संस्करण: 13 मई -2013

दुष्कर्म के पीछे कहीं पोर्नोग्राफिक फूड तो नहीं?

? डॉ. महेश परिमल

                 पिछले कुछ महीनों से मीडिया में दुष्कर्म की खबरों में बेतहाशा वृध्दि हुई है। अब तो बच्चे-बच्चे भी रेप को समझने लगे हैं। उन्हें अब माता-पिता से यह पूछने की आवश्यकता ही नहीं है कि रेप आखिर होता क्या है? मीडिया ने हमारे मासूमों को समझदार बना दिया है। लगातार हो रही दुष्कर्म की खबरों को पोर्नोग्राफिक फूड की संज्ञा नहीं दी जा सकती? पहले तो दुष्कर्म की खबरें केवल शहरों तक ही सीमित थी, पर अब गली-मोहल्लों में भी दुष्कर्म की चर्चा है। लोग इस पर बात करते हुए किसी तरह की शर्म भी महसूस नहीं करते। कहा यही जा रहा है कि अनजाने में देश के बच्चे जंकफूड के रूप में पोर्नोग्राफिक फूड ले रहे हैं। पालकों को इसकी जानकारी ही नहीं होती। उनका बच्चा कम समझदार हो गया।

                 कवि इमर्सन ने 1844 में मेनर्सय नामक एक किताब लिखी है। इसमें उन्होंने लिखा है कि मॉरल क्वालिटी रूल  द वर्ल्ड, बट बट एट द शार्ट डिस्टंसीज द सेंसिस आर डिस्पोटिक। देखा जाए तो पूरी दुनिया ही बुध्दिमान और नैतिक रूप से सक्षम दिखाई देती है। पर वास्तविकता कुछ और ही है। करीब से जाकर देखा जाए, तो यह दुनिया हमें डिस्पोटिक यानी निरंकुश, स्वेच्छाचारी और हारे हुए पशु की तरह व्यवहार करने वाले समाज की तरह है। आज पूरे देश में जो कुछ हो रहा है, वह किसी काम की अति की तरह है। चारों ओर ऐसा वातावरण है, जिसमें सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। अखबार, टीवी, इंटरनेट सभी दुष्कर्म की खबरों से अटे पड़े हैं। संयम, सद्कार्य, ब्रह्मचर्य, नैतिकता आदि शब्दों को घोलकर पी गया है यह समाज। मीडिया इसमें उत्प्रेरक का काम कर रहा है। जंकफूड के बेतहाशा विज्ञापनों से आज की पीढ़ी उसे ग्रहण कर रही है और खाने-पीने के संयम को तोडने का काम कर रहा है। यदि यह कहा जाए कि यही जंकफूड आज दुष्कर्म की खबरों को बढ़ाने का काम कर रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

               मैडम लीसा ईशरवुड ने हाल ही में एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने आज के सर्वभक्षी लोगों पर गहरा कटाक्ष किया गया है। उन्होंने 21 वीं सदी के लोगों के लिए बहुत ही बढिया शब्द समूह दिया है। थियोलॉजी यानी धर्मदर्शन। बाडी थियोलॉजी यानी हमारे शरीर को निरोगी रखना हमारा धर्म है। थियोलाजी का एक अर्थ ब्रह्मज्ञान भी होता है। थियोलॉजी यानी धर्मशास्त्र, धर्मतत्व, अधयात्म विद्या आदि। पर डॉ ईशरवुड कहते है कि धर्म को तो हम सबने व्यापार की चीज बना दी है। इसलिए थियोलॉजी को जो पाल सके, वह तत्व है हमारा शरीर। इसके प्रति जागरुक रहना हम सभी का धर्म है। पर हम कर क्या रहे हैं अपने शरीर के साथ? कई अखाद्य चीजें खाकर हम अपने पेट को कब्रिस्तान ही बना रहे हैं। आजकल नामी अभिनेत्रियां मीडिया में जंकफूड के लिए प्रेरित करती दिखाई देती हैं। आईपीएल में भी अर्धनग्न युवतियां भी कुछ नाज-नखरे दिखा रही हैं। अनजाने में ये सभी हमें भ्रमित ही कर रही हैं। इन्हें देखकर, इनके विज्ञापनों को पढ़कर, देखकर हमें जंकफूड लेने को लालायित हो जाते हैं। इसी जंकफूड का ही असर है कि छोटे बच्चों को चश्मा लग रहा है। पालक यही कहते हैं कि बच्चे को टीवी से दूर करना हमारे बस की बात नहीं। जंकफूड से दूर रखा भी नहीं जा सकता। आजकल महिलाएं भी किचन में घर के मसालों से अधिक विश्वास बाजार के मसालों पर करने लगी हैं। बाजार के मसाले एकबारगी स्वादिष्ट लग सकते हैं। पर लम्बे समय तक उन मसालों का सेवन अनेक रोगों को जन्म दे रहा है। इसीलिए आज एक अमरीकी वर्ष में करीब 11 लाख रुपए तो केवल स्वास्थ्य पर ही खर्च कर रहा है। भारतीयों का खर्च अभी इतना नहीं है, पर भविष्य में हो जाए, तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

                हम लगातार देख, पढ़ और सुन रहे हैं कि आजकल बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। कुछ लोग जमाने को दोष देकर चुप हो जाते हैं, कुछ इसे संस्कारों का दोष मानते हैं, कुछ लोग इसके लिए पालकों को दोषी ठहराते हैं। समाजशास्त्री कुछ और ही सोचते हैं। वैज्ञानिक इसे जींस या हार्मोन में बदलाव की बात करते हैं। पर सबसे आवश्यक और गंभीर बात पर बहुत ही कम लोगों का ध्यान जा रहा है। कहाँ से आई बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति? क्यों होते हैं वे आक्रामक? आखिर क्या बात है कि वे अपने गुस्से को काबू में नहीं रख पाते? कहीं कुछ तो है, जो हमें दिखाई देते हुए भी नहीं दिख रहा है। आखिर क्या है ऐसा, कौन है दुश्मन, जो सामने होकर भी हमें दिखाई नहीं दे रहा है और हम उसका प्रहार झेल रहे हैं। आइए एक प्रयास तो करें कि आखिर कौन है हमारा दुश्मन...

                एक तो घर में आकाशीय चैनल से जो ज्ञान वर्षा हो रही है, वह हमारी कमजोरी बनती जा रही है। जी हाँ घर में केबल के माध्यम से आजकल टीवी पर जो कुछ परोसा जा रहा है, वह चिंतनीय है। इससे बच्चों का ज्ञान इतना अधिक बढ़ गया है कि कई बार माता-पिता को भी शर्मसार होना पड़ता है। दूसरी ओर जिस पर कम लोग ही ध्यान दे पाते हैं, वह है बच्चों का खान-पान। बच्चे दिन भर कुछ न कुछ खाते रहते हैं। उन्हें खाने से तो कोई रोक नहीं सकता। पर वे क्या खा रहे हैं, इस ओर तो ध्यान दिया ही जा सकता है। घर में अक्सर माताएँ बच्चों को बार-बार कुछ देने में आलस कर जाती हैं और उन्हें कभी मेगी, तो कभी पेस्टीज, कभी चिप्स, कभी कुरकुरे, कभी कुछ आदि खरीदकर लाने को कहती हैं, बस यही उनसे चूक हो जाती है। यही वे चीजें हैं,जो बच्चों के स्वभाव को बदल रहीं हैं। इन चीजों में स्वाद तो है, पर सात्विकता नहीं है। बच्चे केवल स्वाद ही देख रहे हैं, सात्विकता की जाँच कर पालकों का काम है। जो वे नहीं कर पा रहे हैं। बच्चे इन्हीं चीजों के आदी हो रहे हैं और हम उनके हिंसक होने का कारण खोज रहे हैं।

                ब्रिटिश जरनल हमें याद दिलाता है कि आज बच्चों के हिंसक होने के पीछे उपरोक्त कारण जवाबदार हैं। इसलिए कुछ संवेदनशील पालकों ने अपने बच्चों को टीवी के हिंसक कार्यक्रमों से दूर रखने की कोशिश की है। वे उन्हें कार्टून नेटवर्क देखने की छूट देते हैं। यहाँ भी यही छूट जी का जंजाल बन जाती है। कार्टून कार्यक्रमों के दौरान बीच-बीच में जो विज्ञापन दिखाए जाते हैं, उनमें अधिकांश विज्ञापन फास्ट फूड एवं जंक फूड के होते हैं। इन्हीं विज्ञापनों के कारण कोई बच्चा मेग्गी तो कोई मेकडोनाल्ड का दीवाना बन जाता है। यही जंक फूड है, जो उसे लगातार हिंसक बना रहा है। ब्रिटेन के आर्काईव्स ऑफ पेडियाट्रिक्स एंउ एडोलसंट मेडिसीनय के एक सर्वेक्षण के अनुसार बच्चे एक घंटे टीवी देखते हैं, तो उसके एवज में वे 167 किलोकेलोरी जितना अधिक आहार ग्रहण करते हैं। यह अधिक केलोरी अधिकांश जंक फूड के रूप में होती है। विदेशों में इस तरह से टीवी देखकर लेने वाले आहार को टीवी डायटय कहा जाता है। यही डायट है, जो बच्चों को हिंसक बना रही है। अब तो वैज्ञानिक भी इसे मानने लगे हैं। ब्रिटेन के 11 से 15 वर्ष की उम्र के 24 प्रतिशत लड़के और 27 प्रतिशत लड़कियां मोटापे का शिकार हैं। इसका यह अर्थ हुआ कि ये सभी बड़े होकर डायबिटिस के शिकार होंगे और कदाचित 50 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मर भी जाएं।

               जर्नल ऑफ एन्वायर्नमेंटल न्यूट्रीशल मेडिसीन नाम के सामयिक में प्रकाशित एक आलेख में बताया गया है कि आहार और मन के बीच संबंध जानने के लिए अमेरिका की एक जेल में बाल कैदियों पर एक प्रयोग किया। अमेरिका की सरकार द्वारा 13 से 17 वर्ष तक के बाल कैदियों को जो खुराक दी जाती थी, वह करीब जंकफूड की तरह ही होती थी। उसमें शरीर के पोषण के लिए आवश्यक लौह, मैग्नेशियम, जस्ता, विटामिन बी जैसे 12 तत्व पर्याप्त मात्रा में थे। उसके कारण इन बालकैदियों का व्यवहार अत्यंत हिंसक हो जाता था। वे जेल के अंदर में अपनों से झगडने लगते थे। मनोचिकित्सकों ने इनमें से 50 प्रतिशत बाल कैदियों को इन सारे तत्वों की गोलियाँ दीं और शेष 50 प्रतिशत को प्लेसिबो के रूप में पहचानी जाने वाली नकली गोलियाँ दी गईं। जिन बच्चों को असली गोली दी गईं थी, उसमें से 80 प्रतिशत बच्चों के हिंसक व्यवहार में असरकारक सुधार दिखाई दिया। दूसरी ओर प्लेसिबो लेने वाले 56 प्रतिशत बच्चों में सुधार के लक्षण दिखाई दिए। इसके विपरीत जिन बच्चों ने यह गोलियाँ लेने से इंकार किया था, उनके व्यवहार में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं देखा गया।

                 इस प्रयोग से मनोचिकित्सक इस नतीजे पर पहुंचे कि जो बच्चे जंकफूड ग्रहण करते हैं, उन्हें आवश्यक खनिज नहीं मिलने से उनका व्यवहार हिंसक हो जाता है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ साइक्रियाट्री में प्रकाशित एक शोध के अनुसार ब्रिटेन की जेल में बंद अपराधियों को जब विटामींस, मिनरल्स और फेटी एसिड के सप्लिमेंट वाला आहार दिया गया तब उसमें से 26 प्रतिशत अपराधियों के व्यवहार में सुधार के लक्षण दिखाई दिए।

              इंसान के मस्तिष्क को जब तक आवश्यक तमाम पौष्टिक तत्व नहीं मिलेंगे, तब तक उनका दिमाग ठीक से काम नहीं करेगा। आज हमारे समाज में जो मानसिक बीमारी बढ़ रही है, उसके पीछे यही बिगड़ी हुई आहार नीति दोषी है। आज जो महिलाएँ अपना वजन कम करने के लिए जिस तरह से भूखे रहतीं हैं, उससे उनके शरीर को आवश्यक तत्व नहीं मिल पाते। इसलिए वे महिलाएँ बहुत ही जल्द डिप्रेशन का शिकार बनतीं हैं। जंकफूड खाने वाली और डायटिंग करने वाली कई मॉडलों और टीवी अभिनेत्रियों की मौत की खबर कुछ माह पहले सुर्खियों में थीं। अपनी आहार की आदतों के कारण आज हमारा समाज एक विशाल पागलखाने के रूप में रूपांतरित हो रहा है। यदि हमें सही आहार चाहिए, तो वह हमें हमारे रोज के भोजन जैसे दाल, भात, रोटी, सब्जी में ही मिलेगा। इसी में हैं वे सारे आवश्यक तत्व, जो शरीर को चाहिए। हम नाहक ही अन्य खाद्य सामग्री की ओर भाग रहे हैं। इसे भोजन के रूप में लेने से शरीर को आवश्यक तत्व मिल जाते हैं। इससे शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ रहता है। इसके खिलाफ आज हम पावभाजी, पिज्जा, हेमबर्गर, सेंडविच, आइस्क्रीम, कोला डिकंस, ब्रेड, बिस्किट्स, चॉकलेट, वेफर्स, चिप्स, केक आदि बिना कार्बोहाईड्रेड वाली चीजें ग्रहण करते रहे हैं, इससे शरीर को पूरा पोषण नहीं मिलता और मस्तिष्क बात-बात में उत्तोजना की ओर बढ़ता है।

               आजकल टीवी में जितनी भी चीजों का विज्ञापन दिखाया जा रहा है। उसमें से अधिकांश नुकसानदेह ही है। जो इंसान इन चीजों के बिना जी सकता है, उससे सुखी इंसान कोई नहीं हो सकता। साबुन, शेम्पू, टूथपेस्ट, फ्रीज, वाशिंग मशीन, पेनकीलर्स, मोबाइल, अगरबत्ती, कार, टू व्हीलर्स, माइक्रोवेव, होम थिएटर, डीवीडी प्लेयर, इम्पोर्टेट फर्नीचर, डिटर्जेंट, मच्छर कास्मेटिक्स, बीमा पॉलिसी, एस्प्रो की गोली, टेल्कम पावडर, डियोडरंट, अंडरगारमेंट्स आदि चीजें न हों, तो आज हमारी बहुत ही ज्यादा सुखमय हो जाए। स्वस्थ और सुखी जीवन जीने के लिए जिन चीजों की हमें आवश्यकता है, उसका विज्ञापन कभी कहीं नहीं देखने को मिलता। टीवी पर बेकार की चीजें बार-बार दिखाकर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि यह हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसे खरीदना हमारा धर्म है, इसके बिना हमारा जीवन कभी सुखी नहीं रह सकता। जिसे इन चीजों की आवश्ययकता नहीं, वही इंसान सबसे अधिक सुखी है।

           इस प्रयोग से मनोचिकित्सक इस नतीजे पर पहुंचे कि जो बच्चे जंकफूड ग्रहण करते हैं, उन्हें आवश्यक खनिज नहीं मिलने से उनका व्यवहार हिंसक हो जाता है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ साइक्रियाट्री में प्रकाशित एक शोधा के अनुसार ब्रिटेन की जेल में बंद अपराधियों को जब विटामींस, मिनरल्स और फेटी एसिड के सप्लिमेंट वाला आहार दिया गया तब उसमें से 26 प्रतिशत अपराधियों के व्यवहार में सुधार के लक्षण दिखाई दिए।

             इंसान के मस्तिष्क को जब तक आवश्यक तमाम पौष्टिक तत्व नहीं मिलेंगे, तब तक उनका दिमाग ठीक से काम नहीं करेगा। आज हमारे समाज में जो मानसिक बीमारी बढ़ रही है, उसके पीछे यही बिगड़ी हुई आहार नीति दोषी है। आज जो महिलाएँ अपना वजन कम करने के लिए जिस तरह से भूखे रहतीं हैं, उससे उनके शरीर को आवश्यक तत्व नहीं मिल पाते। इसलिए वे महिलाएँ बहुत ही जल्द डिप्रेशन का शिकार बनतीं हैं। जंकफूड खाने वाली और डायटिंग करने वाली कई मॉडलों और टीवी अभिनेत्रियों की मौत की खबर कुछ माह पहले सुर्खियों में थीं। अपनी आहार की आदतों के कारण आज हमारा समाज एक विशाल पागलखाने के रूप में रूपांतरित हो रहा है। यदि हमें सही आहार चाहिए, तो वह हमें हमारे रोज के भोजन जैसे दाल, भात, रोटी, सब्जी में ही मिलेगा। इसी में हैं वे सारे आवश्यक तत्व, जो शरीर को चाहिए। हम नाहक ही अन्य खाद्य सामग्री की ओर भाग रहे हैं। इसे भोजन के रूप में लेने से शरीर को आवश्यक तत्व मिल जाते हैं। इससे शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ रहता है। इसके खिलाफ आज हम पावभाजी, पिज्जा, हेमबर्गर, सेंडविच, आइस्क्रीम, कोला डिकंस, ब्रेड, बिस्किट्स, चॉकलेट, वेफर्स, चिप्स, केक आदि बिना कार्बोहाईड्रेड वाली चीजें ग्रहण करते रहे हैं, इससे शरीर को पूरा पोषण नहीं मिलता और मस्तिष्क बात-बात में उत्तोजना की ओर बढ़ता है।

               आजकल टीवी में जितनी भी चीजों का विज्ञापन दिखाया जा रहा है। उसमें से अधिकांश नुकसानदेह ही है। जो इंसान इन चीजों के बिना जी सकता है, उससे सुखी इंसान कोई नहीं हो सकता। साबुन, शेम्पू, टूथपेस्ट, फ्रीज, वाशिंग मशीन, पेनकीलर्स, मोबाइल, अगरबत्ती, कार, टू व्हीलर्स, माइक्रोवेव, होम थिएटर, डीवीडी प्लेयर, इम्पोर्टेट फर्नीचर, डिटर्जेंट, मच्छर कास्मेटिक्स, बीमा पॉलिसी, एस्प्रो की गोली, टेल्कम पावडर, डियोडरंट, अंडरगारमेंट्स आदि चीजें न हों, तो आज हमारी बहुत ही ज्यादा सुखमय हो जाए। स्वस्थ और सुखी जीवन जीने के लिए जिन चीजों की हमें आवश्यकता है, उसका विज्ञापन कभी कहीं नहीं देखने को मिलता। टीवी पर बेकार की चीजें बार-बार दिखाकर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि यह हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसे खरीदना हमारा धार्म है, इसके बिना हमारा जीवन कभी सुखी नहीं रह सकता। जिसे इन चीजों की आवश्यकता नहीं, वही इंसान सबसे अधिक सुखी है।

               वास्तव में टीवी के माधयम से यह बताने की कोशिश हो रही है कि उसमें विज्ञापित करने वाली चीजें आपके पास नहीं हैं, तो आप प्रगति की दौड़ में सबसे पीछे हैं। आप ही सोचें कि आज से 50 वर्ष पूर्व जब ये चीजें नहीं थीं, तो क्या हम दुरूखी थे? विज्ञापनों में दिखाई देने वाली कई चीजें हमारे लिए अनुपयोगी हैं। फिर भी इनका बार-बार दिखाया जाना हमें मानसिक रूप से इनका गुलाम बना रहा है। हम विज्ञापन देखकर चीजें खरीदने के शौकीन हो गए हैं। हमारे ब्रेनवॉश हो गया है। यदि गहराई और गंभीरता से इस दिशा में विचार करें, तो कुछ और ही नजारा दिखाई देगा। एक बार विचार की ओर एक कदम तो बढ़ाएँ...

? डॉ. महेश परिमल