संस्करण: 14 जून-2010   

माओवाद- उपचार के लिए
रोग की सही पहचान जरूरी
 

वीरेंद्र जैन

          हा गया है कि डॉक्टर से मर्ज नहीं छुपाना चाहिए वरना मरीज कभी स्वस्थ नहीं हो सकेगा। पिछले कई महीनों में हिंसा की कुछ ऐसी बड़ी घटनाएं घटी हैं कि माओवाद के खिलाफ देश भर में नफरत का वातावरण बनता जा रहा है। जिनमें दंतेवाड़ा में 76 आर पी एफ जवानों की हत्या, एक सार्वजनिक बस जिसमें के अर्ध सैनिक बल के जवान जबरन सवार हो गये थे को बम विस्फोट से उड़ा देना जिसमें बीस जवानों समेत पचास लोगों की मौत, तथा ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के रूट पर पटरियों से छेड़छाड़ कर के ट्रैन और एक माल गाड़ी को दुर्घटनाग्रस्त कर देना जिसमें एक सौ साठ लोगों की मौत सम्मलित है। बंगाल और बिहार में कई छोटी घटनाएं भी सम्मलित हैं। नफरत भी अंधा बनाती है और इस भावना में कई बार सच्चाई छुप जाती है।

           सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करने वाले अन्य संगठनों की तरह माओवादी भी भूमिगत रह कर काम करते हैं इसलिए सुनिश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि जो घटनाएं उनके नाम से हो रही हैं उन सब के लिए वे ही जिम्मेवार हैं या उनके नाम से कोई और अपराधी समूह हिंसा कर रहा है। मालेगाँव और गोआ में हुए बम विस्फोटों की जाँच के बाद पता चला था कि एक हिन्दूवादी संगठन ही हिन्दुओं की भीड़भाड़ वाली जगह में विस्फोट करके ऐसे सबूत छोड़ जाने वाला था जिससे सन्देह मुसलमानों पर होता और हिन्दू भड़कते व साम्प्रदायिक दंगा होता।
अर्ध सैनिक बलों और आम जनता की मौतों के लिए जिम्मेवार लोग कानून के अनुसार दण्ड के हकदार हैं व व्यवस्था उन्हें उनके किये का दण्ड देना चाहेगी। किंतु जब हम कानून का शासन होने की बात करते हैं तो सरकार किसी हिंसक संगठन की तरह व्यवहार नहीं कर सकती अपितु बातचीत के लिए आमंत्रित करने, उन्हें समर्पण करने की चेतावनी देने, व इन प्रयासों में असफल होने के बाद ही सरकार सैनिक कार्यवाही करना चाहेगी। इसमें यह भी पुष्टि करने की जरूरत होगी कि वे सचमुच भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत आने वाले अपराधों में सम्मलित थे या नहीं। स्मरणीय है कि समाचार पत्रों में उनके नाम से प्रकाशित बयानों के अनुसार उनका कहना है कि दंतेवाड़ा में आरपीएफ जवानों पर हुये हमलों और बस में हुए विस्फोट में उनका लक्ष्य सैनिक थे जो उनको मारने के लिए चलाये जा रहे ग्रीन हंट अभियान के लिए भेजे गये थे और अधिक सचेत होने के कारण उन्होंने पहले हमला कर दिया। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की घटना के बारे में प्रकाशित बयान जनसत्ता 6 जून 2010, में उनके हवाले से कहा गया है कि अभी तक वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि उक्त घटना में उनकी पार्टी के लोगों का हाथ है। उनके हवाले से कहा गया है कि वे पता लगा रहे हैं कि इसमें किसका हाथ है। मृतकों और घायलों के परिवारों के प्रति संवेदना और दुख व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यदि उनके लोगों का हाथ हुआ तो वे कड़ी कार्यावाही करेंगे, और सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकारेंगे। उनके प्रवक्ता आजाद के द्वारा जारी किये गये बयान के अनुसार उनकी पार्टी को शासक तंत्र की पुलिस , खुफिया एजेंसियां, अपने पालतू मीडिया के जरिये गलत सूचनाएं फैलवा रहा है, ताकि गरीब तबके के खिलाफ भारतीय राज्य की ओर से छेड़ी गयी जंग को सही ठहराया जा सके।''

          भले ही मामला जंग का हो किंतु हाल यह है कि उनके प्रभाव वाले हजारों वर्ग किलोमीटर का जंगल ऐसा है जहाँ पर स्वतंत्र भारत का कोई कारिन्दा अभी तक नहीं पहुँचा, जहाँ वे कुशलता से विचरण कर लेते हैं। हमें अभी तक सही सही यह भी नहीं मालूम कि उनके पास कुल कितने प्रशिक्षित सैनिक हैं। हमें यह भी नहीं पता कि उनके पास कुल कितने और कैसे कैसे हथियार हैं, कितने लेंड माइंस के उपकरण हैं तथा वे उन्हें कहाँ से प्राप्त होते हैं, उनकी वित्तीय व्यवस्था और विदेशी सहायता के बारे में केवल अनुमान भर हैं। हम ऐसी लड़ाई शुरू कर चुके हैं जिसमें दुश्मन की ताकत के बारे में हम अंधेरे में हैं। दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवानों की इक तरफा हत्या इसलिए हुयी क्योंकि माओवादी ज्यादा सजग थे और उनका सूचना तंत्र ज्यादा मजबूत था तथा इलाके के बारे में उन्हें ज्यादा अच्छी जानकारी थी। वे बार बार यह भी घोषित करते रहते हैं कि वे भले ही भारत सरकार और उसके सैनिक बलों के साथ संघर्ष में हैं किंतु आम जनता से उनकी कोई लड़ाई नहीं है तथा वे निर्दोष लोगों को मार कर आतंक नहीं फैलाना चाहते। उनके शिक्षित नेतृत्व को भारत सरकार की सैनिक ताकत का भी पता होगा तथा वे यह भी जानते होंगे कि श्रीलंका में बीस साल तक लड़ने के बाद भी लिट्टे को पराजित होना पड़ा और अंतत: वहाँ की सैन्यशक्ति ही जीती। पर इसके बाद भी वे लड़ाई छेड़े हुये हैं, और आक्रामक नजर आते हैं। पिछले दिनों अपने कार्य क्षेत्र में निरंतर अधिक संगठित होते नजर आ रहे हैं और अपना समर्थन बड़ा रहे हैं। बरबरा राव, महास्वेता देवी, अरुन्धाति राय, मेधा पाटकर आदि बुध्दिजीवी उनका समर्थन कर रहे हैं व अनेक गैर सरकारी संगठन उनकी परोक्ष मदद करते हैं व उनका पक्ष सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं।

         वे अपने संघर्ष को राजनीतिक संघर्ष बतलाते हैं और भारतीय संविधान तथा प्रचलित चुनाव तंत्र में अपनी अनास्था व्यक्त करते हैं। वे इस आधार पर शोषण के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की वकालत करते हैं क्योंकि उन्हें इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से शोषण समाप्त होने की उम्मीद नहीं है, इसके लिए वे चुनावों में भाग लेने वाली कम्युनिष्ट पार्टियों को भी अलग नहीं समझते। पश्चिम बंगाल में जहाँ पिछले 35 साल से कम्युनिष्टों का शासन है, उन्होंने गत दो तीन साल में उनके कई सैकडो कार्यकर्ताओं को मार डाला है। उनके बारे में ये प्रचारित किया जाता है कि वे आम लोगों को ही मारते हैं जबकि राजनेताओं के खिलाफ कुछ नहीं करते। पर सच यह भी है कि वे आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्द्देव भट्टाचार्य, झारखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबू लाल मराण्डी, पर प्राणघातक हमले कर चुके हैं व मध्य प्रदेश के एक मंत्री की हत्या कर चुके हैं। अभी हाल ही में वे छत्तीसगढ के एक सांसद के बेटे की हत्या कर चुके हैं।

         देश का राजनीतिक स्वरूप यह है कि पिछले बीस सालों से केन्द्र में किसी एक दल की सरकार नहीं बन सकी और लगातार गठबन्धन की सरकारें ही बनती रहीं हैं। इन सरकारों में छोटे दलों की तुलना में प्रमुख दल को समर्थन करने वालों का तुष्टीकरण करते रहना होता है। यूपीए सरकार में सम्मलित तृणमूल कंग्रेस ने चुनावों में खुले आम माओवादियों का समर्थन लिया था अपितु उनका एक सांसद तो माओवादी नेता के पक्ष में गीत लिखता रहता है व अनुशासन की बात करने पर त्यागपत्र देने की धमकी देता रहता है। झारखण्ड में भाजपा समर्थित शिबू सोरेन की सरकार को दो माओवादी विधायकों का समर्थन प्राप्त रहा था, जिनके दबाव में केन्द्रीय गृह मंत्री द्वारा उग्र बामपंथ के खिलाफ प्रभावित राज्यों की बैठक में शिबू सोरेन ने भाग नहीं लिया था। पंजाब में भाजपा अकाली दल की संयुक्त सरकार में खालिस्तानी उग्रवादियों को शहीद बताकर विधान सभा में उनका गुणगान किया जाता है तथा भाजपा उनका साथ देती है। गत 5 जून 2010 को नक्सल प्रभावित राज्यों के सांसदों की बैठक बुलायी गयी थी जिसमें ज्यादातर सांसदों ने नक्सलियों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल का विरोध किया व पिछड़े इलाकों में अधिकतम सम्भव विकास को तेजी से कार्यान्वित करने की सलाह दी। उनके अनुसार माओवादी वहीं अपना प्रभाव बड़ा रहे हैं जहाँ विकास के काम नहीं हुये। दूसरी ओर सच यह है कि माओवादी वर्तमान व्यवस्था की विकास की अवधारणा में भरोसा नहीं करते तथा किये गये विकास को तोड़ देते हैं। विकास के काम में लगे ठेकेदार और इंजीनियर उनके संसाधन बन जाते हैं। सांसदों द्वारा विकास का विकल्प प्रस्तुत करना भी कई मामलों में वैसा नहीं है जैसा नजर आता है। छत्तीसगढ में पदस्थ रहे नौकरशाह और राजनेता इन्हीं विकास के कामों के नाम पर कुबेर बन चुके हैं।

        दरअसल स्थिति बहुत सरल नहीं है इसलिए जरूरी है कि कार्यवाही से पहले उनका पूरा सच जाना जाये और तब जन प्रतिनिधियों को विश्वास में लेकर कोई रणनीति बनायी जाये। कोई भी अधकचरा कदम सरकार की हालत और बिगाड़ेगा, जिसका दुष्परिणाम अंतत: जनता भुगतेगी।

वीरेंद्र जैन