संस्करण: 14सितम्बर-2009

 

टूटती तस्वीर
 

ज्योर्तिमाया शर्मा

क्या भाजपा के संबंध में आरएसएस एक नई भूमिका अदा कोशिश में हैं? इस सवाल का जवाब है कि आरएसएस हमेशा अतीत में आगे देखता है। अतीत के साथ कलह का मामला दिल्ली में भाजपा की छह महीने वाली गठबंधन की सरकार के दौरान सामने आया था, जब इसके दो वरिष्ठ स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी संघ के दमघोंटू नियंत्रण से बाहर निकलने की राह तलाश रहे थे और भाजपा को एक अलग धारा में ले जाने की कोशिश कर रहे थे। संघ के लिए कभी कुछ नहीं बदलता-कोई भी परिवर्तन के विचार तो केवल लौकिक लीला या फिर यह इस अद्भुत संसार की रेखांकित प्रकृति है और वास्तविकता के साथ कुछ करने के बहुत थोड़ा है। दूसरी तरफ, वास्तविकता के बारे में संघ क्या महसूस करता है, सोचता है, जानता है और निर्णय करता है। नागपुर में, जहां आरएसएस का मुख्य कार्यालय स्थित है, स्थायित्व की यह माया और निश्चितता के घमंड को भारत के लोगों की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार की भारी पुलिस बल की सुरक्षा प्राप्त है।

आरएसएस के वे कौन से सिध्दांत हैं, जो कभी नहीं बदलेंगे? संघ का विश्वास है कि राजनीति स्वार्थपरकता पर आधारित है और अधाक स्वार्थपरकता राजनीति, शक्ति और सरकार की आश्यकताओं को और बढ़ाता है। राजनीति ओर जाने वाली राह से विमुख होने के लिए केवल एक मार्ग है-सामाजिक एकता, उस समाज के भीतर व्यक्तियों के आंतरिक उत्कृष्ठता को सिंचित करें और असल शक्ति के वास्तविक प्रदर्शन के रूप संस्कृति का गुणगान करें। विवाद, असहमति, प्यार और घृणा केवल एक समुचित तरीके से गठित एकता में ही संभव है, न कि व्यक्तिकता के रूप में। प्रजातंत्र स्वीकार नहीं होता, क्योंकि यह व्यक्तिवाद और स्वार्थपरकता को प्रोत्साहित करता है। प्रजातंत्र के बारे में गोलवाल्कर प्रसिध्द वक्तव्य है कि यह एक ऐतिहासिक जरूरत भी नहीं थी। केवल एक 'वाद' जिसे आरएसएस ने अपनाया, वह है-हिन्दूवाद।

स्वच्छता और संपूर्णता के इस सिध्दांत को हासिल करने के क्रम में संघ ने परिकल्पना की एक छलांग लगाई। इनमें सबसे पहले इसने खुद को तथाकथित हिन्दू संस्कृति का अभिभावक, संरक्षक और प्ररिरक्षक बना लिया। दूसरा, इसने काल्पनिक राष्ट्रवाद के प्रवक्ता का चोला धारण कर लिया, जिसे जब साधारण भाषा में अनुदित किया तब उसका मतलब था-हिन्दू राष्ट्रवाद। तीसरा, वे खुद को एकपक्षीय और मनमाने ढंग से तथाकथित हिन्दू एकीकरण की जिम्मेदारी सौंप दी। अंतत: आरएसएस विश्वास करता है कि यहां हिन्दू समाज कहा जाने वाला कुछ है, और यह केवल समय की बात है कि यह हिन्दू समाज कब जागरूक होगा, दिन की रोशनी को देखें, और संघ के पैतृक आलिंगन में जाएं।

आरएसएस ने कल्पना की थी कि स्वयंसेवक, जो राजनीति से जुड़े थे, वे ऐसे बुध्दिमान की तरह है, जो दुनिया की बुराइयों को ठीक करते थे। वे विचारधारा और संघ के अंतिम मिशन के लिए ऐसी पृष्ठभूमि तैयार करते थे, जैसा गोलवल्कर ने सुझाया था। ये बुध्दिमान सालों से राजनीति नामक बदनाम वैश्या को सुधारने के बजाय उससे प्रेम करने लगे। ये उस वैश्या उन सारे प्रलोभनों पर भिनभिनाने लगे, जो उसने पेश किया, चाहे वह सत्ता हो या धन, पद हो या प्रसिध्दि। जसवंत सिंह जैसे नौकशाह तब इस दाग से अगल नहीं थे, लेकिन एक किताब लिखने के कारण भाजपा से निकाले जाने के बाद उन्होंने कहा कि भापजा के शीर्ष नेतृत्व सत्ता से मद में चूर होने लगे हैं। भाजपा ने न केवल यही सीखा कि राजनीति और सत्ता कुल मिलाकर उतना बुरा नहीं, बल्कि इसने संघ के कल्पनाशीलता पर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है।

भाजपा अब आगे यह दावा नहीं कर सकता कि संघ या इससे संबध्द इकाइयां हिन्दू संस्कृति की सुरक्षा व संरक्षण करती हैं, खासकर तब जब युवा लड़की को एक से घसीट कर निकाला जाता है और उनके साथ मारपीट की जाती है। उन्हें भी इसका अहसास है कि लोकतंत्र की जड़ें भारत में और भारतीय राष्ट्रवाद में गहरी हैं, हालांकि इसमें गांठ लगे हैं, पर यह एक लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद है। यह आभास भी इसका आरंभ है कि खुद हिन्दू ही हिन्दू एकीकरण की राह में एक बड़ी चुनौती है, जो तथाकथित हिन्दू समाज के कट्टर, अराजक व अनुदार विचार को मानने के लिए न बाध्य हैं और न ही वे मुस्लिम, ईसाई व पश्चिमी आधुनिकता की तरह हिन्दू पहचान की चेतावनी देने वाले संघ परिवार के कुछ नेताओं के भड़काऊ उपदेश खरीदने को बाध्य हैं। सबसे अहम बात यह है कि पिछले दो चुनावों में हार ने घर-घर में यह संदेश पहुंचा दिया है कि हिन्दू वोट कहा जाने वाला कुछ भी नहीं है। यह एक मिथ्या है, जिसे बढ़ा-चढ़ाकर स्थायी वोट बैंक का रूप दिया गया है।

दरअसल, भाजपा के संचालन के तौर पर आरएसएस की भूमिका बहुत छोटी है, सत्ता के भीतर या सत्ता के बाहर। भाजपा अब अन्य राजनीतिक दल की तरह ही है। इसमें भी विद्रोही है, हित समूह हैं और नंगी महत्वाकांक्षा वाले द्वीप भी हैं। वह सभी जो आरएसएस वर्तमान परिदृश्य में कर सकता है, जो एक विद्रोह दबाने के लिए दूसरे विद्रोह का समर्थन करने वाला है। विद्रोहियों के प्रति इसके सभी त्यागों में शायद ही कोई जन हित में है।

बिना राजनीति में रहे इसने निचले स्तर की जनता के लिए राजनीति में कटौती कर दी। साथ ही यह इसके साथ ही सभी के निष्पक्ष न्यायकर्ता होने का दावा करने लगा। जो भाजपा के भीतर राजनीति का स्वांग करते हैं। यह भाजपा का दस जनपथ हो गया है, पर एक दूरी के साथ।

सोनिया गांधी भारतीय जनता की एक निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। जबकि उनका अधिकार का वर्णन केवल इस तथ्य के हवाले से नहीं किया जाता। उनकी इस असलियत मजबूती से लोकतांत्रित प्रक्रिया के अंग के रूप में वर्णित है। वहीं आरएसएस के पास अभी शेष होगा अपनी उन्मादित दृष्टि और भाजपा के पागलपन जो उसी बहुचरित्र औरत के प्यार में दीवाना है, जैसा कि 1954 में गोलवलकर ने और 2004 में सुदर्शन ने कहा कि राजनीति के रूप में हम अपने अस्तित्व को जानते हैं।
 

 

ज्योर्तिमाया शर्मा
('टेरिफाइंग विजन: एम. एस. गोलवल्कर, द आरएसएस एंड इंडिया' के लेखक हैं )