संस्करण: 14 फरवरी -2011

बुजुर्गो का आशियाना

? अंजलि सिन्हा

 

च्चे जब बडे हो जाय और अपनी घरगृहस्थी बसाने की योजना बनायें तो साथ में अपने घर-मकान के बारे में भी संयोजन करें ताकि यदि वे अकेले या सिर्फ एकल परिवार में रहना चाहे तो कम-से कम किसी को उनको घर से निकालना न पड़े। हाल में तीसहजारी कोर्ट की एक जिला जज ने लामपुर भिक्षुक गृह का औचक दौरा किया था जिसमें कम-से-कम 50 ऐसे बुजुर्ग मिले जो अच्छे पढ़े लिखे थे तथा जिनमें से अधिकांश के पास अपना घर है मगर वे वहां डाल दिए गए हैं। (ख़बर 4 फरवरी 2010) ये बुजुर्ग राजधानी की सड़कों पर भीख मांगते थे, जहां से गिरतार कर उन्हें वहां भेजा गया है। निश्चित ही ऐसी स्थिति तभी आयी होगी जब उनके परिवारवालों ने उन्हें या तो घर से निकाल दिया होगा या ऐसी स्थितियां आयी होंगी कि उन्होंने चुपचाप घर छोड़ना मुनासिब समझा होगा।

ज्ञातव्य हो की यह मामला सिर्फ एक भिक्षुकगृह की है। अन्य भिक्षुकगृहों के अलावा बेसहारा खुले में दिन काटनेवालों की संख्या तथा राजधानी के अलावा देशभर में ऐसे लोगों की संख्या का सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है। ढ़लते उम्र में जिस प्रकार की स्वास्थ्य सुविधाएं तथा देखरेख की जरूरत होती है वह सब इन्हें मयस्सर तो नहीं ही होगा साथ में अपनी रोटी की जुगाड़ की चिन्ता भी करनी होगी।

ऐसे बेसहारे बुजुर्गों के मुद्दे तथा समस्या पर जब भी चर्चा होती है तो समाज , प्रशासन तथा अदालतें सभी में यही राय व्याप्त होती है कि बेचारे बच्चों के बेरुखी के शिकार है। समस्या का यह एक पहलू जरूर है जिसमें बच्चें कई बार अपनी जिम्मेदारी नही निभाते है। वे एक जिम्मेदार नागरिक और व्यक्ति बनें तो परिवार और समाज दोनों के हित में रहेगा। यह भी देखा जाता है कि अक्सर कुछ सन्तानें जब स्वयम् शादीशुदा तथा बालबच्चेदार होते तब भी स्वतन्त्रा गृहस्थी चलाने की व्यवस्था नहीं करते और मातापिता के घर के ही अपनी गृहस्थी चलाने लगते है जो बाद में तनावपूर्ण सम्बन्ध होने पर वर्चस्व की लड़ाई भी बन जाता है। मातापिता अपनी स्वतन्त्रा गृहस्थी से बेदखल हो जाते है । बुजुर्ग या बेसहारा को सहारा देना एक अलग मुद्दा है लेकिन भावनाओं की दुहाई देकर तनावपूर्ण स्थिति में भी जबरन साथ रहना कम पीड़ादायक नहीं होता। हाल के वर्षों में कुछ ऐसे केस अदालतों में भी आये हैं जिनमें माता या पिता ने अपने मकान पर बेटे बहू के काबिज हो जाने की शिकायत की है। अक्सर भारतीय परिवेश में जब शादी के बाद बहू घर आती है तो कहा जाता है कि अब उसका राज चलेगा। कुछ दिन अच्छा चल भी जाता है लेकिन तनावपूर्ण रिश्ते आम परिघटना है। ऐसे में सम्भवत: प्रथम सीख भी यही मिलनी चाहिये कि हर व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरुष अपनी गृहस्थी अपने बलबूते पर बनाये फिर चाहे सहमति के आधार पर रहे किसी के साथ यानि मातापिता के साथ या फिर उन्हें अपने साथ रखे। संयुक्त परिवारों की महानता की खोखली दुहाइ देने से समाधान अभी तक तो निकला नहीं है और न ही निकलने की सम्भावना है। दूसरे यह विचार इस हकीकत की भी अनदेखी करता है कि आज की तारीख में संयुक्त परिवार नामक संस्था मृतप्राय है तथा हर जगह नाभिकीय/न्यूक्लीयर परिवार का ही बोलबाला है।

दूसरा एक पहलू इस मुद्दे में यह पाया गया है कि कई बार कुछ बुजुर्ग अपने जवानी के दिनों में अपनी ही इच्छा से जीवन जीते है जिसमें परिवार के दूसरे सदस्यों की जिम्मेदारी नहीं लेते है जिसमें उनके बच्चे भी शामिल होते है। मसलन घरपरिवार को छोड़कर बाहर चले जाना या उन्हें किसी लायक बनने की चिन्ता नहीं करना आदि। ऐसे में सदस्यों का न तो लगाव होता है न ही जिम्मेदारी का बोध।

तीसरा पहलू यह समझने की जरूरत है कि कुछ ऐसे भी लोग होंगे जिनके बच्चे न हो या शादी न किया हो या उसकी अपनी मर्जी परिवार के साथ नहीं रहने की हो, विचार ,रहनसहन आदि का अन्तर हो सकता है। ऐसे में क्या समाधान होगा ? सरकारी स्तर से ऐसी नीति मौजूद होनी चाहिये जिसमें व्यक्ति को व्यक्तिगत अधिकार हो कि वह चाहे तो किसी के साथ रहे या साथ न रहे तो भी उसके पास विकल्प हो।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 41 में भी वृध्दावस्था में सार्वजनिक सहायता दिए जाने की बात कही गई है। लेकिन वह नीतिनिर्देशक तत्व के अन्तर्गत है। इसे प्रभावी बनाने की बात होनी चाहिए, जिसमें सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी हो। हमारे संविधान की धारा 21 हर नागरिक को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार देती है। वह गरिमा कैसे प्राप्त होगी, यह मूल मसला है। क्या वह सिर्फ परिवार के अन्दर के इन्तजामात से ठीक होगी या इस मसले का राजनीतिक हल निकाला जाना चाहिए ? पश्चिम के कई देश जो घोर पूंजीवादी हैं, वे भी इतनी व्यवस्था किए हैं कि कोई अशक्त असहाय धूल-धूप-भूख से प्राण न त्यागे। यद्यपि उन्हें भी ( और हमें भी) घर के अन्दर के गैरबराबरीपूर्ण रिश्ते समाप्त करने तथा सदस्यों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है, किन्तु यह सदिच्छा है तो मूल्यों में कैसे समाहित हो इसके लिए प्रयास करना चाहिए। लेकिन जहां तक नागरिक अधिकारों की गारंटी का सवाल है उसे तो राज्य को सुनिश्चित करना होता है।

वृध्दावस्था की पेंशन एक अति महत्वपूर्ण मसला है। जैसा कि अदालत ने भी पाया कि बुजुर्ग भीख मांग रहे हैं और भिक्षुगृहों में भी उनकी संख्या अच्छीखासी है। जो सीधो भीख नहीं मांगते है वे पैसे-पैसे के लिये मोहताज हो जाते है । ऐसे में यदि सभी बूढ़ों को जिन्हें नौकरी के ऐवज में पेन्शन का भुगतान नहीं होता है उन्हें वृध्दावस्था पेंशन सुनिश्चित की जानी चाहिये। वैसे कुछ बुजुर्गों को यह पेन्शन मिलता भी है लेकिन एक तो वह पर्याप्त नही होता, दूसरे सभी बुजुर्र्गो के लिये वह अभी गारण्टी भी नहीं है। अदालतें, सरकारें , प्रशासन और समाज सभी मिलकर एक सुर में सिर्फ औलादों को ही नसीहतें देते रहे और सभी ऐसे सन्तानों के लिये सजा मुकर्रर कर दी जाय तो भी बुजुर्गियत महफूज हो जायेगी इसकी गारण्टी नही की जा सकती है। यह एक ऐसी अवस्था है जो उन सभी को आती है जिसकी मौत असामयिक रूप से किसी वजह से न हो गयी हो और सभी को यह पता होता है कि वह एक दिन बुजुर्ग हो जायेंगे। लिहाजा समय से पहले आर्थिक और मानसिक तैयारी भी जरूरी है। फिर तो बच्चे है और साथ में भी है तो अच्छा नही हो तो भी गरिमामय समय बीत सके इसके लिये नीतिगत फैसले भी जरूरी है।


? अंजलि सिन्हा