संस्करण: 14अप्रेल-2008

गांवों में मुद्दा नहीं है महंगाई

बालकवि बैरागी

यह सर्वथा मेरा अनुभव है पर जब यह संस्मरण बना, सम्वाद हुआ तब मैं अकेला नहीं था। मेरे साथ मेरे और भी मित्रगण थे। इस संस्मरण को कोई माने या ना माने इससे मेरा कोई सरोकार नहीं है पर आप जानें अवश्य यह मेरा मंतव्य है। भारत कोई छोटा देश नहीं है। हज़ार दो हज़ार शहरों और पाँच सात हज़ार नगरों को छोड़ दें तो भी भारत पाँच लाख अस्सी हज़ार गांवों का देश है। शहरों, नगरों, कस्बों, गाँवों, देहातों, और ढाणियों में बस हमारा भारत सचमुच अद्भुत देश है। यहाँ की अस्मिता, चिंता, सम्वेदना, अमीरी, गरीबी, फकीरी, अल्हड़ता और अपनापन सब कुछ अनुपम है। अलबेला रसायन है इसका प्रमेय।
मूलत: मैं एक देहाती आदमी हूँ। ठेठ गांव से चला। परिवार की पूर्व पीठिका में आपको ले जाना कोई अच्छी बात नहीं है पर आज मैं गांव(देहात) कस्बे और नगर (जिसे आप शहर भी कह सकते हैं) तीनों का निवासी हूँ। ये तीनों इकाइयाँ मुझमें जीवित हैं। मैं भी इन तीनों में पाया जाता हूँ। मैं क्रम से तीनों का उल्लेख करता हूँ।
पहला नाम है ग्राम, गांव या देहात का जिसे आप पीपलोन के नाम से जान लें। मधयप्रदेश के नीमच जिले की मनासा तहसील का यह गांव मनासा से यही कोई डेढ़ दो किलोमीटर के आसपास हज़ारों वर्षों से बसा हुआ है। पिछले तीन सौ वर्षों से मेरा परिवार इस गाँव से जुड़ा हुआ है। मेरा बचपन इस गाँव में गुज़रा। आज भी इस गाँव की आबादी कुल 67 परिवारों की है। याने कि कुल जमा 450-500 लोग यहाँ रहते हैं। जातियाँ भी इनी गिनी हैं। मीणा, गायरी, माली, भील, बलाई और एकाध परिवार मुसलमानों का। फिर बस। मैं यहाँ का मूल निवासी हूँ। मेरा लक्ष्मीनारायण भगवान वाला मंदिर मैंने यही बनवाया जिसमें मधयप्रदेश के महामहिम राज्यपाल डॉ. श्री बलरामजी जाखड़ ने दिनांक 15 मई 2005 को पहिली आरती करके मंदिर को देवार्पित किया। मेरे परिवार का एक हिस्सा याने मेरा बड़ा बेटा सुशील नन्दन बैरागी(मुन्ना भैया) आज भी यहाँ का निवासी है। इस गाँव को लोग पीपलोन, पीपन या फीफण भी कहते हैं।
मेरे निवास का दूसरा ठिकाना है मनासा। जो मेरा देशप्रसिध्द पता है। पुरानी होल्कर रियायत का यह कस्बा आज मधयप्रदेश के नीमच जिले की एक तेहसील और अनुविभाग का मुख्यालय है, जिसकी आबादी इस समय 26000 से 30000 के बीच में होगी। इसे आप 'कस्बा' कह सकते हैं। यह गाँव बड़ा होता है पर शहर नहीं माना जाता। लोग इसे 'नगर' की श्रेणी में मान लेते हैं पर मैं मानता हूँ कि यह 'नगर' का रूप लेने की प्रक्रिया से गुज़र रहा है।
मेरे निवास का तीसरा ठौर है 'नीमच'। पूर्व ग्वालियर रियासत का यह नगर मधयप्रदेश का राजस्थान की सीमा से जुड़ा सीमान्त जिला मुख्यालय है। सन् 1991 से मैं यहाँ भी पाया जाता हूँ। नीमच की आबादी आज सवा लाख से कुछ ऊपर यही कोई एक लाख पैंतीस हज़ार या चालीस हज़ार के आसपास होगी।
सो, इस संस्मरण के लिए आप इन तीनों स्थानों के नाम याद रख लें। पीपलोन, पीपन या फीफण ठेठ देहात या कि गाँव। मनासा याने कि कस्बा या नगर और नीमच याने कि शहर। मेरा यह संस्मरण मेरे मूल गांव पीपलोन का है। हुआ कुछ यूँ कि 26 जनवरी को रेल बजट और 29 फरवरी को केन्द्र की सरकार का सालाना बजट आया। मनमोहन सरकार ने यही कोई चार करोड़ किसानों का करीब साठ हज़ार करोड़ रुपया बैंकों का कर्ज़ माफ़ कर दिया। सारे देश में दीवाली हो गई। पटाखे फूटे। फुलझड़ियाँ छूटी। जुलूस निकले। मैं भी इन समारोहों में शामिल रहा।
और बजट के तत्काल बाद वहीं हुआ जो एक विकासशील देश में होता आया है। सटोरियों, मुनाफाखोरों, जमाखोरों और किसान विरोधियों ने अपना जाल फेंका। महँगाई आसमान छूने लगी। निम्न वर्ग और निम्न मधयम वर्ग महँगाई की चपेट में कराह उठा। गरीब की थाली चीख मारने लगी। अखबारों के पन्ने तरह तरह की बातों से भर गए। राजनीति निर्वस्त्र होकर ऑंगन नाचने लगी। साग, सब्जी, दाल, दलहन, गेहूँ, ज्वार, खाने का तेल, घी, दूध, शक्कर, गुड़, धानिया, लोहा, सीमेन्ट याने कि हर चीज़ पराई हो गई। सरकारें और राजनैतिक पार्टियाँ एक दूसरे को कोसने लगी। धरने, प्रदर्शन, हाय-हाय, झण्डे डंडे सड़कों पर निकल आये।
ऐसे में एक दिन मैं बिना किसी काम के अपने गांव पीपलोन जा पहुँचा। जब भी उस गाँव में मैं पहुँचता हूँ प्राय: सारा गाँव मुझ से मिलने आ जाता है। मात्र कुशल क्षेम लेना देना ही मेरी कार्यसूची का अकेला विषय होता है। मेरे साथ मेरे दो मित्र और भी थे। यूँ तो वे भी हैं ग्रामीण ही किन्तु समय ने उनको अर्ध्द शहरी बना दिया है। कुशल क्षेम के साथ साथ मैंने उपस्थित ग्रामीणों से प्रश्न करना शुरू किया-
''गाँव में बैलगाड़ियाँ कितनी हैं ? प्रश्न (मेरे बचपन में यहाँ 30/35 बैल गाड़ियाँ थी)''
''केवल आठ हैं।'' उत्तर आया
''गाँव में ट्रैक्टर कितने हैं ?'' अगला प्रश्न
''चार हैं।''-उत्तर
''सायकलें कितनी हैं ?'' मैंने पूछा
''यही कोई 20/25 होंगी।'' सोचा समझा उत्तर आया।
''मोटर सायकलें-फटफटियाँ-कितनी हैं ?'' प्रश्न समृध्दि को टटोलने वाला था।
''सात आठ हैं।'' उत्तरदाताओं की प्रसन्नता बढ़ गई।
''गांव में मोबाइल फोन कितने हैं ?'' (मेरे सामने खड़े तीन चार लोगों के हाथों में मैं देख रहा था।)
''अरे दादा ! मोबाइल तो 35-40 होंगे ही ? कई लोगों के पास हैं।'' इस उत्तर में गर्व था।
मेरे साथी अगले प्रश्न की प्रतीक्षा में नहीं थे। उनके अपने गाँवों की भी कमोबेश यही तुलनात्मक स्थिति थी। मैंने पूरी गंभीरता से सवाल उछाला-''दिल्ली की सरकार का बजट आ गया।'' बाज़ारों में आप लोग जाते ही हो। इस भरी महँगाई ने आप लोगों के चूल्हों और थालियों पर कितना असर डाला ? ''
इस कठोर प्रश्न का जो उत्तर आया उसने मुझे रोमांचित कर दिया। ठहाका लगाते हुए खड़े लोगों ने कहा- ''दादा ! ये नीमच-मनासा वाली बातें वहीं करना यहाँ इस गाँव में क्यों करते हैं ? घासलेट और खाने के तेल के सिवाय हर चीज़ तो यहीं पैदा हो रही है। दस बीस दिनों में अजार बजार भी ठिकाने आ जायेंगे। शहरों का रोना वहीं रोइये।''
पाँच लाख अस्सी हज़ार गाँवों में से एक गाँव बोला। मैं आश्वस्त नहीं किन्तु चकित हूँ। आप तक यह संस्मरण पहुँचे तब तक कई नये प्रश्न उछल जायेंगे पर इस उत्तर को भूलना मेरे लिये फिलहाल तो मुश्किल है। शहर चीखता है-नगर सीखता है-गाँव बोलता है।
बालकवि बैरागी