संस्करण: 14 फरवरी -2011

क्या जनसंहार के मास्टरमाइंड
गिरफ्त में आएंगे ?

 

? सुभाष गाताड़े

 

गुजरात जनसंहार पर स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम की रिपोर्ट    
     ने नरेन्द्र मोदी एवं अन्य 'परिवारजनों' को क्लीन चिट नहीं दी है ।

 

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मार्च का पहला सप्ताह अहम साबित हो सकता है, बशर्ते मुल्क की आला अदालत 21 वीं सदी की पहली दहाई के सबसे बड़े जनसंहार के मामले में उसके द्वारा गठित विशेष जांच दल की रिपोर्ट पर गम्भीरता से गौर करे और उसे अंजाम देनेवाले संगठनों एवम उनके कर्णधारों के खिलाफ कोई कारगर कार्रवाई करने की दिशा में फैसले लेने के बारे में सोचे।

मालूम हो कि इन्सानियत को शर्मसार कर देनेवाले 2002 के गुजरात दंगों की कुछ अहम घटनाओं की जांच के लिए आला अदालत के निर्देश पर जनाब आर के राघवन की अगुआई में बनी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम की रिपोर्ट तीन मार्च को न्यायमूर्ति डी के जैन, पी सथासिवम और आफताब आलम की अदालत के सामने प्रस्तुत होनेवाली है। और विशेष जांच दल की उपरोक्त रिपोर्ट पर आगे क्या कार्रवाई करनी है, इसके बारेमें सर्वोच्च न्यायालय को फैसला लेना है। इस सम्बन्ध में अदालत के अपने 'मित्र' (एमिकस क्यूरे) राजू रामचन्द्रन भी अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दिए हैं।

निश्चित ही दोनों सम्भावनाएं हैं : मुमकिन है अदालत टीम की रिपोर्ट को सम्बधित पुलिस महकमे या जांच अधिकारियों को 'उपयुक्त कार्रवाई के लिए' भेज दें और मामले पर अपनी तरफ से पूर्णविराम लगा दें। यह भी मुमकिन है कि टीम की रिपोर्ट से मिलते संकेतों के मद्देनज़र जांच का दायरा बढ़ाते हुए तथा टीम को अधिक अधिकारों से लैस करते हुए उसे इस जनसंहार के कर्णधारों तक पहुंचने का मार्ग सुगम कर दे। इस बात को देखते हुए कि आठ साल बाद भी उपरोक्त जनसंहार के पीड़ितों को न्याय नहीं मिला है, आला अदालत की भूमिका बहुत अहम हो जाती है।

वैसे यह बात प्रमुखता से रेखांकित हुई है कि एसआईटी ने अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दंगे को लेकर 'महत्वपूर्ण रेकार्ड को नष्ट करने,' 'साम्प्रदायिक मानसिकता' को उजागर करने, 'भडकाऊ भाषण देने, अदालतों में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर संघ कार्यकर्ताओं को तैनात करने, पुलिस कन्ट्रोल रूम में अपने करीबी मंत्रियों को जनसंहार के दिनों में तैनात करने, 'तटस्थ अधिकारियों को दण्डित करना।' आदि तमाम कामों के लिए जिम्मेदार माना है। (तहलका, 12 फरवरी 2011)

विकासपुरूष के तमगे से अपनी छवि बनाने में मुब्तिला मोदी के बारे में रिपोर्ट लिखती है ''इस तथ्य के बावजूद कि गुलबर्ग सोसायटी एवं अन्य स्थानों पर अल्पसंख्यकों पर जबरदस्त हमले हुए हैं, मोदी की यही कोशिश थी कि वह स्थिति की गम्भीरता को कम करे और ऐसे हमलों को यह कहते हुए औचित्य प्रदान करे कि हर क्रिया की समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। (पेज 69) रिपोर्ट इस बात को भी बताती है कि एक बेहद विवादास्पद कदम के तौर पर गुजरात सरकार ने दो मंत्रियों -अशोक भट्ट और आई के जाडेजा को - दंगे के शुरूआती चरण में अहमदाबाद शहर पुलिस कन्ट्रोल रूम और राज्य के पुलिस कन्ट्रोल रूम में तैनात किया था। टीम के चेअरमैन की प्रतिक्रिया के मुताबिक (पेज 12) 'इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि मोदी खुद गृहमंत्री थे' जिससे इस धारणा को बल मिलता है कि 'उन्हें पुलिस के कामकाज को बाधित करने के लिए वहां रखा गया था।'

टीम की रिपोर्ट जस्टिस पी बी सावन्त और जस्टिस होसबेट सुरेश की अगुआई में गठित कन्सर्ड सिटिजन्स ट्रिब्युनल की रिपोर्ट का भी उल्लेख करती है, जिसका गठन 2002 में हुआ था। याद रहे कि जनता के इस ट्रिब्युनल के सामने मोदी सरकार के मंत्री रहे हरेन पांडया ने आकर गवाही दी थी और दंगों में मोदी की विवादास्पद भूमिका को रेखांकित किया था। दोनों न्यायाधीश एसआईटी के सामने भी आए थे जिन्होंने हरेन पांडया की उपस्थिति का जिक्र किया था जिन्होंने ट्रिब्युनल को बताया था कि 27 फरवरी 2002 की शाम को मोदी के आवास पर चुनिन्दा लोगों की बैठक हुई थी जिसमें मोदी ने यह स्पष्ट किया था कि अगले दिन हिन्दुओं की प्रतिक्रिया होगी और पुलिस को बीच में नहीं आना चाहिए। (रिपोर्ट का पेज 18)

साफ है कि स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने मोदी को कहीं से भी क्लीन चिट नहीं दी है, जैसा कि दावा दो माह पहले किया गया था और संघ परिवारी समर्थक सम्पादकों की मदद से इस ख़बर को खूब उछाला गया था।
इसे विडम्बना ही कहा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रस्तुत टीम का गठन करते वक्त उसे किन्हीं विशिष्ट अधिकारों से लैस नहीं किया था,जिसके चलते न उसके लिए सम्भव था कि वह किसी को गिरफ्तार कर सकती थी, न ही वह किसी स्थान की तलाशी ले सकती थी या न किसी सरकारी अधिकारी को इस बात के लिए मजबूर कर पाती कि वह महत्वपूर्ण रेकार्ड उपलब्ध करा दे। अगर सर्वोच्च न्यायालय पहले से सचेत रहता तो वह इन खामियों को दूर कर सकता था ताकि ऐसे तमाम लोगों तक भी पहुंचाया जा सकता था जो नेताओं, अधिकारियों की संलिप्तता के बारे में ठोस सबूत दे सकते थे। टीम के पास इतना ही अधिकार था कि वह किसी को बुलावा भेज सकती थी और उसके बयान दर्ज कर सकती थी। वही काम उसने किया। उसने गुजरात जनसंहार के दिनों में विभिन्न अहम पदों पर रहे सरकारी अधिकारियों, पुलिस अफसरों, सियासतदानों या सामाजिक कार्यकर्ताओं को बुलावा भेजा और उनके बयान दर्ज किए। लाजिम था कि दंगों के वक्त अहम पदों पर रहे अधिकारियों या नेताओं ने ऐसे तमाम तरीके अख्तियार किए कि वह दंगों को सम्भव बनाने में अपनी संलिप्तता, संगठनों की खास सक्रियता आदि के बारे में कुछ न बोलें। यूं तो गुजरात का जनसंहार 2002 में हुआ था, मगर कई अधिकारियों, मंत्रियों ने बातचीत के दौरान अचानक 'स्मृतिलोप' हो जाने की शिकायत की थी। अपनी तमाम सीमाओं या अन्तर्विरोधं के बावजूद एसआईटी की प्रारम्भिक रिपोर्ट 2002 के जनसंहार में संघ परिवारी संगठनों एवम उसके आंकाओं की संलिप्तता के तमाम प्रमाण पेश करती है, भले ही वह नाम लेकर उन्हें जिम्मेदार ठहराने से बचती है।

टीम के जांच अधिकारी इस हकीकत को बेहद दुख के साथ नोट करते हैं कि न पुलिस अधिकारी और न कोई सरकारी अधिकारी (अपवादों को छोड़ कर) इस बात के लिए तैयार दिखता था कि वह सच्चाई को उजागर करे क्योंकि अधिकतर लोगों को रिटायरमेण्ट के बाद अच्छे सरकारी ओहदों से नवाजा गया था और जिन्हें अभी भी इसका इन्तजार था वह राज्य के आंकाओं को नाखुश नहीं करना चाहते थे। ऐसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी जिन्होंने 2002 के दंगों में अल्पसंख्यकों को बचाने, दंगाई बने हिन्दुत्व के अतिवादी तत्वों को गिरफ्तार करने में फुर्ती दिखाने या मोदी सरकार के इशारों पर नाचने से इन्कार कर दिया था, उन्हें किस तरह आननफानन ट्रान्सफर किया गया, इसके भी कई उदाहरण वह पेश करती है।

वैसे यह कोई पहली दफा नहीं है जब संघ परिवारी जमातें गुजरात जनसंहार में अपनी संलिप्तता के लिए बेपर्द हुई हैं। याद रहे कि महज तीन साल पहले 'तहलका' पत्रिका ने ही छह माह चलाए स्टिंग आपरेशन के जरिए तमाम दंगाइयों की असली तस्वीर उजागर की थी। अपने आप को जोखिम में डाल कर अंजाम दिए इस स्टिंग आपरेशन में संघ परिवार से सम्बध्द तमाम वरिष्ठ लोग कैमरे के सामने अपने अपराधों को कबूलते दिखे थे।
गौरतलब है कि छह माह तक चले इस स्टिंग आपरेशन में पत्रकार आशीष खेतान ने जनसंहार में लिप्त दोनों किस्म के लोगों से मुलाकात की थी। एक तरफ ऐसे लोग थे जिन्होंने इस हमले की रणनीति तैयार की, परदे के पीछे रह कर इस खूनी मुहिम की योजना बनायी, इलाके की मतदाता सूचियां उपलब्ध कराने से लेकर, अल्पसंख्यक समुदायों के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की सूचियां उपलब्ध करायीं, मकानों में विस्फोट करने के लिए गैस सिलेण्डरों तथा बम, पिस्तोल, त्रिशूल से लेकर अन्य हथियारों को जगह-जगह पहुंचाने का इन्तज़ाम करवाया ; दूसरी तरफ, वे लोग थे जिन्होंने इस रक्तरंजित मुहिम को प्रत्यक्ष अंजाम दिया, जिन्होंने मकानों में आगजनी एवम लूटपाट की, महिलाओं पर अत्याचार किए और लोगों को मार डाला। वैसे जनसंहार की योजना बनानेवालों और उस पर अमल करनेवालों में कोई चीनी दीवार नहीं थी, कई बार ऐसे मौके भी आए जब योजना बनानेवालों ने खुद इस खूनी मुहिम में प्रत्यक्ष साझेदारी की। अहमदाबाद के नरोदा पाटिया कतलेआम का सरगना बाबू बजरंगी (फिलवक्त शिवसेना सा जुड़ा लेकिन उन दिनों विश्व हिन्दू परिषद का अग्रणी नेता) ने कैमरे के सामने बताया था कि किस तरह उसने गर्भवती का पेट चीर कर पेट के भ्रूण को तलवार के नोंक पर नचाया या किस तरह उसने गड्डे में छिपे अल्पसंख्यकों पर तेल छिड़क कर उन्हें जिन्दा आग के हवाले किया और किस तरह राज्य के मुख्यमंत्री ने कानूनी निगाहों से उसे बचाने की पुरजोर कोशिश की। अपनी इस पूरी कार्रवाई के दौरान बाबू बजरंगी लगातार विश्व हिन्दू परिषद के स्थानीय बड़े नेता जयदीप पटेल के साथ लगातार सम्पर्क में था जो पास के धान्वतंरी क्लिनिक में बैठ कर इस मुहिम का सूत्र संचालन कर रहा था। अहमदाबाद की ही तरह वडोदरा शहर में भी कोईभी मुस्लिम बहुल बस्ती हिन्दुत्ववादी जूनूनी दस्तों के हमलों से बच नहीं पायी थी। महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में मुख्य अकौण्टेट तथा ऑडिटर के तौर पर कार्यरत धीमन्त भट्ट ने आशीष खेतान को स्पष्ट किया था कि किस तरह अहमदाबाद की ही तरह वडोदरा में विभिन्न हिन्दुत्ववादी संगठनों ने 27 फरवरी को ही बैठ कर आगे के हमले की योजना बनायी थी और किस तरह पुलिस प्रशासन को 'मैनेज' करना है, अगर कोई गिरफ्तार होता है तो उसे छुड़ाना है, घायल हिन्दुओं को किस तरह अस्पताल में ले जाना है कुल मिला कर हिन्दू जिहाद किस तरह शुरू करना है इसका खाका तैयार किया था। भट्ट ने यह भी साफ किया कि शहर के प्रबुध्द कहे जाने वाले लोगों की कारों में रख कर हथियारों को जगह-जगह पहुंचाया गया। गुजरात के सांबरकांठा जिले में मुसलमानों को सबसे अधिक आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा जिसमं उनके 1545 मकान, 1237 व्यावसायिक प्रतिष्ठान और 549 दुकानों को आग के हवाले किया गया। इस इलाके में परिषद के विभाग प्रमुख अनिल पटेल ने कैमरे के सामने बताया कि उनका नारा था 'बाहर से दरवाजा बन्द करो और अन्दर बैठे मुसलमानों को जला दो'।

वर्ष 2002 में बजरंग दल के राष्ट्रीय सहसंयोजक हरिश भट्ट जो गोधारा से भाजपा विधायक रहे हैं, उन्होंने कैमरे के सामने इस बात को पहली दफा स्वीकारा था कि उनकी अपनी पटाके की फैक्टरी में बम बनाये गये थे, भट्ट ने खेतान के सामने इस बात को भी स्पष्ट किया था कि किस तरह उन्होंने विस्फोटकों यहां तक कि रॉकेट लांचर्स तैयार किए और किस तरह उन्हे अहमदाबाद के खूनी दस्तों तक पहुंचाया। भट्ट के मुताबिक अहमदाबाद में कर्यू के बावजूद पंजाब से तलवारें और उत्तार प्रदेश, बिहार एवम मध्य प्रदेश से पिस्तौल लाये गये एवम बांटे गये। विश्व हिन्दु परिषद के कार्यकर्ता धावल जयन्ती पटेल ने तहलका को स्पष्ट किया कि सांबरकांठा में स्थित उसकी खदानों का डायनामाइट दंगे के दौरान इस्तेमाल हुआ तथा विस्फोटकों की जानकारी रखनेवाले लोगों की मदद से इन खदानों में डाइनामाइट एवम आरडीएक्स आधारित पावडर का उपयोग करके बम बनाये गये।

अन्त में चाहे एसआईटी की रिपोर्ट हो या स्टिंग आपरेशन के प्रमाण, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनसंहार कहीं भी हो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि पीड़ित लोगों को न्याय मिले, आततायी दण्डित हों। इसलिए जनसंहार को ठीक से परिभाषित करने की और उस पर पाबन्दी लगाने के लिए अन्तरराष्ट्रीय कानूनों को सार्वभौमिक स्वीकार्यता दिलाने की जरूरत आज अधिक जान पड़ती है। अगर हम 9 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आमसभा द्वारा जनसंहार को लेकर पारित प्रस्ताव का विवरण देखें और 12 जनवरी 1951 से लागू हुए 'कन्वेन्शन आन द प्रिवेन्शन एण्ड पनिशमेण्ट आफ द क्राइम आफ जेनोसाइड' को पलटें तो पाएंगे कि इन कन्वेन्शन के जरिये विश्व जनमत ने अपने इस संकल्प को ही रेखांकित किया था कि अब किसी जनसंहार को बरदाश्त नहीं किया जाएगा। प्रस्तुत कन्वेन्शन में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत जनसंहार की परिभाषा है जिसे कई देशों के राष्ट्रीय आपराधिक कानून में भी शामिल किया गया और अन्तरराष्ट्रीय अपराधा न्यायालय को स्थापित करने की बुनियाद बने अन्तरराष्ट्रीय अपराधा न्यायालय की रोम संहिता/स्टेच्यू द्वारा भी स्वीकारा गया। प्रस्तुत कन्वेन्शन की धारा दो जनसंहार को इस तरह परिभाषित करती है कि ऐसी कोईभी कार्रवाई जो किसी राष्ट्रीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को समाप्त करने के इरादे से की गयी हो जिसके अन्तर्गत समूह के सदस्यों को मारा जाता हो, इन सदस्यों को शारीरिक या मानसिक चोट पहुंचायी जाती हो, ऐसे हालात पैदा किए जाते हों कि ऐसे समूहों की भौतिक बरबादी को अंजाम दिया जा सके। अब जहां तक जनसंहार को लेकर बने अन्तरराष्ट्रीय कन्वेन्शन का सवाल है, भारत सरकार ने वर्ष 1959 में ही उसपर अपनी सहमति बताते हुए हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन अभी तक उसने उसके मुताबिक अपने घरेलू कानूनों में परिवर्तन नहीं किए हैं। साफ है यह भारत सरकार के नीतिनिर्माताओं का विरोधाभासी रूख है, जहां वह अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बेहतर छवि पेश करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसके अनुकूल आचरण नहीं करते हैं। गुजरात के जख्मों का रिसते रहना या 1984 के दंगों के कातिलों तक आज भी न पकड़ा जाना यह शायद इसी बात की निशानी है।


? सुभाष गाताड़े