संस्करण: 13 मई -2013

निरापद और सुरक्षित है,

कुडनकुलम परमाणुघर

?  जाहिद खान

                 कुडनकुलम परमाणु संयंत्र परियोजना पर जतलाई जा रही तमाम आशंकाओं को खारिज करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने इस परियोजना को निरापद और सुरक्षित बतलाया है। न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने हाल ही में इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि इसमें सुरक्षा की तमाम अनिवार्यताओं का ध्यान रखा गया है और यह परियोजना व्यापक जनहित में है। विशेषज्ञों ने सर्वसम्मति से इस परियोजना को लेकर जनता की सुरक्षा के प्रति व्याप्त आशंका और पर्यावरण की चिंताओं को दूर कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में साफ तौर पर स्पष्ट किया कि संबंधित प्राधिकारियों से आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद ही इस संयंत्र को चालू किया जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने सरकार को परमाणु संयत्र चालू करने, इसकी सुरक्षा और पर्यावरण मुद्दों के बारे मे 15सूत्री दिशा निर्देश भी जारी किए। इन दिशा-निर्देशों में मुख्यत: बिजलीघर के लिए ताजा पानी के पर्याप्त भंडारण और इस्तेमाल किए गए न्यूक्लियर यूल के सुरक्षित स्टोरेज की अचूक व्यवस्था होनी जरूरी है। अदालत के इस आदेश से कुडनकुलम परमाणु संयंत्र को शुरू करने की राह में अभी तलक जो भी अड़चने आ रहीं थीं, वह अब दूर हो गई हैं। जल्द ही इस परमाणु संयंत्र की एक हजार मेगावाट वाली पहली इकाई काम करना शुरू कर देगी।

              कुडनकुलम परियोजना को सुरक्षा उपायों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी। परमाणु संयंत्र विरोधी संगठनों ने अपनी याचिकाओं में इल्जाम लगाया था कि सरकार ने संयंत्र की सुरक्षा के लिये विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर कोई अमल नहीं किया है। याचिकाओं में परमाणु कचरे के निष्पादन,पर्यावरण पर इस संयंत्र के प्रभाव और आस पास के इलाके में रहने वालों की सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठाये गये थे। बहरहाल,इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत ने उस वक्त परमाणु संयंत्र में ईंधान भरने पर रोक लगाने से तो इंकार कर दिया, लेकिन संयंत्र और आसपास रहने वाले परिवारों की सुरक्षा से जुड़े सवालों पर विचार के लिये तैयार हो गया।

               अदालत ने अपने फैसले में इस परियोजना को व्यापक जनहित वाला बतलाते हुए कहा कि देश के आर्थिक विकास के लिए यह जरूरी है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से देश की वर्तमान और भावी पीढ़ी को सस्ती ऊर्जा मिल सकेगी। लिहाजा छोटी-मोटी असुविधा और समस्या को परमाणु ऊर्जा संयंत्र के दीर्घकालीन लाभों को प्रभावित करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। यही नहीं, संबंधित प्राधिकारी इसकी सुरक्षा और हिफाजत के प्रति गंभीर हैं, जो इस तथ्य से स्पष्ट है कि सुरक्षा के सत्रह में से बारह उपायों पर पहले ही अमल किया जा चुका है। यह बात सच भी है। जब से यह परियोजना अस्तित्व में आई है,केन्द्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के साथ ही न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन तथा दूसरी नियामक संस्थायें नियमित रूप से इस संयंत्र की निगरानी कर रहे हैं। यानी इस परियोजना को लेकर जो आशंकाएं और संदेह जतलाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह से आधारहीन हैं।

               गौरतलब है कि भारत और रूस के संयुक्त उद्यम के तहत कुडानकुलम में एक हजार मेगावाट के दो परमाणु रिएक्टर स्थापित किए जाने हैं। तमिलनाडु के तिरूनलवेली जिले के कुडनकुलम में स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र दो साल पहले बनकर तैयार हो गया था। इसकी पहली इकाई काम करना ुरू करती,इससे पहले यहां अचानक विरोध-प्रदर्षन शुरू हो गए। कुछ एनजीओ और स्थानीय मछुआरे कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का इस आधार पर विरोध करने लगे कि संयंत्र के शुरू होने से क्षेत्र की पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर खतरा पैदा हो जाएगा। यही नहीं, अगर जापान के फुकुशिमा रिएक्टर जैसी ऋासदी हो गई, तो कोई नहीं बचेगा। बहरहाल, विरोध-प्रदर्शन बढ़े, तो संयंत्र का काम रूक गया। बिजली उत्पादन के लिए करोड़ों-अरबों रूपए की भारी-भरकम रकम से तैयार संयंत्र ठप्प पड़ गया। संयंत्र चालू नहीं होने की वजह से सरकार को तब से हर महीने 750करोड़ रूपए का नुक्सान हो रहा है। संयंत्र का काम ठप्प पड़ा है और इसके कर्मचारी काम शुरू होने के इंतजार में हाथ पे हाथ रखे बैठे हैं। इंतजार, बिजली की भारी किल्लत से जूझ रहे तमिलनाडु और उसके पड़ोसी राज्यों को भी है। कब ये 2000 मेगावाट का परमाणु बिजली घर शुरू हो और उन्हें बिजली मिले।

               देश के सबसे बड़े परमाणु बिजली घर कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की जब शुरूआत हुई, तो इस परियोजना का कहीं कोई विरोध नहीं था। अलबत्ता, सुरक्षा को लेकर स्थानीय लोगों की कुछ आशंकाएं जरूर थीं। जो वाजिब भी हैं। जिन्हें सरकार ने आगे चलकर दूर भी कर दिया। सरकार ने कुडनकुलम परमाणुघर की सुरक्षा की जांच के लिए बकायदा एक टास्क फोर्स गठित की, जिसने इसकी सुरक्षा के लिए सत्रह सुरक्षा उपायों को अपनाने की अनुशंशा की। जिसे सरकार ने बाद में मान लिया। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि परमाणु बिजली घर से लोगों को खतरा दिखाई देने लगा ?वे इसके एकदम खिलाफ हो गए। जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं। विरोध-प्रदर्शनों के पीछे दरअसल वे गैर सरकारी संगठन थे,जो अमेरिका द्वारा वित्त पोषित होते हैं। गृह मंत्रालय की जांच में यह बात सामने निकलकर आई कि परमाणु बिजली संयंत्र विरोधी प्रदर्षनों को भड़काने में ये गैर सरकारी संगठन ही सबसे आगे हैं। यह एनजीओ अमेरिका और स्कैंडिनिवयाई मुल्कों से मिलने वाली रकम को कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन में खर्च कर रहे हैं।

                अमेरिका ऐसा क्यों कर रहा है? विरोध के पीछे एक नहीं, अनेक वजह हैं। मसलन अमेरिका नहीं चाहता कि भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम कामयाब हो। क्योंकि, भारत यदि कामयाब हो गया तो चीन की तरह वह भी उसे आगे चलकर चुनौती देने लगेगा। यही वजह है कि प्रत्यक्ष रूप से भारत के साथ खड़ा दिखने वाला अमेरिका, अप्रत्यक्ष रूप से उसके परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में अड़गें डाल रहा है। दूसरी अहम बात, भारत इस परमाणु बिजली घर को रूस की मदद से शुरू कर रहा है। जिसमें अमेरिका की कोई भूमिका नहीं। यही नहीं, देश में चल रही एक दीगर परमाणु ऊर्जा परियोजना जैतापुर में भी अमेरिका की कोई भूमिका नहीं। यह परमाणु बिजली घर फ्रांस की मदद से बन रहा है। जाहिर है, अमेरिका नहीं चाहता कि भारत में उसके अलावा और कोई काम करे। वह चाहता है कि परमाणु ऊर्जा परियोजना के क्षेत्र में भारत सिर्फ उसी के साथ भागीदारी करे और उसी से परमाणु साजो-सामान खरीदे। अमेरिका एक तरफ खुद अकेले भारत में परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं पर काम करना चाहता है, तो दूजी तरफ यह भी चाहता है कि भारत अपने यहां प्रस्तावित परमाणु दायित्व कानून में बदलाव लाए। क्योंकि, कानून में सख्त व्यवस्था है कि दुर्घटना की स्थिति में वे तमाम कंपनियां हर्जाने के लिए जिम्मेदार होंगी, जिनकी गलती इसमें पाई जाएगी। अमेरिका के राश्ट्रपति ओबामा भी निजी तौर पर हमारे प्रधानमंत्री पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं कि भारत परमाणु दायित्व कानून में ऐसा बदलाव करे कि दुर्घटना होने पर अमेरिकी कंपनियों पर कोई जबावदेही न आए। अमेरिका का दोगला और स्वार्थी रवैया इस बात से भी जाहिर होता है कि गुजरात और आंध्र प्रदेष में अमेरिका की मदद से बन रहे परमाणु बिजली घरों का काम फिलवक्त इसलिए रूका हुआ है कि अमेरिकी कंपनियां परमाणु दायित्व कानून में बदलाव चाहती हैं। उनका साफ-साफ कहना है कि जब तक भारत इस कानून को नरम नहीं करता, वे भारत को कोई परमाणु साजो-सामान नहीं देंगीं।

               कुडनकुलम परमाणु बिजली घर को लेकर देश के अंदर जो आशंकाएं व कयास लगाए जा रहे थे, वे पूरी तरह से वेबुनियाद हैं। अब इस बात की पुश्टि हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कर दी है। सच बात तो यह है कि कुडनकुलम परमाणु संयंत्र दुनिया का सबसे सुरक्षित और बेहतरीन ऊर्जा संयंत्र है। भारत के जाने-माने वैज्ञानिक और पूर्व रा्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम ने खुद कुडनकुलम जाकर संयंत्र की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के बाद देषवासियों को यकीन दिलाया था कि ''यह संयंत्र पूरी तरह सुरक्षित है और इसकी तुलना जापान के दशकों पुराने फुकुशिमा रिएक्टरों से नहीं की जानी चाहिए।''परमाणु बिजली घर विरोध के पीछे सिर्फ और सिर्फ निजी स्वार्थ हैं। अब जबकि, कुडनकुलम परमाणु संयंत्र परियोजना पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपनी मुहर लगा दी है, तो उम्मीद बंधना लाजमी है कि जल्द ही बिजली उत्पादन का रूका हुआ काम दोबारा शुरू हो सकेगा।  

   
? जाहिद खान