संस्करण: 13 मई -2013

इस साल भी सड़ेगा करोड़ों टन अनाज

? सुनील अमर

                 गेंहॅूं खरीद के लिए सरकार समर्थित न्यूनतम मूल्य पर बोनस न दिये जाने की वजह से यद्यपि गत वर्षों के मुकाबले खरीद की रतार काफी धीमी बनी हुई है लेकिन वे सारे कारण आज भी ज्यों के त्यों मौजूद हैं जिनसे प्रति वर्ष करोड़ों टन खाने योग्य अनाज बरसात में भीगने, चूहों द्वारा खा लेने तथा कीड़ों-मकोड़ों से नष्ट हो जाता है। सरकार की भंडारण प्रणाली व क्षमता में आज भी कोई खास सुधार नहीं आया है। सरकारी गोदामों के अलावा निजी व्यक्तियों/संस्थाओं द्वारा गोदाम बनाने तथा संरक्षण व प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना का कार्य गति नहीं पकड़  सका है। गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस सम्बन्ध में सख्त निर्देश दिये जाने के बावजूद स्थिति ज्यों की त्यों है। सरकार द्वारा गेंहॅू खरीद पर बोनस देर सबेर घोषित किया ही जाएगा और उसके बाद सरकारी खरीद में तेजी आ जाएगी। अनुमान लगाया जा सकता है कि पहले से ही भरे सरकारी गोदामों में अनाज कहॉ से रखा जाएगा। इस प्रकार यह ताजा खरीद खुले में रखकर मौसम के हवाले कर दी जाएगी। एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष 55,000 करोड़ रुपये से अधिक का अनाज और सब्जी सड़कर नष्ट हो जाती है।

                 देश में सरकारी गोदामों की संख्या हमारी भंडारण जरुरत के हिसाब से बहुत कम है। हमारी राष्ट्रीय खरीद एजेंसियों में भारतीय खाद्य निगम तथा केंद्रीय भंडारण निगम हैं। इनकी कुल भंडारण क्षमता लगभग 48 मिलियन टन है। इसमें से केंद्रीय भंडारण निगम की भंडारण क्षमता काफी कम यानी सिर्फ 10.72 मिलियन टन ही है। बाकी में से भी लगभग 22 मिलियन टन निजी क्षेत्र के गोदामों की क्षमता है जिसे सरकार ने किराए पर लिया हुआ है। शेष भारतीय खाद्य निगम की अपनी भंडारण क्षमता है जिसमें गोदाम तथा खुले में चबूतरों पर रखकर प्लास्टिक के तिरपालों से ढ़ॅका जाना भी शामिल है। यह कितने हैरत की बात है कि सत्तर के दशक तक खद्यान्नों का घोर अभाव झेलने वाले इस देश ने दो दशक में न सिर्फ आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली बल्कि हम खाद्यान्न निर्यातक देश भी बन गये। बावजूद इसके हम अपने घर में अनाज रखने की व्यवस्था आज तक नहीं कर सके! यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसानों के पसीने से पैदा होने वाले तथा देश के गरीब करदाताओें के पैसे से खरीदे जाने वाले बेशकीमती खाद्यान्न को हमारी सरकारें यूँ ही खुले में सड़ने के लिए छोड़ देती हैं। एक तो धान-गेंहॅू खरीद का सरकारी खेल ही निराला है। इसका अंतिम और अनिवार्य लाभ उसे पैदा करने वाले किसान को न मिलकर आपूर्ति के काम में लगे दलालों को मिल जाता है। मसलन, गेंहॅू की कटाई का तीन चौथाई सत्र समाप्त हो चुका है। इससे यह माना जाना चाहिए कि बिक्री योग्य तीन चौथाई गेंहूँ बिक चुका है लेकिन सरकार के अधिकांश क्रय केंद्र ऐसे हैं जिनकी बोहनी भी अभी तक नहीं हुई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार ने जो समर्थन मूल्य घोषित किया है, उसी के आसपास का मूल्य निजी खरीदार भी दे रहे हैं। सरकारी क्रय केंद्रों पर बेचना और पैसा पा जाना बहुत कठिन काम होता है इसके बजाय निजी खरीदार लगभग तुरन्त ही भुगतान कर देते हैं। अभी इंतजार है सरकार गेहॅू के समर्थन मूल्य पर बोनस घोषित किये जाने का। सरकार प्राय: प्रति कुंतल की खरीद पर रु. 50 का बोनस देती है। यही असली खेल है। बोनस घोषित हो जाने पर निजी आढ़तिये और दलाल किसानों से सस्ते में खरीद कर रखे गये गेंहूॅ को किसानों के ही नाम पर फर्जी ढ़ॅग से सरकारी क्रय केंद्रों को बेचकर मुनाफा कमा लेंगें और किसान ताकता ही रह जाएगा!

                कृषि से सम्बन्धित कुछ काम ऐसे हैं जिसे निजी क्षेत्र की भागीदारी के बगैर किया जाना मुश्किल है। भंडारण, संरक्षण और प्रसंस्करण आदि ऐसे ही काम हैं। यह देश इतना विशाल और विविध मौसम वाला है कि यहॉ किसी एक फॉर्मूले से काम नहीं चल सकता। हमारे देश में दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक राशन वितरण प्रणाली है तथा यह अभी और विकराल होने वाली है क्योंकि इसमें सबको खाद्यान्न उपलब्धा कराने की योजना भी शामिल होनी है। हमारी सरकारी भंडारण एजेंसियों द्वारा खरीदे और भंडारित किये गये अनाज पर प्रति किलो रु. छह से अधिक का खर्च आता है और तब भी वह भंडारित अन्न सही सलामत नहीं रह पाता। एक सच्चाई देखिये कि देश की सबसे बड़ी खरीद और भंडारण एजेंसी भारतीय खाद्य निगम के लगभग 80 प्रतिशत गोदाम सिर्फ पंजाब और हरियाणा में हैं, बाकी 20 प्रतिशत पूरे देश में। इससे माल ढुलाई और पुन: उसके विपणन पर अनावश्यक और काफी खर्च आता है। इस पर भी सितम यह है कि सरकार इसे सस्ते या फिर लगभग मुत ही राशनकार्ड धारकों को बॉटती भी है। भंडारण की इस व्यवस्था को एकीकृत करने के बजाय समूचे देश में गोदाम बनवाकर किया जाना चाहिए, भले ही वह गोदाम निजी क्षेत्र बनाये। संसद की स्थायी समिति ने गत वर्ष एक सुझाव दिया था कि हर महीने राशन का अनाज देने के बजाय छह माह का राशन अगर एक बार में दिया जाय तो रख रखाव का खर्च आधा हो जाएगा और सरकार चाहे तो राशन को और भी सस्ता करके गरीब कार्डधारकों को दे सकती है लेकिन यह सुझाव अभी तक अमल में नहीं आ पाया है। ऐसा हो जाने से हमारे गोदाम भी जल्दी खाली हो जाते और खुले में रखा अनाज छॉव में आ जाता। धयान रहे कि अभी प्रति वर्ष दो करोड़ दस लाख टन से अधिक गेंहॅू भंडारण के अभाव में बरबाद हो जाता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश में तो इतना गेंहॅू पैदा ही नही होता!

                एक सुझाव यह भी है कि सरकार विकास खंड स्तर पर ही सरकारी खाद्यान्न का भंडारण करने की व्यवस्था करे। यह काम निजी क्षेत्र से गोदाम बनवा कर भी किया जा सकता है क्योंकि ऐसा सरकार की नीति में शामिल है। इस प्रकार भंडारित अनाज को ही स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माधयम से वितरित किया जाय। देश में कुल छह लाख गॉव हैं जिनमें से चार लाख गॉवों में खेती की जाती है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर शीत गृहों के निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से न सिर्फ किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेगा बल्कि गोदामों का भार भी कम होगा और क्षेत्रीय रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगें। खाद्य प्रसंस्करण का क्षेत्र महिलाओं को बहुतायत से रोजगार के अवसर देता है और इसमें खाली या अतिरिक्त समय में भी काम किया जा सकता है। यह काम प्रसंस्करण स्थल पर जाकर या घर बैठकर भी किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि देश में खाद्य प्रसंस्करण कार्य न के बराबर है जबकि विकसित देशों के किसान अपनी आमदनी का काफी बड़ा हिस्सा प्रसंस्करण से ही पाते हैं। भारतीय स्टेट बैंक की मार्फत सरकार मात्र 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से स्थानीय स्तर पर शीतगृह व गोदामों के निर्माण हेतु ऋण दे रही है। ऐसे गोदामों पर आगामी दस साल तक भंडारण किये जाने की सरकारी गारंटी भी है। बावजूद इसके इस काम में लालफीताशाही की वजह से कोई प्रगति नहीं है जबकि भारतीय खाद्य निगम के पास ऐसे गोदाम बनवाने के लिए आवेदन पत्रों का ढ़ेर लगा हुआ है। एक और योजना ऐसे गोदामों में भंडारित अनाज की रसीद की गारंटी पर बैंक से किसानों को अल्पकालिक ऋण दिलाने की भी प्रस्तावित है लेकिन वो भी ठंढ़े बस्ते में ही पड़ी हुई है। 

? सुनील अमर