संस्करण: 13 मई -2013

कदम कदम पर ठगी और

लूट का आलम!

? डॉ. सुनील शर्मा

                म.प्र. के एक ग्रामीण इलाके में स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने मुझे बतलाया कि उनके गॉव में एक कम्पनी के कर्मचारी उन्हें समूह बनाकर लोन दिलाने का वायदा कर रहें हैं। इसके लिए वो समूह की सदस्यता के नाम पर हरेक महिला से एक फार्म भरवाते है जिसके लिए प्रत्येक महिला से तीन सौ रूपया ल रहें है। इस कम्पनी के कर्मचारियों का कहना है कि वो उनके समूह से चायपत्ती पैंकिंग करवा कर उसे स्थानीय बाजार में विक्रय करवाएगें तथा कमाई का हिस्सा उनके समूह को बॉट दिया जाएगा। इस कार्य के लिए कम्पनी बैंक से आसान लोन की भी व्यवस्था करेंगी। गॉव की अनेक महिलाएॅ  तीन सौ रूपये देकर इस कंपनी की मेम्बर बन चुकी हैं और उन्हें अब बैंक के लोन और चायपत्ती के आने का इंतजार है। प्रश्नचिन्ह ये है कि जब चायपत्ती की अधिकांश बिक्री ब्रांड के सहारे होती है तब इन म.प्र. के ग्रामीण महिलाओं के समूह द्वारा पैक की गई चाय कौन खरीदेगा? तथा जो कम्पनी सदस्यता के नाम पर एक पन्ने के फार्म की कीमत तीन सौ रूपये क्यों वसूल रही है उसके इरादें क्या होगें? यहॉ कुछ न कुछ दाल में काला जरूर है और ठगी की पूरी संभावना है। बातों में बातों में मालूम हुआ की पिछले साल समीप के गॉव में ही अगरबत्ती और मोमवत्ती बनाने के नाम पर लोन दिलाने के लिए समूह बनाकर महिलाओं से ठगी की वारदात हो चुकी है। वास्तव में ग्रामीण इलाकों में स्वसहायता समूह के नाम पर ठगी का काफी  व्यापक हो चुकी है।ठग कहीं एनजीओ के नाम पर तो कहीं कंपनी के नाम पर आते हैं और समूह के जरिए आसान लोन और घर बैठे व्यापार के जरिए कमाई करने का झॉसा देते है। पहले तो सदस्यता शुल्क के नाम पर वसूली करते हैं फिर बैंक लोन के नाम पर मार्जिन मनी जमा करवा कर रफूचक्कर हो जाते है।अनेक ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के साथ हो रही लूट में बैंक कर्मचारी भी सहयोग करते हैं वो एजेण्टों की मिलीभगत से समूह के नाम पर लोन का आपस में ही बॅटवारा कर लेते हैं। इसकी जानकारी बेंचारी महिलाओं को बैंक के वसूली नोटिस के बाद होती है।

               म.प्र. के ग्रामीण इलाकों में चेन के जरिए व्यापार का भी काफी जोर है।ग्रामीणों ने बतलाया कि उन्हें इसकी जानकारी अपने रिश्तेदारों या पहचान के लोगों से मिलती है और कहा जाता है कि एक बार मेम्बर बनने के बाद रूपया ही रूपया! ग्रामीण बतलाते हैंकि इस प्रकार के व्यापार में भी गॉव के अधिकांश लोग अपना रूपया गवां बैठें है लेकिन कोई न कोई नई कम्पनी हमेशा आती रहती है जिसके एजेण्ट कम्पनी का मेम्बर बनने अनेक प्रलोभन देते है। कहते हैं कि एक बार कम्पनी का मेम्बर बनने से कमीशन सदस्य को तो मिलेगा साथ ही साथ उसके उत्तराधिकारी को भी कमीशन मिलता रहेगा और करना कुछ नहीं हैं सिर्फ अपने से नीचे दो लोगों को जोड़ना है। निश्चित रूप से वो दो लोग या तो रिश्तेदार हते हैं या फिर परिचित देश के कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में बैंकिग सुविधाओं का अभाव है तथा आम आदमी को बैंकिग प्रक्रिया काफी जटिल लगती है। बैंक कर्मचारियों के रूखे और भ्रष्ट व्यवहार के चलते भी आम आदमी इनसे दूर रहना चाहता हैं। इसका फायदा फर्जी और ठग उठाते हैं।  जैसे कि अगर बैंक में रूपया जमा करना है तो जर्माकर्ता का पहले तो बचत खाता खोलने के लिए मशक्कत करना पड़ती है फिर रकम जमा या निकासी के लिए घण्टों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। ऐसे में फर्जीवाड़ा करने वाले कहते हैं कि आप हमारी कम्पनी में रूपया कीजिए आपको बिल्कुल परेशान नहीं होना पड़ेगा हमारा एजेण्ट आपके घर आएगा आपसे रूपया लेकर आपकी डायरी में पावती दे देगा।ऐसा ही रूपया निकालने भी चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। अपनी कम्पनी के सरकारी मान्य होने का सबूत सोसायटी रजिस्ट्रेशन का प्रमाणपत्र दिखाकर देतें है? ग्रामीण इलाकों में ठगी के लिए शेयर बाजार का सब्जबाग भी दिखाया जाने लगा हैं और जमा रूपया छह माह मे दुगुना करने की बात की जाती है। कम्पनी के एजेण्ट कहते हैं कि आप हमारी कम्पनी में रूपया कीजिए जिसे कम्पनी शेयर बाजार में लगाएगी और चौगूना करेगी मगर निवेशक को दोगूना ही देगी? विश्वास जमाने कम्पनी के एजेण्ट निवेशक को वाकायदा स्टाम्प पेपर पर लिखकर देते है और दुगनी राशि का चैक भी दे देते है संभवत: एकाध वार तो निवेशक को दुगनी राशि मिलती है लेकिन वो लालच में पड़कर इस राशि को भी पुन: एजेण्ट को सौंप देता हैं फिर कम्पनी ही गायब हो जाती हैं, और आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई को खो देता है। 

               आज ग्रामीण इलाकों में समृद्वि बढ़ने से रूपये का प्रवाह बढ़ा है ऐसे में बैंकिग,शेयर बाजार और चेन मार्केटिंग के जरिए ठगी करने वालों ने भी कदम कदम पर डेरा जमा लिया है और वो जी भर कर आम आदमी को लूट रहें हैं। अगर आम आदमी को लूट से बचाना है तो सरकारी निगरानी तंत्र मजबूत करना जरूरी है साथ ही बैंकिंग  व्यवस्थाओं का प्रचार और सहज उपलब्धता जरूरी है। इसके साथ ही वित्त्तीय साक्षरता को आंदोलन की में परिवर्तन कर आम आदमी को जागरूक किया जा सकता है।लूट में शामिल  व्यक्तियों और संस्थाओं को कठोर दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए।

                
? डॉ. सुनील शर्मा