संस्करण: 13 मई -2013

हरियाली को निगलता रेगिस्तान

? शब्बीर कादरी

                 विश्व के अधिसंख्य देशों में पड़ने वाला सूखा और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव समूची धरती के लिए संकट पैदा कर रहे हैं। लगातार सूखा पड़ने से धरती का प्राकृतिक स्वरूप बंजर में बदल रहा है और जलवायु परिवर्तन से शहरी आबादी तबाही की चपेट में है। सच्चाई यह भी है कि इस अनचाहे पर्यावरणीय प्रभाव के चलते देश का एक चौथाई से भी अधिक भौगोलिक क्षेत्र मरूस्थल में बदलता जा रहा है। मरूस्थलीकरण पर रोक के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन में पेश पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का भौगोलिक क्षेत्र 32.8करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है जिसमें भू-क्षरण और सूखा जारी है। आंकड़ो के हिसाब से देश में मरूस्थलीकरण,भू-क्षरण और सूखा से 7,91,475वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित हुआ है जिसके दायरे में देश के सभी राय और केंद्रशासित प्रदेश आते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में भू-क्षरण पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

               विश्वस्तर पर इस संदर्भ का अध्ययन करने पर प्रतीत होता है कि प्रतिवर्ष धरती के बंजर होने की वजह से दुनिया के लगभग 25 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं तथा एक तिहाई धरातल को खतरा पैदा हो रहा है और केवल भूमि के सहारे अपनी आजीविका चलाने वाले 110 देश के लगभग एक अरब दो करोड़ लोग रोजी-रोटी से जूझ रहे हैं। इतना ही नहीं जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों की कुल जनसंख्या लगभग 13 करोड़ 50 लाख लोग धरती के बंजर हो जाने के कारण विस्थापित हो रहे हैं। समीक्षकों का मत है कि उप-सहारा अफ्रीका के रेगिस्तानी क्षेत्रों में लगभग छह करोड़ लोग वर्ष 2020 तक यूरोप की ओर पलायन कर जाऐंगे। चीन के 24 हजार से अधिक गांव 1400 किमी रेल्वे लाइनें 30 हजार किमी राजमार्ग तथा पचास हजार किमी लंबी नहरें ओर जलमार्ग को भी बंजर के प्रभाव से खतरा पैदा हो गया है। यह सारी जानकारी संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट से मिलती है जो बंजर भूमि के बढ़ते खतरों से आगाह करते हुए बताती है कि इस समस्या से संसार का हर क्षेत्र प्रभावित हो रहा है, पृथ्वी पर मौजूद प्रति व्यक्ति खेतीहर भूमि का आकार दिनोंदिन सिकुड़ता जा रहा है जिससे न सिर्फ खाद्यान्न सुरक्षा खतरे मे है बल्कि ग्रामीण क्षेत्र अधिक समस्यग्रस्त हो रहा है। भारत में भी प्रतिवर्ष सूखा तथा वनों के उजड़ने से 25 लाख हे.भूमि बंजर हो जाती है।

                हमारे यहां एक फसल से अधिकाधिक उपज लेने की होड़ में रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग, सघन कृषि प्रणाली और जैविक एवं कार्बनिक उर्वरकों के घटते उपयोग से देश के करीब-करीब हर प्रांत की मिटटी मे सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता में कमी होती जा रही है और यदि खेत की मिटटी में सूक्ष्म पोषक तत्वों को अलग से नहीं डाला गया तो फसलों का उत्पादन तो गिरेगा ही भूमि के बंजर होने का खतरा भी बढ़ जाएगा। देश के अलग-अलग क्षेत्रों की मिटटी में पैदा की गई अलग-अलग फसलों में विभिन्न उर्वरक तत्वों की मात्रा परिवर्तित पाई गई। यदि उर्वरक के साथ सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं दिया जाता तो उन तत्वों का दोहन मिट्टी से होता है। वैज्ञानिक परीक्षण में पाया गया है कि एक टन गेहूं के उत्पादन के लिए 624 ग्राम लोहा, 70 ग्राम मैंग्नीज, 56ग्राम जस्ता , 24 ग्राम तांबा, 48 ग्राम बोरान तथा 2 ग्राम मोलीबीडनम की आवश्यकता पड़ती है। विभिन्न फसलों के लिए इन तत्वों की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के अनेक अनुसंधान के दौरान विभिन्न रायों की मिट्टी के नमूनों में पता चला है कि उनमें पोषक तत्वों की कमी है तथा इनके क्षेत्रफल में निरन्तर वृध्दि हो रही है। यही क्षेत्रफल आगे चलकर बंजर भूमि के बढ़े हए आंकड़ों के रूप में सामने आता है।

              देश की कुल 32 करोड़ 90 लाख भूमि में से 22.83 करोड़ हेक्टेयर अर्थात 69.8 प्रतिशत शुष्क भूमि है जिसका आंकड़ा धीरे-धीरे ऊँचाई पकड़ रहा है। आश्चर्यजनक यह भी है कि मध्यप्रदेश में भूमि के नष्ट होने या बंजर और बीहड़ होने की रफ्तार अन्य प्रांत की अपेक्षा अधिक है। यहां पिछले दो दशक में बीहड़ और बंजर के आंकड़े दो गुना आकार प्राप्त कर 13 हजार हे. से बहुत आगे बढ़ गए हैं। एक नई रोपोर्ट के अनुसार भूमि इस्तेमाल योजना, कचरा और भूमि क्षरण प्रबंधन तथा जल संसाधन के उचित इस्तेमाल को लेकर अभी भी कई चुनौतियां हैं। समस्या से निपटने के लिए भारत ने वॉटरशेड मिशन, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, ग्रीन इंडिया मिशन सहित कई कदम उठाए हैं।

               याद रहे जैसे ही भूमि रेतीली होना शुरू होती है कई बदलाव स्वत: ही उत्पन्न हो जाते हैं, पौधों का विकास रूक जाता है, पानी का वाष्पीकरण बढ़ जाता है, मिट्टी कटने लगती है, धरती में नमक की मात्रा बढ़ जाती है और भूमि पत्थर जैसी कड़ी होने लगती है और आमतौर पर बंजर भूमि दोबारा हरी नहीं होती जाहिर है हमारी हरियाली को तेजी से रेगिस्तान लील रहा है।

? शब्बीर कादरी