संस्करण: 14 फरवरी -2011

मंडला के ईसाई आतंक की छाया में

? एल.एस.हरदेनिया

 

ध्यप्रदेश के आदिवासी-बहुल मंडला जिले में 11 से 13 फरवरी तक आयोजित हुए ''नर्मदा सामाजिक कुंभ'' से राज्य का ईसाई समुदाय भयभीत व आशंकित है। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के कैथोलिक चर्च के प्रवक्ता फॉदर आनंद मुटुंगल ने यह आशंका जाहिर की है कि इस कुंभ के कारण मंडला में ''कंधमाल जैसी स्थितियां'' बन सकती हैं। ईसाई समुदाय के एक प्रतिनिधिमंडल ने गत दिवस मध्यप्रदेश के राज्यपाल व पुलिस महानिदेशक से भेंट कर पूरे प्रदेश और विशेषकर मंडला जिले में ईसाईयों की सुरक्षा के लिए इंतजामात किए जाने की मांग की थी।

दावा किया गया कि कुंभ में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान व महाराष्ट्र से आदिवासियों ने भाग लिया। कुंभ का मुख्य आयोजक आरएसएस था, यद्यपि वह पर्दे के पीछे से काम कर रहा था। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, पूर्व प्रमुख के. एस. सुदर्शन व संघ के एक अन्य नेता सुरेश सोनी उन व्यक्तियों में शामिल हैं जिन्हें कुंभ में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। ऐसा ही एक कुंभ गुजरात के डांग जिले में सन् 2006 में आयोजित किया गया था। इस कुंभ के मुख्य आयोजक स्वामी असीमानंद इन दिनों आतंकी हमलों में भागीदारी के आरोप में जेल में आराम फरमा रहे हैं।

नर्मदा कुंभ के आयोजक दबी जुबान से यह स्वीकार करते हैं कि इस आयोजन का मुख्य उध्देश्य आदिवासियों का ''हिन्दुकरण'' है। उनका यह भी मानना है कि इस तरह के आयोजनों से मिशनरियों के लिए आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन करवाना मुश्किल होता जावेगा। ''घर वापसी'' अर्थात ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों को पुन: हिन्दू धर्म में वापिस लाना भी कुंभ के उध्देश्यों में से एक था।

कुंभ के आयोजकों द्वारा मंडला जिले और उसके आसपास ईसाईयों, मिशनरियों व ईसाई धर्म के खिलाफ उत्तेजक व भड़काऊ प्रचार किया गया। आयोजन स्थल के आसपास कई बड़े होर्डिग लगाए गए जिनमें महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानन्द व डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के विचारों को उध्दत करते हुए धर्मपरिवर्तन का विरोध किया गया। इनमें से एक होर्डिग में महात्मा गांधी को कथित रूप से यह कहते हुए दर्शाया गया कि, ''अगर मुझे कानून बनाने की शक्ति मिल जाए तो जो पहला कानून मैं बनाउंगा वह होगा धर्मपरिवर्तन पर पूर्ण प्रतिबंध''।

कुंभ की प्रचार सामग्री में मिशनरियों को ''मेमने की खाल में भेंड़िया'' कहा गया। एक पर्चे में ''मदर टेरेसा का असली चेहरा'' उजागर करने का दावा किया गया है। एक अन्य पर्चा कहता है कि जब 300 ईस्वी के आसपास ईसाई शरणार्थी भारत पहुंचे तो यहां के हिन्दू राजाओं ने उन्हें शरण दी और उन्हें अपने पूजा स्थलों का निर्माण करने की इजाजत भी दी। इसके विपरीत, जब सन् 1498 में पुर्तगाली खोजकर्ता वास्को डिगामा कालीकट पहुंचा तो उसने हिन्दुओं पर अत्याचार किए और स्थानीय राजा द्वारा भेजे गए दूत, जो कि एक ब्राहम्ण था, की हत्या कर दी। एक पर्चे में यह आरोप लगाया गया है कि पोप ने तानाशाह मुसोलनी एवं हिटलर का समर्थन किया था। मुसोलनी ने पोप को भारी रकम रिश्वत के रूप में दी थी और पोप को एक राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा दिया था। एक पर्चे में यह भी आरोप लगाया गया है कि सोनिया गांधी का एक ऐसे परिवार से संबंध है जो मुसोलनी की पार्टी का प्रमुख सदस्य था।

मंडला में इस दौरान लगभग प्रतिदिन ''कलश यात्राएं'' निकाली गईं जिनमें धार्मांतरण-विरोधी नारे प्रमुखता से लगाए जाते थे। ईसाई मिशनरियों को खुलेआम चेतावनी दी जा रही थी कि वे या तो धर्मांतरण बंद करें या इसके गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहें।

चूंकि कुंभ का आयोजन भाजपा की पितृ संस्था आरएसएस द्वारा किया गया था इसलिए राज्य की भाजपा सरकार ने आयोजन में पूरा सहयोग दिया। राज्य के लोकनिर्माण, शहरी विकास व पीएचई सहित अनेक विभागों व राज्य विद्युत मंडल दिन-रात आयोजन को सफल बनाने में जुटे रहे। एक अनुमान के अनुसार सरकार ने 175 करोड़ रूपये आयोजन की तैयारियों पर खर्च किया। आयोजन स्थल तक पहुंचने के लिए कई नई सड़कें बनाई गई व पहले से बनी हुई सड़कों को चौड़ा किया गया। आयोजन स्थल पर अबाधित विद्युत प्रदाय सुनिश्चित करने के लिए एक नया सब स्टेशन बनाया गया है। पानी की आपूर्ति के लिए नई पाईप लाईनें डाली गई और नर्मदा के तट पर 6 विशाल पंडाल खड़े किए गए। राज्य कांग्रेस ने इस आयोजन का कड़ा विरोध किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव श्री दिग्विजय सिंह ने संघ व भाजपा पर सनातन धर्म को विकृत करने का आरोप लगाया । ''सनातन धर्म के अनुसार, कुंभ केवल चार स्थानों-प्रयाग, हरिद्वार, नासिक व उज्जैन में हो सकता है व सदियों से होता आ रहा है। संघ को अपने इस राजनैतिक आयोजन को कुंभ का नाम देने का कोई अधिकार नहीं है''। ईसाईयों के अतिरिक्त आदिवासी संगठनों ने भी नर्मदा कुंभ का विरोध किया। पारी कुमार लिंगों गोंडी धर्म महासंघ, नागपुर की ओर से एक विस्तृत पर्चा जारी किया गया। पर्चे का शीर्षक था ''सावधान! गोंडवाना के गोंडियन गणों, सावधान''। इस पर्चे में कहा गया है हम गोंडो (आदिवासियों) की पृथक पहिचान है। हम गोंड प्रयाग में संपन्न होने वाले कुंभ में भाग नहीं लेते। इसलिए आदिवासियों से आवाहन किया गया था कि वे नर्मदा कुंभ में भाग नहीं लें। पर्चे में आगे कहा गया कि कुंभ के मेले में शामिल होने के लिए हमें ऐसा प्रलोभन भी दिया गया कि कुंभ के मेले में स्नान करने से पापों का अंत होकर पुण्य की प्राप्ति होती है और स्वर्ग में स्थान मिलता है। कुंभ मेले में स्नान करने की उनको जरूरत है जो पापी हैं और छल कपट से जीवन जीते हैं। गोंडवाना गण तो सीध और सच्चाई की राह पर चलने वाले हैं, तो उनके पापी होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। स्वर्ग और नरक की संकल्पना हमारे जीवन दर्शन में नहीं है। भाजपा सरकार द्वारा शुरू किये जा रहे महाकुंभ में हजारों करोड़ रूपये भ्रष्टाचार और दलाली के माध्यम से व्यर्थ बर्बाद करके लोगों को मरणोपरांत स्वर्ग में पहुचाने का प्रलोभन देने से ज्यादा अच्छा होता कि यही हजारों करोड़ रूपये क्षेत्र के चहुमुखी विकास कार्यों में खर्च किये जाते तो सदियों से पिछड़ा मण्डला जिला धरती पर जीता जागता स्वर्ग बन जाता।

अत: में हम हमारे गोंडवाना के गणों का अमूरकोट में स्थित दाऊ (नरमादा) शक्ति की वंशभीड़ि और हमारे सामुदायिक जीवन मार्ग की धर्म कचारगढ़ के सभी शक्तियों को साक्षी रखकर यह प्रण करते हैं कि गोंडवाना अंचल के कोई भी गण, म.प्र. शासन की ओर से आगामी वर्ष 2011 के माघ महीने में आयोजित कुंभ मेले में हिस्सा नहीं लेंगे और अपने आपकी तथा अपने देवी-देवताओं (पुरखों) को अपवित्र नहीं करेंगे। पर्चे में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया था कि गोंड समुदाय के लोग हिन्दू नहीं हैं। आयोजन का एक पहलू यह भी है कि कुंभ के लिए किए जा रहे विकास कार्यों से मंडला जिले के निवासी प्रसन्न हैं। उनका कहना है कि कुंभ के आयोजन के पीछे के असली उध्देश्य चाहे जो भी हें इससे उनके इलाके में वे काम हो रहे हैं जो दशकों से नहीं हुए थे।


? एल.एस.हरदेनिया