संस्करण: 14 जून-2010

हिंदू धमाके : हिमशैल का शीर्ष
जागृत होने में विलम्ब-आतंकवाद की जांच




 

राम पुनियानी

जमेर में पवित्र ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ति की दरगाह के भीतर 11 अक्टूबर 2007 को बम धमाके हुए, जिसमें दो लोग मारे गए। इस मामले में केन्द्रिय गृहमंत्री ने अपने परंपरागत बयान में कहा कि धमाकों के लिए हूजी और लश्कर-ए-तैयबा जैसे समूह जिम्मेदार हैं, जो पहले भी इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल रहे हैं और इनका उद्देश्य देश के सांप्रदायिक सौहार्द को भंग करना है। अब तीन वर्ष बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक कार्यकर्ता देवेन्द्र गुप्ता और उनके साथियों को इन धमाकों के लिए दोषी पाया गया और उन्हें गिरफ्तार किया गया। इसके साथ ही अजमेर में हुए धमाकों से कुछ ही महीने पहले मई में हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए धमाकों के बीच जुड़ाव का खुलासा भी हुआ है।

एक समाचार यह भी है कि राजस्थान पुलिस द्वारा सबूतों के अभाव में अजमेर धमाकों की जांच में देरी के बावजूद जांच के मुख्य बिंदु उग्र हिंदूवादी दलों के इसमें शामिल होने की ओर संकेत कर रहे हैं। जब से मालेगांव बम धमाकों के मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को गिरफ्तार किया गया है, एक बात और सुनने में आई कि उनका संबंध डांग के स्वामी असीमानंद से है, जो क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख व्यक्तियों में से हैं। असीमानंद तभी से फरार है। अब महाराष्ट्र पुलिस के अलावा राजस्थान पुलिस को भी उसकी तलाश है।

पिछले कुछ वर्षों में धमाकों की जांच से जुड़े मामलों में आश्चर्यजनक खुलासे हुए हैं। पुलिस जांच को लंबे समय से मार्गदर्शन देने वाले शोध प्रबंध के अनुसार आतंकी समूह पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित हैं और वे देश में सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने के लिए कार्यरत हैं। इसके लिए वे इस्लामी इबादतगाहों में बम रख रहे हैं। इस परंपरागत सोच और हमारी जांच एजेंसियों के बीच चले आ रहे अर्न्तजात पक्षपात के चलते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित और संबध्द आतंकी समूहों के लंबे समय से स्पष्ट जुड़ाव के बावजूद उन्हें छुआ तक नहीं गया है। हेमंत करकरे द्वारा मालेगांव विस्फोट में साध्वी की मोटरसाइकिल का उपयोग किए जाने के अखंडनीय साक्ष्य और अन्य लोगों, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, स्वामी दयानंद पांडे और सेवानिवृत्त मेजर उपाध्याय की इसमें सहभागिता के संबंध में खोज के बाद से इस रैकेट का भंडाफोड हुआ।

हेमंत करकरे की दुखद हत्या के बाद से एक बार फिर इस मामले की जांच धीमी पड़ गई है। इतने पुख्ता सबूतों की उपलब्धता के बाद कुछ जांच अधिकारियों पर इन समूहों द्वारा फैलाए जाने वाले आतंकवाद से खतरों के बारे में जागृत होने का दबाव है। साध्वी और उससे जुडे'' अन्य लोग जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा से या संगठन से किसी भी प्रकार से जुडे'' हैं, द्वारा किए गए आतंकी हमलों का एक तय प्रारूप है। इससे हमारी जांच एजेंसियों के पेशेवर सामर्थ्य पर काफी सवाल उठने लगे हैं। धमाके ऐसी जगहों पर हुए जो पूरी तरह से मुस्लिम बाहुल्य थे। धमाके ऐसे समय पर हुए जब मस्जिदों में धर्मावलंबी भारी संख्या में एकत्रित थे। यह देखा गया कि धमाकों के बाद, अर्न्तजात पक्षपात से अंधी हो चुकी जांच एजेंसियों ने हमेशा की तरह कुछ मुस्लिम युवाओं को हिरासत में ले लिया। मीडिया में हूजी, लश्कर और सिमी के नाम परोसे जाने लगे, जिन्होंने जनता के अभिमत का निर्माण किया।

इन मामलों में दोहरी समस्या देखी गई। पहली, बेगुनाह लोगों को प्रताड़ित किया गया और जांच एजेंसिया के पक्षपातपूर्ण व्यवहार ने उनकी जिंदगी व कॅरियर तबाह कर दिया। दूसरा, असली गुनहगार एक के बाद एक प्रसन्नतापूर्वक अपना काम करते रहे। क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि आतंकवाद के खिलाफ हमेशा हल्ला मचाने वाले उनके धर्म व संगठन के कारण उन्हें पूरा संरक्षण मिलेगा।

इस प्रारूप की शुरुआत 2006 में नांदेड से हुई थी, जब बजरंग दल के दो कार्यकर्ता बम बनाने के दौरान मारे गए। इसी शहर में बाद में शिवसेना का एक कार्यकर्ता बिस्कुट के गोडाउन में मारा गया। 2008 में कानपुर में बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गए और यह सिलसिला लगातार चलता रहा। इस तूफान ने मालेगांव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा की मोटरसाइकिल के उपयोग का अखंडनीय साक्ष्य मिलने के बाद अपना रूख बदल लिया। महाराष्ट्र एटीएस द्वारा की गई बेदाग जांच से अन्य सहयोगियों (मतलब वे सभी संगठन, जो हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की विचारधारा के समर्थक हैं और जिनके मुख्य कार्यकर्ता इस विचारधारा में प्रशिक्षित हैं ) के जुड़ाव का भी खुलासा हुआ। साध्वी का चित्र भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथसिंह के साथ भी देखा गया। साध्वी के साथ ही असली गुनहगारों की गिरफ्तारी से आतंकी हमलों में निश्चित कमी दर्ज की गई। 4 जून 2008 को थाणे में हिंदू जागरण समिति के दो कार्यकर्ताओं को गड़करी रंगायतन के तलघर में बम रखने के मामले में गिरफ्तार किया गया, इस विस्फोट के कारण 7 लोग घायल हो गए थे। यही समूह वाशी, पनवेल में हुए धमाकों में भी शामिल था। हाल ही में नरक चतुर्दशी के दिन गोवा में हुए बम धमाकों में भी इसी समूह का हाथ था। यह समूह सावरकर और हेडगेवार का अनुयायी है और अपने सदस्यों को ईसाईयों व मुसलमानों के प्रति घृणा करने के लिए प्रेरित करता है।

इसी प्रकार 24 अगस्त 2008 को कानपुर में बजरंग दल के दो कार्यकर्ता बम बनाने के दौरान मारे गए। कानपुर रेंज के पुलिस महानिदेशक एस.एस सिंह ने अपने बयान में कहा कि उनकी जांच से जो तथ्य सामने आए हैं उनके अनुसार इस समूह की योजना पूरे राज्य में भीषण धमाके करने की थी। 23 अक्टूबर 2008 को इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि मालेगांव व मोडासा में हुए बम धमाकों में शामिल लोगों का संबंध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से है।

इसी प्रकार तमिलनाडु के तेनकासी में जनवरी 2008 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यालय पर हुए पाइप बम हमले को जेहादी मुसलमानों द्वारा प्रायोजित बताया गया। हालांकि जांच में कई हिंदुओं के नामों का खुलासा हुआ और बाद में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 1 जून 2006 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय पर हुए तथाकथित फिदायीन हमले में पुलिस के बयान के अनुसार तीन आतंकी मारे गए। जस्टिस कोलसे पाटिल की अध्यक्षता वाली नागरिक पूछताछ रिपोर्ट में पुलिस की भूमिका और बयान पर गंभीर संदेह व्यक्त किया गया। इस संदेह के खिलाफ अधिकारियों की ओर से किसी भी प्रकार का स्पष्टीकरण नही दिया गया।

राज्य सरकार व जांच एजेंसियों के इस प्रकार के व्यवहार से दुखी होकर अगस्त 2008 में हैदराबाद में नागरिक न्यायाधिकरण आयोजित किया गया। न्यायाधिकरण ने अपने निष्कर्ष में कहा, ''आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में, पीड़ितों को महत्व दिया गया, इसका दायरा और क्रियाकलाप आतंकवाद के खात्मे से कम, बल्कि मुसलमानों के क्रूर शिकार में अधिक संलिप्त है। अत: इससे जनता की स्वतंत्रता और अधिकारों का घोर हनन हुआ है, जिसके चलते मुसलमान स्वयं को पहले की तुलना में कहीं अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा, असली गुनहगार वस्तुत: आजाद घूम रहे हैं, जबकि गरीब और सीधे सादे मुसलमानों को उठाकर जेलों में ठूंसा जा रहा है। यह अधिकारों और पक्षपात का चरम बिन्दु है। एक बाद एक इसके शिकार लोग, जिन्हें उनके खिलाफ बिना किसी कानून सम्मत प्रमाण के उत्पीड़न और यातना दी गई, को न्यायाधीकरण के समक्ष पेश किया गया, जिसमें देश के प्रसिध्द शख्सियतें पूर्व न्यायाधीश, वकील और जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे, और उनकी दुखभरी कहानी विचलित और दुखी सैकड़ों श्रोताओं को सुनाया गया।''

एक बड़ी अड़चन, जिसने सच्चाई को बाहर आने से रोका, वह यह है कि विस्फोट के मामलों की जांच आसान नहीं है और यह बहुत हद तक जांच अधिकारी की प्रवृत्ति और पक्षपात पर निर्भर करता है। इन मामलों में मीडिया ने उन्हीं बातों को उठाया, जिसे पुलिस द्वारा उनके सामने पेश किया गया और कोई ज्यादा स्वतंत्र मत सामने नहीं आया। जिन लोगों ने पुलिस के बयान पर शंका की, उन्हें राष्ट्रविरोधी करार दे दिया गया और मीडिया ने उन लोगों से खुद को समान दूरी बनाये रखा, जो पुलिस द्वारा प्रयुक्त सिध्दांत में सुराख की चिंता करते हैं। पत्रकारिता का प्रचलित तरीका राज्य के बयान पर शंका करने की होनी चाहिए और इसके उलट बयान देने वालों को खारिज नहीं करना चाहिए। आतंक के मामलों में इस तरीके को ताखे पर रख दिया गया। यह इसलिए क्योंकि अब तक जांच को सही दिशा नहीं दिया गया, और बहुदा यह पूरी तरह दोषपूर्ण है, जैसा कि अजमेर और अन्य ऐसे ही मामलों से जो सच्चाई सामने आ रही है। एक उम्मीद है कि प्रोफेशनलिज्म पक्षपातों को पर्दाफाश करता है और ऐसे मामलों में स्वतंत्र मतों को दबाया नहीं जाता, यदि हम सच्चाई तक पहुंचना चाहते हो, यदि हम यह सुनिश्चित करना चाहते है कि ऐसे हमलों को दोहराया नहीं जाए।

 राम पुनियानी