड के हथेडा, जरावनी और बनयायी हैं। इन गांवों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा 4.2 पी.पी.एम. की सीमा-रेखा पार कर चुकी है।
फ्लोरोसिस प्रभावित गांवों के लोगों के शरीर धीरे-धीरे झुक रहे हैं। उनके हाथ-पैर ऐंठ रहे हैं, दांत असमय ही पीले पड़कर गिर रहे हैं। पच्चीस साल की उम्र पार करते ही इन गांवों के लो अपंग होने लगते हैं। प्रशासन ने इस गंभीर समस्या की ओर कोई विशेष धयान नहीं दिया है। क्षेत्रीय विधायक भी इस मामले में चुप्पी साधे रहते हैं। बीते दस सालों में प्रशासन द्वारा इनके शरीर में फ्लोराइड की जांच के लिये दो शिविर लगवाए गए। इन शिविरों में जांच के बाद यह साबित हो गया कि यहां के ग्रामवासियों में अपंगता का कारण यहां का प्रदूषित जल है।
इन तीन गांवों की आबादी लगभग चार हजार है। इनकी सीमाऐं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। 45 साल का मलखानसिंह 20 साल से अपाहिज है। उसकी कमर में, घुटनों में और पैरों की गांठों में दर्द होता है। उसके दांतों में चमक उठती है और अब वह अपनी इच्छानुसार हाथों को ऊपर-नीचे भी नहीं कर सकता । कमोबेश यही हालत 40 साल के रामचरण, 55 साल की जसिया और 30 साल की रामकली के अलावा अनेक लोगों की है। 10-12 साल का बालक छोटे राजा भी इस घातक रोग की गिरफ्त में है। उसके दांत पीले पड़ गए हैं। किनारों पर दांतों के गलने से दो दांतों के बीच की दूरी बढ़ गई है। ठंडा पानी पीते समय उसके दांतों में दर्द होता है।
डांक्टरों के अनुसार फ्लोरोसिस की चपेट में आने पर इससे फिर जीवन भर छुटकारा नहीं मिल सकता । वैसे मनुष्य के शरीर में थोड़ा बहुत फ्लोराइड तो तम्बाकू, सुपारी, टूथपेस्ट आदि से भी पहुंचता है। यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक शिवपुरी जिले के हथेड़ा, बनियानी, जरावनी, विची, सानी, फूलपुर, मिहावरा, दोनी, गोकुंदा और टेहरटा गांवों में फ्लोराइड की जल में मात्रा 4.2 पी.पी.एम. को पार कर चुकी है।
झाबुआ जिले के गांवों में तो शिवपुरी के गांवों से कहीं ज्यादा भयावह स्थिति है। इस इलाके में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा अभी तक किय गये सर्वेक्षण में 78 गांवों के 178 हैंडपम्पों के पानी में फ्लोराइड की बहुत ज्यादा मात्रा पाई गई है। इस कारण इस इलाके में भी फ्लोरोसिस की शंका जाहिर की गई है। फलस्वरूप प्रशासन ने ग्राम पंचायतों व सम्बन्धित महकमों को यहाँ के हैण्डपम्प तुरंत बंद कर देने के आदेश दिये थे। लेकिन कोई वैकल्पिक स्त्रोत न होने कारण ग्रामवासियों ने इस आदेश पर अमल नहीं होने दिया।
झाबुआ जिले की अलीराजपुर के ग्राम बडी, लक्ष्मणी, ढोलखेड़ा, राजावाट, तीती, नानपुर, सेजगांव में फ्लोरोसिस का असर ज्यादा है। इन्हीं गांवों के हैण्डपम्पों को प्रशासन ने बंद करने की कोशिश की थी जिसे ग्रामिणों ने सफल नहीं होने दिया। ग्रामीणों का तर्क है कि हैण्डपम्प बंद कर दिये जायेंगे तो ग्रामीण ताल-तलैयों और नदी-नालों का रूका हुआ व प्रदूषित जल पीने को विवश होंगे। नतीजन ग्रामवासी हैजा, डायरिया, दस्त आंत्रशोधा जैसी जानलेवा बीमारियों से पीड़ित होने को मजबूर होंगे। बहरहाल, झाबुआ में प्रशासन के पास फिलहाल इस समस्या के निपटने के लिये शुध्द जल प्रदाय करने की कोई योजना नहीं है।
प्रदेश के मण्डला जिले के तीन गांवों में और भी भयावह स्थिति है। तराईनानी, फूलपानी और नटेरा गांवों के 158 बच्चे अपंग हो चुके हैं। इन गांवों के हैण्डपम्पों में फ्लोराइड की मात्रा 11 पी.पी.एम. पाई गई है। फ्लोराइड की यह मात्रा प्रदेश के अन्य भागों के हैण्डपम्पों के जल में पाई गई फ्लोराइड की मात्रा की तुलना में
सर्वाधिक है। इस कारण इन गांवों के बच्चे फ्लोरोसिस और जेनुवल्गम-सिंड्रोम, फ्लोरोसिस की सहायक बीमारी है का शिकार हो रहे हैं। मण्डला के हैण्डपम्पों में फ्लोराइड की अधिकता का पता भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने कई साल पहले ही लगा दिया था। और उसने इस बाबत् जिला प्रशासन को आगाह भी किया था कि वह इन हैंडपम्पों को बंद कर ग्रामीणों को कुओं का पानी उपयोग करने के लिये कहे। लेकिन प्रशासन ने इन निर्देशों को कोई महत्व नहीं दिया।
यदि पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा 0.5 पी.पी.एम. हो तो वह मानव शरीर के लिये नुकसानदेह नहीं होती। लेकिन पेयजल में जब यह मात्रा 0.5 पी.पी.एम. से ऊपर बढ़ने लगती है तो शरीर उसी अनुपात में अपंगता का शिकार होने लगता है। इस जल को भी ''शुध्द'' करने के उपाय हैं। फ्लोराइड की अधिकता वाले हैंण्डपम्पों में हैंण्डपम्प अटैचड डी-फ्लोरीडेशन प्लांट लगाया जा सकता है। इस संयत्र में एक वॉल्व भी लगा होता है। जिसके माधयम से पीने व नहाने-धोने के लिये अलग-अलग पानी लिया जा सकता है। इस संयंत्र की कीमत 35 हजार रूपये के लगभग है।
जनवरी 1996 में यूनीसेफ ने शिवपुरी जिले के गांवों के हैण्डपम्पों के लिये ऐसे पांच संयंत्र दिये थे। इन संयत्रों में से चार हथेड़ा, विची फूलपुर और बरोदा में लगाए भी गये। कुछ दिन ये संयत्र चले भी। लेकिन यहाँ के लोक स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी इन संयत्रों से री-जनरेशन नहीं कर पाते, जबकि री-जनरेशन करना जरूरी होता है। लिहाजा तभी से स्थापित संयंत्र बंद पड़े हैं। पी.एच.ई. विभाग अब आई.आई.टी.
कानपुर से तकनीक विशेषज्ञ बुलाने की सोच रहा है। यदि ये संयंत्र बदस्तूर चलते रहें तो किसी हद तक फ्लोरोसिस पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
जल प्रदूषण से जुड़ी फ्लोरोसिस व अन्य बीमारियां अधिक गहराई से जल खींचने के कारण भी पैदा हो रही है। ऐसे जल में अनेक प्रकार के खनिज व लवण घुले होते हैं और जल की सतह पर जहरीली गैसें छा जाती हैं, जो अनेक रोगों का कारण बनती हैं। मोटे तौर पर बेसाल्टी चट्टानों में 90 फीट गहराई तक उपलब्ध जल पीने योग्य पीने योग्य होता है, परंतु पांच सौ फीट के करीब छिद्रण वाले नलकूप में खारे पानी की मात्रा ज्यादा होती है। इस कारण पानी की शुध्दता के लिये भू-स्तर के नीचे उपलब्ध जल भण्डारों को वर्षा जल द्वारा पुनर्जीवित किया जाना जरूरी है। झाबुआ क्षेत्र में बेसाल्टी चट्टानों का बाहुल्य है। इसलिये जल को प्रदूषण मुक्त करने के लिये पारम्परिक जल स्त्रोत सुदृढ करना अनिवार्य है।
प्रमोद भार्गव