संस्करण: 14 फरवरी -2011

 

आतंक का रंग और
भ्रष्टाचार का रंग

 

? अनुराधा भासिन जमवाल

 

तंक विकृत कहानियां बुनता है-न केवल दहशत, दर्द और सदमे की, बल्कि रहस्यमयी अपराधियों की और हाड़ कंपा देने वाली सनसनी से भरी साजिश, योजना और उनके गठबंधनों की। प्राय: आतंक की उत्पत्ति का पता लगाने पर कई अश्चर्य सामने आते हैं। 9/11 के बाद रिपोर्ट और अन्वेषण हिला देने वाले रहस्योद्धाटन की ओर इशारा किये कि अनेक आत्मघाती बम धमाके करने वाले गरीबी या अशिक्षा के कारण ऐसा करने को मजबूर नहीं थे। वे योग्य, पश्चिमी शिक्षा प्राप्त और अच्छे कामकाजी नौजवान आदमी थे, जो खुद से इस्लाम के इतिहास के प्रति प्रेरित या कट्टर इस्लाम के प्रति नये-नये समर्पित नौजवान थे। भारत में अनेक आतंकी योजनाएं हैं, जो हिन्दू अधिकार विंग और सरकारों को पाकिस्तान और इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के खिलाफ पर्याप्त उन्मादियों को तैयार करने की इजाजत दिये हैं। ये पाये गए कि इनकी उत्पत्ति आरएसएस जैसे उन्मादी हिन्दू चरमपंथियों के मुख्यालय में हुई है। संसद पर हमले के मामले जैसे कई अन्य मामलों में अपराध  सिध्द होने के बावजूद कई अनुत्तरित सवाल बाकी रहे हैं, जो खुलासा करते है कि जांचों में कई कमजोर कड़ियों को बिना जांच किये और बिना पर्याप्त सबूत जुटाये उन्हें छोड़ दिया गया है।

भारत में आतंक को लेकर मची ताजा हलचल यह है कि आरएसएस का आदमी इंद्रेश वाकई में आईएसआई का एक गुप्तचर हो सकता है। हमारे पास पहले से आरएसएस के आदमी के रूप में संचालित एक सैन्य अधिकारी है। हमारे पास एक हिन्दू प्रचारक मक्का मस्जिद और मालेगांव विस्फोटों में अपनी संलिप्तता स्वीकार करने के लिए बाधय है, जब इस मामले में गलत तरीके पकड़े गए मुस्लिम युवकों को बाद में छोड़ दिया गया। और हमारे पास इसी के जैसे एक सबसे सनसनीखेज आतंकी वारदात-मुंबई पर हमले- में रहस्यमयी पेचिदी की जाल से भरी कहानी है। इस हमले में पकड़े गए अजमल कसाब के बावजूद, जो इस वारदात को अंजाम देते सीसीटीवी कैमरा में कैद है। एटीएस अधिकारी हेमंत करकरे और उनके साथी पुलिस अधिकारियों की हत्याओं में कुछ आरोपी चेहरे हिन्दूवादी समूहों की ओर इशारा करते हैं। क्या विभिन्न रंगों और मतों वाले आतंकी समूहों के बीच कोई गठजोड़ है? तमाम आतंकी समूहों और औपचारिक एजेंसियों का संबंध शांतिपूर्ण वातावरण में उन्माद, अशांति पैदा करना है, ऐसा हमेशा बताया गया है। लेकिन अब एक प्रकार के गठजोड़ की ओर इशारा करने गंभीर संकेतक हैं। इन योजनाओं में कमजोर कड़ियां उभर रही है, जिसमें बॉलीवुड में एक गर्मागर्म लोकप्रिय फिल्म बनाने के पर्याप्त मसाले मौजूद है-हीरो खोज करने वाला है, विलेन अपनी रहस्मयी योजनाओं के साथ है। शायद यह न खत्म होने वाली सनसनीखेज नाटय धारावाहिकों के बेहतर होगा, जिसमें कई पेचीदगी, मोड़, क्लाइमेक्स और एंटी-क्लाइमेक्स हैं। फिल्मी दुनिया के कोई व्यक्ति इससे चाहे प्रेरित हो या नहीं, कम से कम पर्याप्त प्रमाण है कि सुरक्षित तरीके से कहानी का यह निष्कर्ष निकालने के लिए कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं है। दिग्विजय सिंह और सीताराम येचुरी के साथ अब भगवा आतंक पर क्लीन चीट मांगी जा रही है। यह पहली बार है कि राष्ट्रीय पार्टिया को भगवा आतंक के खतरे महसूस होने लगे हैं। यह विचार इस भ्रम को साफ करने में मदद कर सकता है कि आतंकवाद किसी विशेष धर्म, समूह, जाति या राष्ट्रीयता के लिए विशिष्ट है। और अब भी ऐसा ही है। आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता। वे सभी विद्वेष, भय और बदले के सिध्दांत से प्रभावित होते हैं। यह किसी एक विशेष देश की बात नहीं है। ना ही इसका संबंध अकेले शक्तिशाली से है या शक्तिहीन से है। देशों के ताकतवर लोग ने आतंकी रणकौशल के प्रति लगाव दिखाया है। ऐसे देशों में एक प्रकार की वैधता के साथ वे चीजों को बदलने का मजा लेते हैं। वे यह साबित कर चुके हैं कि वे आतंक के सबसे बड़े संचालक बन चुके हैं। अमेरिका द्वारा ड्रोन से हमले से लेकर कश्मीर में हिरासत में हत्याओं तक लोकतांत्रिक देश जघन्य अपराधों में गहराई से संलिप्त पाये जाते रहे हैं, जिसे बाद में 'राष्ट्रीय सुरक्षा' और 'आतंकी मुठभेड' के नाम के पीछे दफन कर दिया जाता है।

आतंकी के जैसा ही भ्रष्टाचार का भी कोई रंग नहीं होता। यह किसी भी व्यक्ति में हो सकता है-ताकतवर से लेकर कमजोर तक में, सभी धर्मों के लोगों में और सभी राजनीतिक दलों में। सभी तरह के पेशा घोटालों से दूषित है। भाजपा भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर कांगेस की बलि नहीं ले सकती। उसके खुद के भ्रष्टाचार की कहानी, जो येदुरप्पा के रूप में साक्षात है और शर्मनाक तरीके से उसका बचाव कभी भी एक गंभीर अभियान को तैयार होने नहीं दे सकता। स्वीस बैंकों में जमा भारतीय धन की कभी जांच नहीं की जायेगी, क्योंकि सभी रंग के लोग इस काली कमाई में शामिल हैं और उन्हें चालाकी से एक-दूसरे के करनामों पर बचाव करने की वजह मिल जाएगी। आतंकवाद हिंसा, हत्या, यातना, अशांति और भय फैलाता है। वहीं भ्रष्टाचार के परिणामस्वरूप हानि, विषमताएं, मुद्रस्फीति पैदा होते हैं। दोनों सभी रंग और मत के निर्दोष जिंदगियों को प्रभावित करते हैं।


? अनुराधा भासिन जमवाल