संस्करण: 14 फरवरी -2011

किसने सुनी उस अजन्मी की सिसकियाँ?
 

? डॉ. महेश परिमल

 

मारे देश के लिए यह गौरव की बात है कि यहाँ वर्ष में दो बार अनिवार्य रूप से देवी की पूजा की जाती है। देवी के नौ रूपों की पूरी श्रध्दा और भक्ति के साथ पूजा की जाती है। दूसरी ओर हम ग्रामीण महिलाओं को अशिक्षित मानकर उनके योगदान को हमेशा हाशिए पर रखते हैं। शहरी महिलाओं को हाथो-हाथ लेते हैं। पर यह भूल जाते हैं कि भ्रूण परीक्षण के बाद पेट में ही कन्या भूरण को खत्म कर देने में शहरी महिलाएँ ही सबसे आगे हैं। अखिर ये पुरुष प्रधान समाज कब समझ पाएगा कि कन्या के जन्म होने में वह भी पूरी तरह से जवाबदार है। नशे की गिरत में जकडो, जंक फूड के जाल में उलझे, कई तरह के व्यसनों में डूबे इस पुरुष की मर्दानगी को ही नष्ट कर रही है, ऐसे में वह कन्या भूरण का हत्यारा बनकर आखिर किस मर्दानगी का परिचय दे रहा है? एक तरफ नौ दिन तक उपवास रखने वाला देवी पूजक दूसरी तरफ कन्या भूरण का हत्यारा! वाह क्या सीन है?

ऑंकड़ों की बात करें तो हर रोज औसतन 250 लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं। 2009 में आतंकवादियों द्वारा रोज 6 व्यक्तियों की हत्या की गई। इसके अनुपात में यदि हम कन्या भूरण हत्या को देखें तो पिछले दो दशकों में हमने एक करोड़ (दस मिलियन) कन्याओं को पैदा होने के पहले ही दूसरी दुनिया में पहुँचा चुके हैं। किसी अन्य देश से इतने बड़े हत्याकांड की खबर अभी तक नहीं आई। इंदिरा गांधी की हत्या और गोधारा कांड के बाद मीडिया ने जेनोसाइड शब्द उछाला था, क्या इतनी बड़ी तादाद में कन्याओं की हत्या जेनोसाइड नहीं है? जीवन विज्ञान के शोध बताते हैं कि प्रकृति एक स्त्री की तुलना में पुरुष को अधिक जन्म देती है। इसके बाद भी आदर्श स्थिति प्रति हजार पुरुषों के अनुपात में 950 स्त्रियाँ हैं। परंतु वास्तविकता क्या है, इसे कौन जानता है?

गांधीजी ने जब अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन 1941 में चलाया था, तब उनके साथ 4 वर्ष की उम्र के प्रति हजार लड़कों में से 1010 लड़कियाँ थीं। अभी क्या हालात हैं? अभी तो केवल 2001 के ही ऑंकड़े उपलब्ध हुए हैं। इन ऑंकड़ों के अनुसार 6 वर्ष की उम्र के प्रति हजार लड़कों के मुकाबले 927 कन्याएँ थीं। उत्तार भारत ने पिछले पाँच वर्षों में काफी प्रगति की है, यह ऑंकड़े बताते हैं, पर वहाँ कितनी भूरण हत्याएँ हुई हैं, यह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। परिवार धन से तो सुखी हुआ है, पर संकीर्ण मानसिकता के कारण विचार और भी अधिक संकुचित हो गए हैं। मध्यम वर्ग के लोग कहते हैं कि जैसे ही हमें पता चलता है कि पत्नी के पेट में कन्या भूरण है, तो हम 12-15 सौ रुपए खर्च करने में नही हिचकते और गर्भपात करवा देते हैं।

इस स्थिति के लिए काफी हद तक हमारे चिकित्सक भी दोषी हैं। इसके पहले अल्ट्रासाउंड मशीन नहीं थी, तब पता ही नहीं चलता था कि गर्भ में क्या है? अब तो ऐसी मशीन न जाने कितने ही डॉक्टरों के पास हो गई है और वे जमकर कमाई कर रहे हैं। सरकार के तमाम दावे इन डॉक्टरों की कमाई के आगे थोथे जान पड़ते हैँ। इस तरह की मशीनें अब गली-मोहल्लों में भी देखी जा सकती है। आश्चर्य इस बात का है कि इन मशीनों का उपयोग शहरी महिलाएँ ही अधिक करती हैं। ग्रामीण महिलाएँ अभी तक ऐसी मशीनों के दुष्चक्र से काफी दूर हैं। हर राज्य का ऑंकड़ा बताता है कि वहाँ लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या लगातार कम होते जा रही है। इसमें छत्तीसगढ़, ओडिसा, पंजाब और हरियाणा की स्थिति काफी नाजुक है। एक बार ऑंकड़ों पर भी गौर कर लेंरू- एक हजार लड़कों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में 989, पंजाब 761, हरियाणा 760। इसके बाद भी देश के कई राज्य ऐसे भी हैं, जहाँ दो प्रेमियों को मार डालने में लोग अपनी शान समझते हैं।

अपने अहंकार में डूबे इन पुरुषों को कौन बताए कि कन्या के जन्म में उनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका है। किसी भी विशेषज्ञ से पूछा जाए, तो यही जवाब मिलेगा कि स्त्री के शरीर में एक्स क्रोमोजोम (रंगसूत्र) होते हैं, जबकि पुरुष के शरीर में एक्स और वाय दोनों ही प्रकार के क्रोमोजोम होते हेँ। यदि पुत्र चाहिए तो स्त्री के एक्स क्रोमोजोम के साथ पुरुष के वाय क्रोमोजोम का मिलाप होना ही चाहिए। दूसरी ओर स्त्री-पुरुष दोनों के ही एक्स क्रोमोजोम का मिलन होगा, तो कन्या ही जन्म लेगी। आधुनिक शहरी जीवन की भाग-दौड़, तमाम व्यसन, जंक फूड, फास्ट फूड, तम्बाखू, शराब, धूम्रपान आदि के कारण पुरुष अपनी मर्दानगी खो रहे हैं। उनके वाय क्रोमोजोम प्रभावित होने लगे हैं। इसलिए पुत्र की चाह वे चाहकर भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। इस हकीकत को पुरुष स्वयं समझें, तभी पता चलेगा कि कोई स्त्री आखिर लगातार कन्या को ही क्यों जन्म दे रही है? इस दंभी पुरुष को कौन समझाए कि कन्या के जन्म लेने से वही न केवल उसका बल्कि एक और खानदान का नाम रोशन करेगी। कई मामलों में इन्हीं कन्याओं ने बेटों से बढ़कर काम किया है।

एक साफ-सुथरी सोच ही समाज में बदलाव ला सकती है। सास-ससुर के उलाहने सहने वाली बहुओं को चाहिए कि उनके मुँह पर बेटे की डॉक्टरी रिपोर्ट दे मारे, ताकि वे भी समझ सकें कि दोष हमारी ही संतान में है। शिक्षित बहुएँ ही इस दिशा में आगे बढ़कर कुछ करें, तभी पुरुष प्रधान इस समाज का असली चेहरा सामने आएगा। अगर इन्होंने नहीं सुनी, उस अजन्मी मासूम की सिसकियाँ, तो फिर कौन सुनेगा?
 


? डॉ. महेश परिमल