संस्करण: 13 मई -2013

राम का चौदह बरस का वनवास

मार्ग के विश्राम स्थलों का रामचरित मानस में वर्णन

? राजेन्द्र जोशी

               त्रेतायुग में माता कैकई की हट और पिता राजा दशरथ की आज्ञा का पालन करते हुए श्री राम ने अयोध्या का राजपाट त्यागकर चौदह बरस के लिए वन को प्रस्थान किया। अयोध्या के राजा दशरथ ने जब दर्पन में अपना मुख देखा तो उन्हें अपनी ढलती आयु का आभास हुआ-रामचरित मानस में तुलसीदास ने एक चौपाई में इसे अभिव्यक्त किया है-''श्रवण समीप भयेहु शितकेशा, मनहूं जरठपन'' अस उपदेशा''। राजा दशरथ ने तभी गुरु वशिष्ठ और अपने मंत्रियों के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा-'जो पांचहि मत लागेऊ नीका करहूं हरिष हिय रामहि टीका। राम राजतिलक की चल रही तैयारी के बीच जब माता कैकई हटपूर्वक राजा दशरथ से अपने वचन निभाने का दाव फेंका तो राजा दशरथ विवशतावश कैकई को दिए गये पूर्व वचनों से विमुख नहीं हो पाये। रामचरित मानस में तुलसी ने इस घटनाक्रम को और दासी मंथरा की चाल में फंसी माता कैकई की हट का व्यापक चित्रण मिलता है। कैकई ने दशरथ से अपना वचन प्रस्तुत करते हुए मांग की-'तापस वेष विशेष उदासी, चौदह बरस राम वनवासी'।

              कैकई के वर मांगने पर राजा दशरथ के साथ ही संपूर्ण अयोध्या में विषाद का वातावरण छा गया। वनवास के वरदान मांगने की सूचना जैसे ही राम को पहुंचती हैं उन्होंने माता पिता की आज्ञा पालन को अपना बड़ा भाग्य माना। माता से मिलते हुए राम कहते हैं 'सुनहूं मात सोई सुत बड़भागी, जो पितुमात वचन अनुरागी'। वन के लिए प्रस्थान करते समय धर्मपत्नी सीता और भ्राता लक्ष्मण भी राम के प्रति अपने अगाध प्रेम को रोक नहीं पाये। सभी के मनाने पर भी दोनों अपने पतिधर्म और भ्रातृधर्म से विमुख नहीं हुए। सासु माताओं द्वारा मनाने पर सीता ने कहा-'वनदेवी वनदेव उदारा, द्वारा मनाने पर सीता ने कहा-वनदेवी' वनदेव उदारा, करिहहिं सासु ससुर सम सारा'। उनका कहना था कि उदार हृदय की वनदेवी और वनदेवता ही सास ससुर समाज मेकी सार-संमार करेंगे।

               संसार में जो भी राम की लीलाओं और राम के जीवन के विविध संदर्भों में रूचि रखने वाले हैं तथा राम को अवतार मानकर अपना ईष्ट मानते हैं वे राम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारकर मानवता का संदेश देते आयु है। भक्त तुलसीदास ने ईश्वर के अवतार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित कर दिया है। भगवान राम के जीवन की लीलाओं को लेकर कतिपय ताकतों और विचारभिन्नता रखने वाले लोगों द्वारा भ्रम फैलाये जाने के भी कई उदाहरण देखने में आ जाते हैं। रामचरित मानस में भगवान राम की लीलाओं का जो वर्णन मिलता है उसके प्रति संसार में विश्वसनीयता की भावना को बल मिलता है। संसार के सभी धर्मावलंबियों और संप्रदायों के आराध्यों के प्रति अनुयायियों में गहरी आस्थायें और सम्मान हैं। जब-जब भी इन अवतारों के जीवन के प्रति मिथ्या संदर्भों के माध्यम से जनता के बीच भ्रम फैलाने की स्थिति बनती है। स्वाभाविक है जन आस्थाओं को ठेस पहुंचती है।

                 भगवान जब अयोध्या से चौदह बरस के वनवास की यात्रा पर निकलते हैं तब वनांचलों में किन किन स्थलों पर उन्होंने सीता और लक्ष्मण के साथ अपने विश्राम स्थल बनाये उनका जो एक मान्य वर्णन हमारे धर्मग्रंथों में मिलता है वह सबके लिए विश्वसनीय है। जहां इन धर्मग्रंथों में विश्राम स्थलों के संदर्भ मिलते हैं, वे क्षेत्र धार्मिक स्थलों का रूप ले चुके हैं, जहां लाखों करोड़ों अनुयायी अपनी आस्थायें प्रकट करने दर्शनार्थ पहुंचते हैं। गंगा नदी को पार करते समय केवट से संवाद हुआ। केवट प्रसंग के बाद जब श्रीराम गंगा पार हो जाते हैं तब वे भारद्वाज ऋषि के आश्रम में पहुंचते हैं। ऋषि द्वारा मिले आदर सत्कार के बाद श्रीराम ने भारद्वाज मुनि से पूछा-'राम, सप्रेम कहेऊ मुनि पाही, नाथ कहिअ हम केहि मग जाही।' राम द्वारा यह पूछने पर कि अब इस वनांचल में किस मार्ग से आगे की यात्रा करें, तब ऋषि ने अपने चार शिष्यों को मार्ग प्रदर्शन के लिए साथ भेज दिया।

               वनांचल के सौंदर्य और पशु पक्षियों की लुभावनी लीलाओं का आनंद लेते हुए श्री राम चलते चलते वाल्मिक ऋषि के आश्रम पहुंच गये, 'देखत बन सर सैल सुहाए, वाल्किमि आश्रम प्रभु आये।' ऋषि वाल्मिक ने श्रीराम को परामर्श दिया कि आगे जाकर आपको चित्रकूट मिलेगा, वहां आप विश्राम करें-'चित्रकूट गिरी करऊ निवासू, तह तुम्हार सब भांति सुपासु। चित्रकूट एक ऐसा पावन स्थल हैं जहां वनभूमि में तपस्यारत अत्रि ऋषि निवास करते हैं। ऋषि भारद्वाज के परामर्श पर अत्रि ऋषि के निवास पर राम सीता और लक्ष्मण ने अपना विश्राम स्थल बनाया और वहीं रहे। चित्रकूट में भरत मिलाप हुआ। राम भरत मिलन के संदर्भ की कथा सभी जानते हैं। इसी चित्रकूट में अत्रि ऋषि की पत्नी अनसुइया की सीताजी से भेंट का प्रसंग है। सीता को देखकर 'ऋषि पत्नी मनसुख हरषाई, आशिष देय निकट बैठाई'। ऋषि पत्नी ने सीता को यहां नारी के आदर्शों और गुणों पर सीख दी।

              ऋषि मुनियों के आश्रमों में विश्राम करने के बाद ये वनवासी निरंतर आगे बढ़ते चले गये और पंचवटी में आगे जाकर अपना विश्राम स्थल बनाया। पंचवटी आवास के दौरान मारीच और सुबाहु का वध भी श्रीराम ने किया। सीताहरण की घटना भी पंचवटी की ही है। सीता की खोज में जब वनों में राम और लक्ष्मण निकल पड़े तो उन्हें राम की भक्ति में लीन एक भीलनी शबरी का आश्रम मिला। शबदी की आस्था और राम के प्रति उसकी भक्ति का ही प्रमाण है कि राम ने उसके राम ने उसके झूठे फलों का सेवन किया। शबरी के आश्रम के बाद सीता की खोज में भटकते हुए दोनों भाइयों को आगे एक पर्वत दिखाई दिया-'आगे चले बहुरी रघुराया, ऋष्यमूक पर्वत नियराया'। इस पर्वत पर ही श्रीराम का मिलन भक्त हनुमान से हुआ और हनुमान के माधयम से उस वनांचल के शासक सुग्रीव तक श्रीराम पहुंचे। सुग्रीम से भेंट के बाद सुग्रीव की वानरसेना ने सीता माता की खोज में जो सहयोग दिया वह सुग्रीव राम की मित्रता और राम के प्रति आस्था का भावनात्मक उदाहरण है। फिर कैसे राम आगे बढ़े, किन किन स्थानों से गुजरे और किस तरह समुद्र के तट पर पहुंचे जहां उन्होंने समुद्र से संवाद स्थापित किया और मार्ग न मिलने पर अपना क्रोधा प्रकट किया।  रामचरित मानस में इन स्थितियों का सटीक वर्णन है। रामेश्वर स्थापना के बाद राम और उनकी वानर सेना सागर पार करके लंका की सीमा में प्रवेश कर गये। रावण पर विजय पाने के बाद राम जिस तरह अयोधया वापिस आये हैं उसके वर्णन से भी संसार पूरी तरह अवगत है। वनवास के दौरान राम के आवास स्थल जिन जिन जगहों पर और जिन दिशाओं की ओर रहे उनके संदर्भ रामचरित मानस में देखे जाते हैं। राम वनगमन और वनांचल की लीलाओं के संदर्भों की दिशाओं को बदलकर कुछ नई कहानियां गढ़ने से लोगों की भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक है।

? राजेन्द्र जोशी