संस्करण: 14 फरवरी -2011

खेती की ज़मीन निगलते उद्योग

? महेश बाग़ी

 

इंदौर में एक संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के ख्यात वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मध्यप्रदेश में जिस तरह खेती का रकबा कम हो रहा है, उससे भविष्य में भारी संकट आ सकता है। संभवत: उनका इशारा उद्योगों के लिए खेती की ज़मीन दिए जाने संबंधी था। मध्यप्रदेश में जिस तरह औद्योगिकीकरण के नाम पर खेती की ज़मीन हड़पी जा रही है, वह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। वैसे तो पूरे देश में खेती का रकमा कम होता जा रहा है, किंतु मध्यप्रदेश में यह रकबा कुछ ज्यादा ही कम हो रहा है। केंद्रीय भू-राजस्व विभाग के रिकार्ड के अनुसार देश में हर साल तीन फीसदी खेती भूमि दीगर कामों में जा रही है। मध्यप्रदेश में यह प्रतिशत लगभग 5 है। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में खेती-किसानी को बढ़ावा देकर खेतों की ज़मीन बचाए रखने की ज़रूरत है, मगर मध्यप्रदेश में सत्ता और नौकरशाहों को प्रभावित करने वाले तथा उनके हित साधने की ताक़त रखने वाले बड़े लोगों को खेती की ज़मीन मुहैया कराने के नए-नए रास्ते खोजे जा रहे हैं।

ताज़ा मामला प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले की तहसील गोटेगांव के ग्राम सिवारी का है। यहां टुडे होम एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी पॉवर प्लांट स्थापित करने जा रही है, जिसके लिए 1500 एकड़ ज़मीन की ज़रूरत है। दिक्कत यह है कि इस गांव के किसान अपनी उपजाऊ भूमि देने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में नौकरशाहोश् ने किसानों की भूमि हड़पने का षडयंत्र रचा और 12 ऐसे किसानों को चिन्हित किया, जिन्हें खेती के लिए पट्टे पर ज़मीन उपलब्ध कराई गई थी। इन्हें ज़मीन अधिग्रहित करने का डर दिखा कर ज़मीन बेचने को मज़बूर किया गया। हरिजन-आदिवासी वर्ग के इन किसानों को उनकी ज़मीन का मूल्य एक से सवा लाख रुपए तक दिया गया। राजस्व विभाग के परिपत्र के अनुसार यदि पट्टेधारी किसान अपनी खेती की ज़मीन बेचता है, तो उसे उतनी ही भूमि अन्य जगह ख़रीदना होगी, ताकि वह भूमिहीन न रहे और खेती का रकबा भी कम न हो। लेकिन किसानों को उनकी ज़मीन के एवज में जो रकम दी गई है, उससे अन्य जगह ज़मीन ख़रीदना संभव ही नहीं है। नरसिंहपुर ज़िला प्रशासन ने इन किसानों की ज़मीन उक्त औद्योगिक घराने को उपलब्ध कराने के लिए राजस्व विभग के परिपत्र का सहारा लिया और बताया कि यदि इन्हें बेचने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो शासन इन्हें अधिग्रहित कर लेगा। इसलिए अनुमति देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इस संबंध में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि राजस्व विभाग ने ऐसा कोई परिपत्र जारी नहीं किया है। ज़ाहिर है कि प्रशासन ने मनमर्ज़ी कर किसानों को ज़मीन बेचने के लिए मज़बूर किया। नियमानुसार राजस्व पट्टे की भूमि अधिग्रहित नहीं की जा सकती है, किंतु प्रशासन ने इसका डर दिखा कर किसानों को भूमिहीन कर दिया।

उपरोक्त उदाहरण से समझा जा सकता है कि नौकरशाही किस तरह औद्योगिक घरानों के लिए दलाल का काम कर रही है। सालों पहले धार के पीथमपुर को एशिया के ट्रेटायट के रूप में विकसित करने के लिए सरकार ने बड़े घरानों के लिए पलक-पावड़े बिछाए थे, तब ऐसा लगा था कि इसका लाभ लाखों लोगों को मिलेगा, लेकिन यहां हज़ारों एकड़ ज़मीन लेने वाले कई घराने बाद में पलायन कर गए और जिन किसानों की खेती की ज़मीन ली गई थी, वे आज भी ख़ून के आंसू रो रहे हैं, जिनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है। उद्योग घरानों को खेती की ज़मीन मुहैया कराने में शासन-प्रशासन साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाता रहा है और घाटे में वही रहता है, जिसका कोई माई-बाप नहीं होता है। बीते दस सालों का ही रिकार्ड खंगाला जाए, तो पता चलता है कि अरबों-खरबों की ज़मीनें इन बड़े लोगों के खाते में दर्ज हो चुकी हैं।

किसानों की बेशक़ीमती ज़मीनें कौड़ियों के भाव ख़रीदकर उसे बड़ों को बांटने का खेल सालों पहले आवासीय योजनाओं के लिए अधिग्रहण के नाम पर शुरू हुआ था। फिर यह खेल उद्योगों की ज़मीन की बंदरबांट की जा रही है। देश के बड़े कारपोरेट घरानों के साथ ही सत्ता के गलियारों में दखल रखने वाले अब अपनी सल्तनत का विस्तार करने के लिए छोटे किसानों की ज़मीनों के टुकड़ों पर गिध्द दृष्टि जमाए हुए है, जिन्हें ये ज़मीनें कौड़ियों के भाव उपलब्ध कराने में शासन-प्रशासन भरपूर मदद कर रहा है। जिन किसानों ने अपनी ज़मीनें इन बड़ों को दी थी, वे आज किस हालत में है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। मध्यप्रदेश में बड़े उद्योग घरानों को किसानों की ज़मीनों की बंदरबांट किए जाने का यह गोरखधांधा इसी तरह चलता रहा, तो प्रदेश की खेती बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकेगा, किसानों की दुर्गति होगी, सो अलग।

वैसे भी प्रदेश के किसान ज़ार-ज़ार रोने को मज़बूर हैं। पहले उन्हें नकली बीज ने परेशान किया। फिर घटिया कीटनाशक ने फ़सले बर्बाद की और फिर पाले ने रही-सही कसर पूरी कर दी। थोड़ी-बहुत फ़सल लेकर किसान मंडी पहुंचा, तो उसे वहां भी मंडी कर्मचारियों और व्यापारियों के गठजोड़ का शिकार होना पड़ा और फसल औने-पौने दाम पर बेचने को मज़बूर होना पड़ा। यही वजह है कि प्रदेश विदर्भ की राह पर चल पड़ा है और रोज़ाना किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आ रही हैं। बीते आठ साल में प्रदेश के 18 हज़ार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह उस प्रदेश की स्थिति है, जिसका मुखिया ख़ुद को किसान का बेटा कहता है। इसी किसान के बेटे का प्रशासन तंत्र अब मुआवजें के नाम पर किसानों के साथ मज़ाक कर रहा है। सरकार किसानों की समस्याओं के प्रति कितनी गंभीर है, यह इसी से समझा जा सकता है कि भाजपा के पितृ संगठन संघ का अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ ही सरकार की किसान-विरोधी नीतियों पर दो-दो हाथ कर रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि सरकार की नींद अब भी नहीं खुली है। यदि यही हालात रहे, तो इस सरकार को फिर किसानों के गुस्से का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।


? महेश बाग़ी