संस्करण: 14 फरवरी -2011

भारत भवन की संचालन व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह ?
प्रमुख ट्रस्टी हेमा मालिनी की उपेक्षा से खुली कलई
 

? राजेंद्र जोशी

 

विविध कलाओं के अंतर्राष्ट्रीय कलाघर भारत भवन की नियति में ही विवाद, विवाद और विवाद है। एक विवाद का जैसे तैसे पटाक्षेप होता है कि कोई न कोई दूसरा विवाद सतह पर आ जाता है। साहित्य, कला और संस्कृति के विभिन्न आयामों के प्रदर्शनों के स्तर में दिन पर दिन गिरावट की तो खूब चर्चाएं होती रहती है किंतु इस तरह की चर्चाओं को यह कहकर दबा दिया जाता है कि कतिपय, कला और साहित्य जगत के कलाकारों और लेखकों के वैचारिक मतभेदों होने और मतैक्य न बन पाने के कारण भारत भवन को विवादों में लपेटा जाता है। भारत भवन की स्थापना का उद्देश्य ही यह था कि कला, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का स्तरीय संचालन संस्कृतिकर्मियों और विविध कलाओं के मर्मज्ञ मनीषियों द्वारा ही हो, जिसमें न तो सरकार का कोई हस्तक्षेप रहेगा और न ही सत्ता की राजनीति से जुड़े राजनेताओं की कोई दखल होगी। इसी दृष्टि से भारत भवन के गठन में इस बात को पूरी-पूरी तवज्जों दी गई कि विविध कलाओं और साहित्य के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मनीषियों को इस के ट्रस्ट का सदस्य बनाया जाता है।

भारत भवन के प्रथम ट्रस्ट के ट्रस्टियों की सूची में जिस ऊंचाई के साहित्यविदों और कलाविदों के नाम शामिल थे, उससे ही भारत भवन की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान कायम हो पायी। यह एक अकाटय सत्य है कि बिना शासन की आर्थिक सहायता के इस अंतर्राष्ट्रीय कलाकेन्द्र को प्रतिष्ठित नहीं बनाया जा सकता था। शासन से भारत भवन के उत्थान के लिए भरपूर सहयोग मिलता भी रहा किंतु इसकी गतिविधियों का संचालन कला विशेषज्ञों को सौंपा गया था। यही कारण रहा कि स्थापना के दो दशकों से भी अधिक समय तक ऐसी स्थिति कायम रही आई कि न तो इसमें सरकारीपन को हावी होने दिया गया और न ही इस कला भवन से सत्ता द्वारा राजनैतिक लाभ उठाने जैसी किसी तरह की गतिविधियां संचालित की गई। चूंकि प्रजातांत्रिक प्रणाली वाले इस देश में सत्ताओं का परिवर्तन हो जाया करता है और अलग-अलग राजनैतिक दलों के हाथ में राज संचालन की बागडोर आ जाती है इसलिए राजनेताओं के नियंत्रण वाली सरकार का राजनीतिक रूक नहीं पाता हैं। भारत भवन की स्थापना के दो दशक में तो इस केंद्र ने जो अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की उससे कला और संस्कृति के प्रति लोगों में दिलचस्पी बढ़ती गई और आम लोगों के बीच कला और साहित्य की विविध विधाओं के प्रति रूझान पैदा हुआ।
सांस्कृतिक गतिविधियों और भारत भवन में आयोजित होने वाले उच्चस्तरीय आयोजनों से प्रदेश की संस्कृति के क्षेत्र में जो ख्याति अर्जित हुई उससे प्रदेश की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक छवि और प्रतिष्ठा बढ़ी है। विडम्बना है कि इस बढ़ी हुई प्रतिष्ठा और निखरती छवि का सत्ता की तरफ से राजनैतिक लाभ उठाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस कला केंद्र के नियंत्रण में अब कलाधर्मियों का कम, सरकार और राजनीति का दबाव बढ़ता जा रहा है। प्रदेश की सांस्कृतिक छवि और भारत भवन की उपलब्धियों का श्रेय उठाकर सत्तारूढ़ दल इसे अपनी राजनैतिक विचारधारा को विस्तारित और प्रचारित करता जा रहा है। प्रदेश के साहित्यिक और कलाजगत की गतिविधियों को अलग-अलग वादों, गुटों और विचारधाराओं में बांटा जा रहा है। प्रदेश की स्वस्थ्य संस्कृति और साहित्यिक परम्पराओं के मुताबिक साहित्य और ललित कलाओं को राजनीति के हस्तक्षेप से दूर होना चाहिए किंतु अब साहित्य का राजनीति से घालमेल कर उससे सत्तारूढ़ दल को अपनी राजनैतिक लोकप्रियता बढ़ाने में संलग्न देखा जा सकता है।

भारत भवन ट्रस्ट के गठन में तो शासन की मजबूरी होती है कि उसे कलाविदों और साहित्यविदों को शामिल करना होता है किंतु सरकार की अकादमियों में उन्हीं के वर्चस्व को प्रोत्साहन दिया जा रहा है जो अपने राजनैतिक दल की विचारधाराओं का पोषक और प्रतिबध्द होता है। साहित्य और कला से जुड़े सिध्दहस्त कलाकर्मियों की भी अपनी-अपनी विचारधारायें होती हैं और वे भी उसी विचारधारा की राजनैतिक सत्ताओं के पक्षधार होते हैं, जो स्वाभाविक है। वैसे आम जनता भी उनके राजनैतिक परिप्रेक्ष्य को कम किंतु उनके कलात्मक गुणों से प्रभावित भी रहती है। इसी तरह की कतिपय लोकप्रिय प्रतिभाओं को भारत भवन के ट्रस्ट में शामिल किया जो जनप्रियता के शिखर पर है और अपने अपने फ़न में अद्वितीय भी हैं। ट्रस्ट की एक वरिष्ठ सदस्य नृत्यांगना और श्रेष्ठ अभिनेत्री हेमामालिनी भी हैं। अभी हाल ही में हेमाजी जैसी उच्चस्तरीय कलाकार ट्रस्टी ने भारत भवन की कार्यप्रणाली पर जिस तरह की टिप्पणी की है वह निश्चित ही सांस्कृतिक क्षेत्र में सरकार के हस्तक्षेप की कलई खोलती है। हेमाजी का दर्द है कि भारत भवन की गतिविधियों से ट्रस्ट के सदस्यों को अंधरे में रखा जाता है और यहां तक कि ट्रस्ट की बैठकों तक की सूचनाऐं नहीं भेजी जाती। इतने ऊंचे स्तर की सदस्या की उपेक्षा जब सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजकों द्वारा की जा रही है तो प्रदेश या देश के अन्य रचनाकारों और कलाकारों की कितनी उपेक्षा हो रही है, यह साफ तौर पर समझा जा सकता है। हेमाजी को तो इस रूप में भी आरोपित नहीं किया जा सकता कि वे किसी गुटबाजी की वजह से या फिर वैचारिक भिन्नताओं के कारण दोषारोपण कर रही हैं। उन्हें तो वर्तमान सत्ता के दौरान ही ट्रस्टी बनाया गया है, उनका एक पक्ष राजनीति का भी है जिसका सत्तारूढ़ दल राजनैतिक लाभ भी उठाता आ रहा है। इससे सत्ता को समझ लेना चाहिए कि भारत भवन की संचालन व्यवस्था में जरूर कहीं न कहीं कुछ खोट है। अपनी इस उपेक्षा को हेमाजी ने राजनीति से हटकर जो टिप्पणी की है, इससे उनके भीतर के कलाकार की प्रतिष्ठा बढ़ी ही है।


? राजेंद्र जोशी