संस्करण: 13 मई -2013

व्यक्ति पूजा

कब तक ?

?  डॉ. देवप्रकाश खन्ना

               भारतीय संस्कृति में देवपूजा का बड़ा महत्वपूर्णं स्थान है। भले ही हमारा वेदान्त दर्शन एकेश्वरबाद का पोषक है, पर हमारे पूर्वजों ने 33,000 विभिन्न देवी देवताओं की शक्तियों में व उनकी पूजा में अपना विश्वास व्यक्त किया है। हमारे देश की बहुसंख्यक धर्म परायण जनता की मान्यताएँ बहुदेववादी है। राम, कृष्ण, हनुमान, सीता, राधा, पार्वती, शिव, विष्णु, गणेश, काली माई आदि देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के आगे श्रध्दालुजन बड़ी श्रध्दा से सिर झुकाते व साष्टॉग करते करते मिल जायेगें।

               साथ ही उपनिषदों द्वारा प्रदत्त ''मातृदेवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव' की परम्परा में भारतीय जन मानस अपने सब बड़ों व पितरों की पूजा विधि विधान से करते देखे जाते हैं। फिर यह पूजा आगे बढ़ते बढ़ते सशरीरीजनों को भी अपने में शामिल कर लेती है। जहॉ कुछ दशक पूर्व ग्वालियर के एक भक्त को आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा स्थापित कर उनका मन्दिर बनवाने की शुरूआत करने के समाचार ने सबका धयान अपनी ओर आकृष्ट किया था । वहीं कुछ वर्ष पूर्व बहन मायावती ने अपने मुख्यमंत्री काल में उत्तर प्रदेश के अनेक नगरों के महत्वपूर्ण स्थलों पर अपनी व स्व. कांशीराम जी की प्रस्तर प्रतिमाएँ बनवा कर लगवा दी । मृत्यु के बाद गाँधी, नेहरू, इन्दिरा गाँधी, राजीव गाँधी, दीन दयाल उपाध्याय, सुभाष, रवीन्द्रनाथ टैगौर, शिवाजी, महाराणा प्रताप प्रवृत्ति के महापुरूषों की मूर्तियाँ देखना तो आम बात है । सारांश यह है कि हम भारतवासी जिसे भी चाहते या श्रेष्ठतम मानते हैं, उनकी प्रतिमाएँ बनवा कर इन पर हारफूल चढ़ाकर उनकी पूजा शुरू कर देते हैं । लगभग रोजाना ही हम आज के राजनैतिक नेताओं, राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रीगणों व निगमों के अध्यक्षों व धामिक नेताओं के आगमन/प्रस्थान पर भीड़ जुटाकर उन्हें फूलों से लादते हैं व कई बार अनेक साधानों से जुटाई गई भीड़ों को व्यवस्थित करने के उद्ेश्य से पुलिस जनों को उस एकत्रित जनमानस पर डण्डे बरसाते जाता या घकियाते भी देखते हैं ।

                आज व्यक्तिवाद ने हमारे देश में एक नया रूप धारण कर लिया है । अनेक भारतियों की तरह ही हमारे देश का मीडिया यह मानकर चलने लगा है कि सन्  2014 का लोक सभा का चुनावी मुकाबला प्रमुखत: राहुल गॉधी व नरेन्द्र मोदी के बीच होगा । इन दोनों को सिध्दान्तवादी कम व तात्कालिक परिस्थितियों में बँधो देखना लोग मानते हैं । जहॉ एक को देश में हिन्दू पहचान का पक्षकार होकर मजबूत व कड़ी सरकार का हिमायती होना व अल्पसंख्यकों की तुष्टि का पोषक नहीं कहा जाता है,वहीं दूसरा किसी भी बड़ी शासकीय जिम्मेदारी को अभी तक न सम्भालने वाला होने से प्रतिबध्दताओं के प्रति लचीला,अल्पसंख्यकों का परिपोषक व सरकारी खजाने में हो रहे भ्रष्टाचार के प्रति नरम रूख अपनाने वाला सामाना जाता है। इन दोनों के बीच का मुकाबला दो पार्टियों या दो विचारधाराओं की अवधारणाओं के बीच संघर्ष न होकर,दो व्यक्तियों के बीच संघर्ष का रूप लेता दिखाई पड़ना कहा जा रहा है।  राजनैतिक पार्टियों के सिध्दान्तों की विचारधाराओं की अब कोई खास महत्ता नहीं रह गई है। नायकवाद व्यक्ति पूजावाद देश में अपना सिर उठाता साफ दिखाई पड़ रहा है।

               आज देश की राजनीति में सिध्दान्तों को पीछे छोड़कर व्यक्तिवाद का बोलबाला है। हर बड़े नेता की अपनी कॉग्रेस है । व्यक्ति विशेष सोनिया गांधी, शरद पॅवार, ममता बनर्जी, सभी अपने अपनी-अपनी कॉग्रेस में महत्वपूण्र हो गये हैं। इसी तरह जनता दल के विभिन्न नेताओं के अपने अपने जनता दल है । इनमें प्रमुख है - राष्ट्रीय जनता दल (लालू यादव) जनता दल यूनाईटेड (शरद यादव) बीजू जनता दल (बीजू पटनायक) जनता दल (अजित सिंह)। ऐसे ही कम्यूनिस्ट दलों व भाजपा के भी अनेक रूप हैं । जरा मौका मिल जावे तो इनमें से अनेक नेता सिध्दान्त विहीन होकर एक साथ मिल कर सरकार में शामिल हो जायेगें व कमाई के मंत्रीपद, लालबत्ती की गाड़ी, टेलीफोन, बिजली व अन्य अनेक सुविधाओं को डकारने में देरी नहीं करेंगे । सरकारें सिध्दान्तों पर आधारित न होकर आपसी गठबन्धन पर कायम हैं । व्यक्ति के प्रति निष्ठा ही सर्वोपरि है । पार्टी के सिध्दान्त जाये भाड़ में ।

                 इस व्यक्ति पूजा का दूसरा रूप है व्यक्ति सुरक्षा। राजनेता जरा महत्वपूर्ण हुआ नहीं कि उसे अपने आसपास सुरक्षा का खतरा मण्डराता दिखने लगता है। सरकार को सहयोग करने व उससे लेन देन के सम्बन्ध बनाकर वह सुरक्षा के नाम पर सरकारी सुरक्षा के हथियारबन्द जवान, गाड़ी, वायरलेस आदि हथियाने की जुगत भिड़ाने में तल्लीन हो जाता है । एक दूसरे के साथ अपने हितों को बॉटते नेतागण एक्स/वाई/जेड प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था अपने लिए प्राप्त करते रहते हैं। ऐसे सुरक्षा घेरों में फॅसे नेतागण आज सारे देश में घूमते देखे जा सकते हैं । बडे बड़े शहरों में इन नेताओं की गाड़ियॉ के काफिले जाम लगाते व जनमानस को परेशान करते देखे जा सकते हैं। सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति इन जामों से उत्पन्न समस्याओं में फॅसता उलझता रहता है। यूपी में व्हीआईपी सुरक्षा के लिए लगे जवानों व साधानों पर 120 करोड़ रूपये, दिल्ली में 341 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष खर्चै जा रहे हैं। व्हीआईपी, सिक्यूरिटी आज आवश्यकता कम स्टेटस सिम्बल अधिक बन गया है । जरूरी कर्त्तव्यों के सम्पादन हेतु पुलिस की संख्या पर्याप्त नहीं है, पर व्हीआईपी सुरक्षा में उन्हें झोंककर उन पर शासकीय धन व जन की बरवादी की जा रही है । शायद इसी से खिन्न होकर सर्वोच्य न्यायालय ने व्हीआईपी सुरक्षा पर लगे कर्मचारियों की संख्या व उन पर खर्च का ब्योरा सरकार से मॉगा है। व्हीआईपी सुरक्षा देने के नियमों व आधारभूत कारणों बाबत भी सरकार से जानकारी चाही गई है । सत्ता के दुरूपयोग का यह महत्वपूर्ण विषय प्रतीत होता है । शासन के एक ऑकलन के अनुसार सन 2010 में 16788 महत्वपूर्णजनों (व्हीआईपी) सुरक्षा में 50049 पुलिस कर्मी लगे थे । पंजाब में सर्वाधिक 5410 पुलिस कर्मी, दिल्ली में 5001 आन्धा्रप्रदेश में 3958 पुलिस कर्मी विभिन्न व्यक्तिगत सुरक्षा डयूटी में लगे थे। न जाने इस लोकतंत्र देश में यह घोर समान्तवादी परम्परा कब बन्द होगी। राजाओं के सामन्ती युग में राजा व उसके परिवार जनों के चारों तरफ सुरक्षा व आडम्बर का घेरा लगा होता था । उपनिवेशवादी अंग्रेजों ने अपनी हिकमतअमली से धीरे धीरे भारत के विभिन्न हिस्सों पर अपना चॅगुल कसा और अपने अधीन भारत की प्रजा पर अपनी श्रेष्ठता बनाये रखने व उसे दिखाने के लिए उन्होंने तत्कालीन राजाओं, नवाबों व सामन्तों के राजसी ठाठ-बाठ व तौर तरीकों की नकल करना शुरू किया । अनेक नियम कायदे बनाये, आरक्षकों व डण्डाधारी अजीब अजीव सी चमकदार पोषाकों वाले लोगों को अपने आगे पीछे रखना शुरू कर दिया । ऐसे आडम्बर भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभाधयक्ष, राज्यपालों के चारों ओर भी आज  देखे जा सकते है ।

               यह राजकीय आडम्बर और उन पर आधारित व्यक्तिपूजा की परम्पराऐं प्रजातान्त्रिक नहीं हैं। ये तो राजतंत्रात्मक सत्ता की परिपोषक हैं। सदियों पुराने उप निवेशवाद व सामन्तवाद को दर्शाती इन परिपाटियों को आज भी बनाये रखना कतई प्रजा तान्त्रिक नहीं कहा जा सकता । पर कैसी विडम्बना है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के 65 वर्ष और लोकतंत्रात्मक संविधान को अपनाए 62 वर्ष बीत जाने पर भी हम इन पर अपनी पुरानी आस्था दर्शाते नहीं थक रहे । दूसरी ओर अपने प्रजातांत्रिक रूख का प्रदर्शन करते अनेक आधुनिक देश आज भी हमें मार्गदर्शन देते दिखाई देते हैं। स्कैण्डीनेवियन देशों में राष्ट्राधयक्ष स्वयं अपना वाहन चलाकर अपने कार्यालय जाते हैं। हॉगकॉग का शासक अपने आप अपना वाहन चलाकर अपने कार्यालय जाता है तथा स्वयं के मकान में निवास करता है । हमारे यहॉ तो चुनाव जीतते ही सुरक्षा का खतरा बताकर शासकीय गनमेन के रूप में अपने सेवक लेने की कैसे होड़ लगी रहती है।  जनता की गाढ़ी कमाई का कितना सारा धन इन आडम्बरपूर्ण व बड़ी सीमा तक अनावश्यक सुरक्षा चक्रों में बर्बाद होकर व्यक्ति की पूजा का उदाहरण प्रस्तुत करता है। केवल कुछ चुने हुए सांसदों नें अवश्य शासकीय सुरक्षा चक्र को न लेने की बात अमल में लाने की बात की है । कब बन्द होगी हमारे देश में यह व्यक्ति पूजा ?

? डॉ. देवप्रकाश खन्ना