संस्करण: 14 जून-2010

माओवाद का समाधान सेना नहीं

 

स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

 

त्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में अप्रैल में अर्ध्दसैनिक बल के 76 जवानों की हत्या करने के बाद माओवादियों ने एक बस में विस्फोट कर 30 और जवानों की हत्या कर दी। माओवादियों को मारने के लिए कुछ केंद्रीय मंत्री दंतेवाड़ा के जंगलों में हवाई हमले करने की मांग करते हैं। यह कार्रवाई के शिकार नागरिक भी होंगे, जो माओवादियों को सबल बनायेगा। समस्या सैन्य नहीं है और ना ही इसका सैन्य हल है।

गृहमंत्री चिदंबरम कहते हैं, ''वह वायुसेना का सहयोग बम बरसाने के लिए नहीं, बल्कि चौकसी और सैन्यतंत्र के लिए चाहते हैं।'' यह भी एक अर्ध-सैन्य, अदूरदर्शी और विफल होने वाला उपाय है।अनेक राज्यों में माओवादी फल-फूल चुके हैं, लेकिन वे आंध्रप्रदेश में हार चुके हैं। आंध्रप्रदेश ने यह सफलता सैन्य बल के माध्यम से नहीं, बल्कि सुप्रशिक्षित और राजनीतिक रूप से सशक्त पुलिस तथा खुफिया रणनीति के माध्यम से प्राप्त की। पंजाब में सिख आतंकियों का दमन भी एक ऐसा ही उदाहरण है। ऐसी ही कार्रवाई माओवादी प्रभावित सभी राज्यों में करने की जरूरत है।

प्रारंभ में आंध्रप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने माओवादियों के साथ बातचीत करने की कोशिश की, पर उन्होंने पाया कि वे केवल समय खरीद रहे थे। इसलिए उन्होंने अकेले पुलिस ही नहीं, पूरे प्रशासन को लेकर एक नई रणनीति बनाई।पंजाब की तरह पहले, पुलिस को अतिरिक्त कर्मचारी, उच्च प्रशिक्षण, हथियार, गाड़ियां और संचार सुविधाएं मुहैया कराया गया। इसके बाद सरकार ने सबसे अधिक प्रभावित चार उत्तरी जिलों के जंगलों में सड़कों का एक गहन जाल बिछाया। एक जंगली इलाके को कुछ सकड़ों के भरोसे नियंत्रित करने की कोशिश जानलेवा है।

आंध्रप्रदेश में, सड़कों के नये जाल का उपयोग न केवल नये पुलिस थाने खोलने के लिए, बल्कि सभी तरह के सरकारी कार्यालयों और सेवाओं के लिए किया गया। इनमें सिंचाई, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और जनकल्याण सेवाएं (सस्ते चावल, रोजगार की योजनाएं) शामिल थे। पूर्व में जब माओवादियों का वर्चस्व था, ज्यादातर सरकारी कर्मचारी कार्यालय छोड़कार भाग गये थे और जहां नक्सलियों का कब्जा हो गया था। उन जगहों को फिर से हासिल करने के लिए रेड्डी ने हर तरह की सरकारी सेवाएं प्रदान कीं। इससे स्थानीय लोगों आत्मविश्वास बढ़ा कि राज्य सरकार यहां माओवादियों से निपटने के लिए थी। केवल इसी चलते पुलिस जासूसों, माओवादी दलों में घुसपैठ करने वालों की नियुक्ति कर पाई और माओवादियों निकाल बाहर किया।

1990 में माओवादियों से प्रभावित निर्वाचन क्षेत्रों में मौत के भय के कारण विधायक जाने की हिम्मत नहीं करते थे। लेकिन रेड्डी की रणनीति से माओवादी घटनाओं की संख्या में कमी आई, जो 2005 में 576 थी वह 2009 में घटकर 62 हो गई। इसी तरह इन घटनाओं में हत्याओं की संख्या 211 से 17 हो गई और पुलिसकर्मियों की मौत की संख्या 25 से घटकर 0 हो गई। दूसरी तरफ, अदिलाबाद, करीमनगर, वारंगल व खम्माम जैसे गंभीर रूप नक्सल प्रभावित जिलों के जीडीपी में 8 प्रतिशत से 32 प्रतिशत तक इजाफा हुआ। यह सामाजिक कार्यकर्ताओं के उन दावों को खारिज करता है कि माओवादियों के अधीन लोग बेहतर स्थिति में थे।

छत्तीसगढ़ में इस रणनीति को क्यों नहीं अपनाया जाता? मुख्य समस्या क्षेत्राधिकार की है। केंद्र सरकार सेना और अर्ध्दसैनिक बलों को नियंत्रित करती है। राज्य सरकार पुलिस को नियंत्रित करती है। चूंकि छत्तीसगढ़ में पुलिस असफल हो चुकी है, और चूंकि वहां किसी अन्य राजशेखर रेड्डी को बिठाया नहीं जा सकता है, इसलिए चिदंबरम् को केंद्रीय दल में लाया गया है। लेकिन यह गलत समाधान है।

आंध्रप्रदेश में, माओवादी-प्रभावित क्षेत्रों में पहले से ही बहुत सी सड़कें थीं, और जंगल बहुत घने नहीं थे। लेकिन दंतेवाड़ा में अभेद्य जंगल और कुछ सड़कें हैं। इस तरह के इलाकों में बलों को भेजना ऐसे संकटों के लिए एक इलाज है। पूरा छत्तीसगढ़ एक आदिवासी पट्टी है, जहां कम सड़के, घने जंगल और कुछ सरकारी दफ्तर हैं। आंध्रप्रदेश से भिन्न, पूरे प्रदेश में अधोसंरचना और सरकारी सेवाओं का अभाव है। माओवादी अक्सर एक प्रशासनिक शून्यता पर कब्जा जमाते हैं। पूरे प्रदेश को अच्छी अधोसंरचना और सेवाओं से आच्छादित करने में वक्त लगेगा। इस बीच, दंतेवाड़ा में एक अल्पकालीन समाधान की आवश्यकता है। यह जिला राज्य की राजधानी रायपुर से एक लंबी दूरी पर स्थित है और इनके बीच जो कुछ सकड़ें हैं, उसपर पूरी तरह से सरकार का नियंत्रण नहीं है।

निश्चित रूप से इसका समाधान आंध्रप्रदेश से उत्तर की दिशा होते हुए दंतेवाड़ा में जाना है। यह रायपुर से दक्षिण की दिशा होते हुए जाने की कोशिश या अर्धसैनिक बलों को लाने से ज्यादा बेहतर है। दंतेवाड़ा में बैलाडिल्ला के खदान केंद्र रायपुर से कमजोर स्थिति में जुड़े हैं, बल्कि यह आंध्रप्रदेश से मजबूती के साथ जुड़ सकते हैं, जो पहले से ही विदित है कि यह कैसे होगा। लेकिन इन प्रयासों को राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। भाजपा शासित छत्तीसगढ़ को दंतेवाड़ा में शांति व्यवस्था बनाने के लिए कांग्रेस शासित आंध्रप्रदेश से पुलिस और सड़क निर्माताओं को बुलाना कभी गंवारा नहीं होगा।

एक त्रिकोणीय समाधान की जरूरत है। केंद्र और दो राज्यों को एक संयुक्त कार्रवाई योजना पर सहमत होना होगा। केंद्र को दंतेवाड़ा अभियान के लिए सकड़ों और दूरसंचार के खर्च समेत सबसे अधिक धन प्रदान करना होगा।

छत्तीसगढ़ से पुलिस और प्रशासनिक कर्मचारियों को प्रशिक्षण और खुफिया सभा के लिए आंध्रप्रदेश जाना चाहिए और तब एक संयुक्त अभियान तैयार कर उत्तर की दिशा से दंतेवाड़ा में प्रवेश करना चाहिए। यदि यह योजना सफल होती है, तो माओवादी अगले जंगली जिले में भाग जाएंगे। उन्हें जिले दर जिले भगाना होगा और उन्हें पूरी तरह साफ करने में सालों लगेंगे।

कुछ विशेषज्ञ कहते हैं, इसका सही जवाब आदिवासी क्षेत्रों में निर्वाचित, पर्याप्त फंड आवंटित पंचायतें और आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर रोक है। ये सब वांछित उद्देश्य हैं, लेकिन पंचायत के रास्ते स्थापित होने वाले समानांतर सत्ता और धन के केंद्र को माओवादी कभी बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे। माओवादियों को पहले सुरक्षा बलों द्वारा तोड़ना ही होगा और इससे उत्पन्न खाली स्थानों को अधोसंरचना और सरकारी सेवाओं की स्थापना से भरते जाना होगा। अन्य सुधारों को बाद में किया जा सकता है।

स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
(ईटी से साभार)