संस्करण: 13 मई -2013

प्रतिरोध दमन के लिए अब सॉनिक बूम अर्थात ध्वनिक तोपें

? सुभाष गाताड़े

              विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली के जन्तर मन्तर या अन्य स्थानों पर पहुंचने वाले लोगों के लिए अब एक बुरी ख़बर।

               राजधानी की पुलिस ने एक हाईटेक आवाज उपकरण के इस्तेमाल करने की योजना बनायी है जिसे 'लाँग रेंज एकोस्टिक डिवाइस' कहा जाता है जो एक ऐसी भेदनेवाली आवाज़ को निकालता है कि आप स्थायी तौर पर बहरा होने की कीमत चुका कर ही उसके आसपास ठहर सकते हैं। अमेरिका, आस्टे्रलिया, थाइलेण्ड, जार्जिया द्वारा प्रयुक्त इस धवनिक तोप का इस्तेमाल भारत में भी होगा, इसी का यह संकेत है।

              यूं तो यह सिलसिला नया ही शुरू हुआ है कि ऐसे धवनिक हथियार जिनका प्रयोग पहले नौसेना द्वारा समुद्री डाकूओं को भगाने के लिए किया जाता था,उसका इस्तेमाल अब  सरकारों द्वारा अपने देश के लोगों के खिलाफ किया जाएगा। याद रहे कि जार्जिया की राजधानी तिबिलिस में वर्ष 2007में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इसका जम कर इस्तेमाल हुआ था तो अगस्त 2009में थाईलण्ड की राजधानी बैंकॉक के पास डूसिट महानगर में जब नौकरी से छंटनी किए गए मजदूरों ने लम्बे संघर्ष के बाद फिर नौकरियां जब हासिल की और उसका विजय जुलूस निकाला तो उन पर भी इस ध्वनिक हथियार का प्रयोग हुआ। वर्ष 2009में जब अमेरिका के पीटसबर्ग में जी 20देशों के सम्मेलन का आयोजन हुआ था,और जिसमें शामिल होने के लिए तमाम मुल्कों के राष्ट्रपति पहुंचे थे,तब इसे अमेरिका के अन्दर पहली बार आजमाया गया था तो पिछले साल शिकागो में आयोजित नाटो देशों के सम्मेलन के वक्त भी आवाज़ की इस तोप का इस्तेमाल हुआ था।

              मालूम हो नागरिक आजादी के लिए अमेरिका के अन्दर सक्रिय संगठन अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन की तरफ से इसके इस्तेमाल से होने वाले बहरेपन के खिलाफ अदालत में याचिका भी दायर की गयी है। युनिवर्सिटी आफ मिसुरी में अंग्रेजी की प्रोफेसर कारेन पाइपर की तरफ से डाली गयी इस याचिका में बताया गया है कि किस तरह वह 2009 में पीटसबर्ग में आयोजित प्रदर्शन का अध्ययन करने के लिए वह पहुंची थी जहां चलते वाहन पर रखे गए इस ध्वनिक उपकरण से अत्यधिक तीव्रता की कर्णभेदी आवाज़े निकल रही थीं जिससे उसे स्थायी तौर पर बहरेपन आया है।

              आखिर यह उपकरण कैसे काम करता है? साडे छह किलो से 150 किलो वजन के दायरे में आने वाले इस उपकरण के जरिए ऐसी भेदक आवाज़े निकलती है, जो 152 डेसिबल्स तक पहुंच सकती है। मालूम हो कि आवाज की तीव्रता जानने का पैमाना है डेसिबेल। उदाहरण के लिए लगभग खामोशी को हम शून्य डेसिबल कह सकते हैं, फुसफुसाहट की तीव्रता 15 डेसिबल नापी जाती है तो साधारण बातचीत 60 डेसिबल होती है, कार का हार्न 110 डेसिबल तीव्रता की आवाज़ करता है तो एक रॉक कान्सर्ट या जेट इंजिन 120 डेसिबल तक तीव्रता तक पहुंचता है जबकि बन्दूक की गोली या पटाके की आवाज 140 डेसिबल तक पहुंचती है।

             गौरतलब है कि विशेषज्ञों के मुताबिक उपकरण के आकार के मुताबिक 100 मीटर दायरे से लेकर 2 किलोमीटर दायरे तक फैली भीड़ को इसके जरिए नियंत्रित रखा जा सकता है। वैसे दिल्ली पुलिस ने जिन उपकरण के लिए आर्डर दिया है, उसका दायरा 1 से 2 किलोमीटर होगा। पुलिस का अपना तर्क है कि बड़े पैमाने पर एकत्रित भीड़ पर न आप लाठीचार्ज कर सकते है, न उन पर आंसू गैस के गोले छोड़ सकते हैं और न ही पानी की तोप से उन्हें भगा सकते हैं।

             डाक्टर बताते हैं कि अगर 85 डेसिबेल से अधिक तीव्रता वाली आवाज़ काफी देर सुनने को मिले तो उससे धीरे धीरे कानों की सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। और अगर 110 डेसिबेल आवाज़ एक मिनट से अधिक सुनने को मिले तो सुनने की क्षमता हमेशा के लिए नष्ट हो सकती है। डाक्टरों के मुताबिक सौ डेसिबल तक की आवाज़ अधिक से अधिक पन्द्रह मिनट सुन कर व्यक्ति को वहां से हटना चाहिए, वरना उसकी श्रवणक्षमता प्रभावित हो सकती है। खबर आयी है कि दिल्ली पुलिस ने ऐसे पांच हथियारों को मंगाने का - जिन्हें 'लाँग रेंज एकोस्टिक डिवाइस' कहा जाता है, - निर्णय ले लिया है और मई माह में उसके पास यह उपकरण पहुंच भी जाएंगे। ऐसे प्रत्येक उपकरण की कीमत 35 लाख रूपए है। इस ध्वनिक तोप की बढ़ती लोकप्रियता का अन्दाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अमेरिका की जो कम्पनी एलआरएडी कार्प्स, इसका निर्माण करती है उसने वर्ष 2011 में 26 मिलियन डॉलर की बिक्री की, जो उसके पिछले साल की तुलना में 57 प्रतिशत अधिक थी।

                निश्चित ही सानिक बूम अर्थात ध्वनिक तोप को हम उन अप्राणघातक हथियारों की श्रेणी में शुमार कर सकते हैं जिनका प्रचलन हाल के समय में बढ़ा है। पिछले कुछ समय से हम भारत के अन्दर भी टेसर गन की चर्चा सुन रहे हैं, वह भी इसी श्रेणी में शामिल है। इस सिलसिले में पंजाब पुलिस ने अपनी दो नयी बटालियनों को तेसर गनों से लैस करने का निर्णय लिया है इसके अलावा कई पुलिस जिलों को भी इसे बांटा गया है। पंजाब सरकार के नक्शे कदम पर जम्मू कश्मीर, दिल्ली, मध्य प्रदेश और नेशनल सिक्युरिटी गार्ड की अपहरण विरोधी दस्ते ने भी इन टेसर गनों के लिए आर्डर दिया है। जाननेयोग्य है कि टेसर एक ऐसा इलेक्ट्रोशॉक हथियार होता है जो बिजली के प्रवाह को निर्मित करता है और स्नायुओं के स्वैच्छिक नियंत्रण को बाधित करता है और इस तरह प्रदर्शनकारी को मन्द कर देता है या सम्भावित खतरनाक व्यक्ति को कुछ समय तक के लिए बिल्कुल बेकार कर देता है। इस प्रभाव को न्यूरोमस्क्युलर पंगुपन/विकलांगता कह सकते हैं।

              यह जाननेयोग्य है कि अमनपसन्द विचारकों एवं वैज्ञानिकों में इन गैरपारम्पारिक हथियारों को लेकर चेतनता बढ़ रही है। चर्चित विश्लेषक टाम बुर्गहार्ड द्वारा सम्पादित किताब 'पोलिस स्टेट अमेरिका' में (टोरोण्टो, 2002, पेज 120) प्रकाशित लेख 'नान-लेथल वारफेअर' इस परिघटना पर बखूबी रौशनी डालता है। उसके मुताबिक 'यह नया फासीवाद जैवनिर्धारणवादी विचारधारा और अग्रगामी तकनीकी साधानों का इस्तेमाल करते हुए शरीर पर हमला करता है और हर नयी तकनीकी प्रगति तथा राजनीतिक आवश्यकताओं के साथ अपने सम्भावित लक्ष्यों का दायरा बढ़ाता जाता है।' वह दरअसल उस 'जादूई बुलेट/गोली' की तलाश में रहता है जो हर उस चीज़ का हथियारीकरण कर सकती है जो हमले का शिकार व्यक्ति को 'अक्षम' बना दे।

                 विज्ञान पर चर्चित पत्रिका 'न्यू साइंटिस्ट' ने कुछ समय पहले अपने अंक में ऐसे अन्य हथियारों की चर्चा की थी। इसके मुताबिक पूंजीपति उद्यमियों का एक हिस्सा इन दिनों एक ऐसी माईक्रोवेव किरण गन तैयार करने में मुब्तिला है जो सीधे लोगों के सर में आवाज़ पहुंचा देगी। इस उत्पाद को अमेरिका सेना द्वारा 'युध्द के अलावा अन्य कामों में' भीड़ नियंत्रण हेतु इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें माईक्रोवेव आडिओ इफेक्ट का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें छोटे माईक्रोवेव लहरें/पल्सेस तेजी से टिशू को गरम करते हैं और सिर में एक शॉकवेव पैदा करते हैं। साफ है कि इस माईक्रोवेव गन से किरण फेंकी जाएगी तो पता चला भाषण देते-देते मजदूर नेता वहीं बेहोश होकर गिर गया और उसके इर्दगिर्द खड़े तमाम मजदूर इसी तरह धाराशायी हुए।

? सुभाष गाताड़े