संस्करण: 13 मई -2013

नहीं कर सकती अमीना हज यात्रा

? अंजलि सिन्हा

                केरल के मल्लपुरम जिले की 64 वर्षीय अमीना कुट्टी हज यात्रा करना चाहती थीं, लेकिन हज कमेटी के अडंगों के कारण उसने अब अपनी यह इच्छा पूरी करने के लिए केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की है। अमीना के शौहर नहीं हैं और उनके चारों बेटें अपने-अपने कारोबार में व्यस्त हैं। अमीना की पड़ोसन हज यात्रा पर जा रही थी तो अमीना ने भी उन्हीं के साथ यात्रा की योजना बनायी, लेकिन मार्च 2013 को हज कमेटी की तरफ से उन्हें पत्र मिला कि वे ऐसा नहीं कर सकतीं क्योंकि उनके साथ उनके रिश्तेदार पुरूष रखवाला नहीं है। शरीयत के मुताबिक पुरूष ''महरम'' यानि एक तरह से रखवाला जो उसका नजदीकी रिश्तेदार हो। अमीना ने संविधानप्रदत्त कानूनी हकों का हवाला देकर केस दायर किया है। अब देखना यह है कि अमीना के लिए अदालत क्या फैसला करती है ? अभी तक की रवायत बनी हुई है कि महिलाएं जब ऐसी कोई मांग करती हैं तो उसे निजी कानूनों के तहत फैसले के भरोसे छोड़ दिया जाता है और इन निजी कानूनों की व्याख्या पुरूष ही करते हैं। लेकिन महिलाओं द्वारा उठाए गए हक-हुकूक की लड़ाई समाज में बहस मुबाहिसों को तो जनम देती ही है। इस मसले पर भी कुछ मुस्लिम महिला जानकारों ने कहा है कि महिला की महरम दूसरी महिला भी हो सकती है। शरीअत में महरम का मतलब उन पुरूष रिश्तेदारों से लगाया गया है जिसके साथ महिला की शादी नहीं हो सकती। यानि ''जायज'' तरीके से पति के अलावा वे पुरूष जैसे पिता, दादा या परदादा, भाई, बेटा, पोता, भतीजा, भांजा आदि।

               गौर करनेवाला मसला यही है कि आज भी औरत क्या कर सकती है और क्या नहीं यह सब वह खुद तय नहीं कर सकती है। समय के अनुसार धार्मिक निर्देशों में बदलाव की खिड़कियां कैसे खुले इस मुद्दे पर हर समाज में चाहे वह किसी भी धर्म से सम्बधित समुदाय हो विमर्श होना जरूरी है। किसी न किसी रूप में यह विमर्श जारी भी है। रही बात हज के लिए सउदी जाने की तो इस मसले पर सउदी का कानून क्या कहता है यह भी देखना पड़ता है। उस समाज में पहले से ही महिलाओं के लिए काफी प्रतिबन्ध हैं। अक्सर लोग यह तर्क देते हैं कि इसीलिए वहां बलात्कार जैसे अपराध नहीं होते हैं। लेकिन समझने की जरूरत है कि क्या महिलाओं को ऐसा ही समाज और ऐसी ही सुरक्षा चाहिए जिसमें उनकी आजादी को कोई और ही तय करे। आज के समय में सुरक्षा तथा सहूलियत की कसौटी न्याय बराबरी और जनतंत्र ही हो सकती है, किसी को कैद में बन्द करके उसकी सुरक्षा की गारन्टी क्या कमाल कहा जा सकता है ? यानि बलात्कारी भेड़िये वहां भी हैं और उन्हीं से बचाने के लिए समाज महिलाओं को महरम की देखरेख में तथा दीवारों के सीखचों में रखना चाहता है। उस समाज की तारीफ तो तब होती जब महिलाएं कहीं भी विचरण के लिए अपने ढंग से जीने के लिए आजाद होतीं और उनका समाज उनकी आजादी की रक्षा हर कीमत पर करता। अगर समाज इतनाही अच्छा होता तो औरत की रक्षा क्यों करनी पड़ती और वह भी नजदीकी पुरूषों द्वारा ही ? यानि महिलाओं के लिए वह बेहद असुरक्षित समाज है जिसकी वजह से उसे महिलाओं के लिए हर कदम पर ''रखवालों'' का सहारा चाहिए, यह कसौटी किसी भी स्वस्थ्य समाज का आधार नहीं बन सकती है।

                यह अकारण नहीं कि वैसे वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम ने वर्ष 2009 में 'ग्लोबल जेण्डर गैप' को लेकर जो आंकड़े जारी किए थे, उनमें जेण्डर समानता की फेहरिस्त में 134 देशों की सूची में सउदी अरब को 130 वे पायदान पर रखा था। वर्ष 2011 में किंग अब्दुल्ला ने महिलाओं को मताधिकार देने और स्थानीय निकायों के चुनावों में खड़ा होने की बात कही थी, मगर बात वहीं रह गयी। फिर कार चलाती हुई किसी महिला का मुद्दा सामने आया, जिसे दस कोड़े मारे गए, और फिर बहस बन्द हो गयी।  सउदी अरब को इस दिशा में कितनी दूरी तय करनी है यह इस बात से भी पता चल सकता है कि वहां स्कूलों के अन्दर छात्राओं को खेलने देने की अनुमति देनेवाला नियम अभी हालही में बना है। बीते ओलिम्पिक में पहली दफा सउदी अरब की तरफ से दो महिला प्रत्याशियों को भेजा गया था। कह सकते हैं कि यह एक किस्म की मजबूरी भी थी,क्योंकि अपने यहां के सख्त कानूनों के चलते वहां किसी लड़की/किशोरी को खेलने देने से स्पष्ट मना किया जाता रहा था,जिसकी वजह से ओलिम्पिक कौन्सिल ने उन्हे अल्टीमेटम दिया था और खेल से बाहर करने की चेतावनी दी थी।

                पिछले दिनों सउदी अरब में घरेलू हिंसा के खिलाफ मुहीम शुरू की गयी है। एक अनुमान के हिसाब से छह में से एक स्त्री हर दिन शाब्दिक, शारीरिक या भावनात्मक तौर पर प्रताडित होती है और इनमें से 90 फीसदी मामलों में उत्पीड़क पिता या पति होते हैं। कह सकते हैं कि उस रूढिवादी और दमन पर टिके मुल्क में अपने किस्म की यह पहली मुहिम होगी। इसको लेकर जारी पोस्टर में एक महिला को नकाब में दिखाया गया है, जिसकी एक आंख लाल है, जिससे पता चलता है कि वह हिंसा की शिकार रही है। (गार्डियन, 30 अप्रैल 2013)

              किंग खालेद फाउण्डेशन - जो इसके पहले के राजा की याद में स्थापित आफिशियल चैरिटी की संस्था है - की तरफ से संचालित अभियान के अन्तर्गत इस विज्ञापन को जारी किया गया है। एक तरह से यह विज्ञापन सउदी अरब में बिल्कुल नया है जिसका मकसद बताया गया है कि 'सउदी अरब में महिलाओं एवं बच्चों को अत्याचार से कानूनी सुरक्षा प्रदान करना।' इसके अन्तर्गत सउदी लोगों को ऐसे मामलों की सूचना मदिना, नजरान, मक्का और रियाद जैसे विभिन्न स्थानों तक पहुंचाने के लिए कहा गया है। अब विडम्बना यही है कि जिस आधार पर अमीना की हज यात्रा में अडंगा लगा है क्योंकि उसका कोई 'रखवाला' उसके साथ नहीं होगा, वही नौबत तमाम महिलाओं पर भी आ सकती है। वजह है कि सउदी अरब में स्त्रिायां अपने पुरूष अभिभावक की इजाजत के बिना कहीं जा नहीं सकतीं, न कार चला सकती हैं और अगर उन्होंने देश से बाहर जाने की कोशिश की तो तत्काल उनके पुरूष रखवालों के पास टेक्स्ट मेसेज पहुंच सकता है।

   ? अंजलि सिन्हा