संस्करण: 13 मई -2013

केवल महिला-हिंसा की

चिन्ता क्यों ?

? डॉ. गीता गुप्त

               पिछले कुछ महीनों में ऐसी कई घटनाएं घटी हैं जिन्होंने यह सोचने पर बाध्य कर दिया है कि आख़िर स्त्री-पुरुष समानता के युग में एकपक्षीय (महिला) कानून बनाने का औचित्य क्या है? बेशक, महिला-हिंसा में लगातार वृध्दि चिन्ताजनक है। पर सरकार ने स्त्री के पक्ष में इतने कानून बना दिए कि उसकी सुरक्षा अब सुनिश्चित हो जानी चाहिए थी। लेकिन अफ़सोस। एकपक्षीय कानूनों से भी स्त्री का भला नहीं हो पा रहा है। 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के दामिनी काण्ड के बाद स्त्रियों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता और चिन्ता में बढ़ोत्तरी राहत की बात है। मगर स्त्री के प्रति हिंसा के कई पहलू हैं जिनपर गौर किया जाना चाहिए और एक सभ्य समाज के निर्माण की आवश्यकता को स्वीकारना चाहिए।

               ध्यान रहे कि भारतीय संस्कृति में परिवार का बहुत महत्व है। यह अकेले स्त्री या अकेले पुरुष से नहीं वरन् दोनों के समन्वय और सहयोग से बनता है। इसमें सामाजिक रीति-रिवाज, मान्यताएं, परम्पराएं, आचार-विचार, शिक्षा, संस्कार, धार्मिक विश्वास जैसे कई तत्व सहायक होते हैं। एक इकाई के रूप में परिवार उन सभी तत्वों का अनुशीलन करता है जो समाज की स्थिरता, पहचान और सभ्यता के लिए अनिवार्य होते हैं। स्त्री पुरुष इसमें दम्पत्ती के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संबंधों का ताना-बाना यहां इतना मजबूत होता है कि उसमें जन्म-जन्मान्तरों तक जुड़ी आस्था पायी जाती है। यहां रिश्ते-नाते कागज़ पर हस्ताक्षर करके जोड़े या तोड़े नहीं जाते बल्कि धार्मिक अनुष्ठान करके ईश्वर, परिजन, पुरजन एवं इष्ट-मित्र के साक्ष्य में समारोह पूर्वक एक परिवार की नींव रखी जाती है। स्त्री-पुरुष शपथ लेकर, सहयात्री बनकर अपने समाज ही नहीं वरन परोक्ष्ज्ञ रूप में अपने नगर, राज्य और देश के प्रति भी उत्तरदायित्वों को सवीकारते हुए अपनी जीवन यात्रा प्रारंभ करते हैं।

               ज़ाहिर है कि दम्पत्ति के सुख दु:ख, आशाएं-आकांक्षाएं, लक्ष्य और चिन्ताएं सब कुछ साझा होने चाहिए। यदि ऐसा होता तो दाम्पत्य में दरार नहीं आती, लड़ाई झगड़े, हिंसा, अलगाव जैसी समस्याएं पैदा नहीं होती। मगर विडम्बना यह है कि गार्हस्थय जीवन में कलह बढ़ता जा रहा है। इसके कई कारण है, स्त्री हिंसा की जड़ इनमें छिपी हो सकती है। स्त्री के संदर्भ में लिंग भेद, जागरूकता का अभाव, अशिक्षा जैसे प्रमुख कारण हैं तो पुरुष के संदर्भ में-पालन-पोषण का अन्तर, पितृसत्तात्मक परम्परा का अहंकार, सामाजिक रूढ़ि जैसे कारण हैं। जिनका निदान कानून से नहीं अपितु सामाजिक बदलाव, शिक्षा, संस्कार और जागरूकता के प्रसार से ही संभव है। मगर दुर्भाग्यवश हमारे पारिवारिक मनमुटाव, कलह और अशांति का समाधान अब हमारी न्यायपालिका और सरकारें तलाश रहीं है। इसके लिए कानून बना दिए गए और कुछ कठोर कानून बनाये जा रहे हैं। स्त्री और पुरुष फरियादी और दुश्मन की तरह न्यायालय में आमने-सामने खड़े होने लगे हैं।

                चूंकि संयुक्त परिवार नहीं रहे तो बड़े बुजुर्गों के सामने सुलह-सफाई की गुंजाइश नहीं रही। दूसरी बात, कानून सिर्फ स्त्रियों के हालात को ध्यान में रखकर बनाये गए इसलिए हर हाल में पुरुष को दोषी माना जाने लगा। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या स्त्री की निर्दोषता स्वयंसिध्द है? आज बढ़ चढ़कर महिला अधिकारों और महिला कानून की बात की जाती है, पर उनके कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता, क्योंकि? जबकि अधिकार और कर्तव्य के बीच अन्योन्याश्रित संबंध है। बिना कर्तव्य के अधिकार हो ही नहीं सकते और अधिकार निरंकुश भी नहीं होने चाहिए।

              कैसी विडम्बना है! बात तो स्त्री पुरुष समानता की की जाती है, पर न्याय और कानून की व्यवस्था करते समय एकपक्षीय हित का ध्यान रखा जाता है। जबकि हिंसक पुरुष ही नहीं होता, स्त्री भी होती है। न्याय और दण्ड दोनों को मिलना चाहिए, कानून भी दोनों की सुरक्षा के लिए होने चाहिए। मगर इस देश में पुरुष अपराधी मानकर एकतरफा कानून एवं न्याय की व्यवस्था की गई और अब भी की जा रही है। जबकि पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने भी माना था कि महिला कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय भी मानते हैं कि पढ़ी-लिखी स्त्रियां ही नहीं बल्कि उनके परिवार वाले भी महिला कानूनों का उपयोग हथियार की तरह कर रहे हैं। यह बहुत चिंताजनक है।

              कुछ ताज़ा घटनाओं पर गौर करें। इन्दौर की 33 वर्षीया विवाहिता चंचल ने अपने मकान मालिक रूपकिशोर पर ज्यादती का आरोप लगाया। उसने 26 दिसम्बर 12 को पुलिस में रपट लिखवायी। 53 वर्षीय फाइनेन्सर रूपकिशोर ने चंचल के पति सुनील को टाटा मैजिक के लिए फाइनेन्स किया था और दोनों में लेन-देन को लेकर विवाद था। पर चंचल की झूठी रपट ने उन्हें जेल भिजवा दिया। वे चिल्लाते रहे-मैंने ऐसा कुछ नहीं किया, वो मेरी बेटी जैसी है।' पर पुलिस ने एक न सुनी। ढाई माह जेल में रहने के बाद वे 8 मार्च 2013 को जमानत पर छूटे। 13 मार्च को कोर्ट में सुनवाई के दौरान चंचल ने स्वीकार कि 'हमारे बीच पैसों का विवाद है, इसी कारण झगड़ा हुआ, कोई ज्यादती नहीं की गई।' चंचल के झूठ पर न्यायाधीश ने उसे लताड़ा। सच्चाई उजागर हुई पर रूपकिशोर का दु:ख कम नहीं हुआ। समाज में बदनामी और बेटी के ब्याह की चिन्ता ने रूपकिशोर का जीवन छीप लिया। उन्होंने फांसी लगा ली।

                मधयप्रदेश में ही सागर के रतनारी गांव की एक महिला ने दुष्कर्म की रपट लिखवायी। पुलिस ने मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान प्रस्तुत किया। इसके बाद महिला ने आरोपियों से समझौता कर लिया। सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद न्यायालय ने प्रकरण को झूठा पाया। गैंगरेप की झूठी कहानी गढ़ने तथा कोर्ट में मिथ्या साक्ष्य देने पर फरियादी महिला के खिलाफ धारा 344 की कार्रवाई करने का आदेश न्यायालय ने दिया है।

              समाज में ऐसी घटनाएं भी कम नहीं घट रहीं, जिनसे स्त्री द्वारा पुरुष के प्रति हिंसा सिध्द होती है अथवा स्वार्थपूर्ति हेतु स्त्री का अमानवीय रूप उजागर होता है। फरवरी 2013 की घटना से। जब नागदा की गुलाबीबाई ने अपने पति अनिलदास को आधी रात में घासलेट डालकर जला दिया। केमिकल उद्योग में सुरक्षा गार्ड 52 वर्षीय अनिलदास की पत्नी गुलाबीबाई मकान अपने नाम पर करवाना चाहती थी।  दोनों में इस बात पर विवाद था इसलिए कुछ समय से दोनों अलग-अलग रह रहे थे। दो माह पूर्व सुलह होने पर वे साथ रहने लगे थे। फिर अनिलदास को जान गंवानी पड़ी। एक घटना इंदौर की है। गैस सिलेण्डर खत्म होने पर पति ने भूखी सो जाने के लिए कहा तो पत्नी ने पिस्तौल चलाकर उसे गोली मार दी। उड़ीसा के भुवनेश्वर में तो 35 वर्षीय पति स्वयं पत्नी के झगड़े से तंग आकर चिड़ियाघर में शेर के पिंजरे में कूद गया ताकि जानवरों का आहार बनकर जीवन समाप्त हो जाए।

               पिछले महीने राजस्थान के महेसाणा में एक नवविवाहिता ने प्रेमविवाह के दो माह बाद ही पति को थाने पहुंचा दिया। पति बर्तन खरीदने उसके साथ नहीं गया इसलिए वह पुलिस में रपट लिखवाने जा पहुंची। पुलिस के समझाने पर उसने प्रस्ताव रखा कि पति यदि 100 उठक बैठक लगाये तो वह माफ कर देगी। सो पति, ने थाने में कान पकड़कर उठक बैठक लगायी। उड़ीसा के जाजपुर की बीस वर्षीया राखी पात्रा ने पांच हजार में अपना बच्चा बेच दिया और उन पैसों से मोबाइल फोन, जींस, टॉप और मेमोरी कार्ड खरीदा। उसकी संवेदनहीनता देखिए, जब पुलिस ने बच्चा बरामद कर उसे लौटाना चाहा तो उसने उसे लेने से इंकार कर दिया। अत: बच्चा बाल कल्याण समिति को सौंप दिया गया।

              उपर्युक्त विवेचन का आशय यही है कि एक पक्षीय कानून से बात नहीं बनेगी। परिवार में संतुलन हेतु स्त्री पुरुष दोनं को संयम, धौर्य और समझदारी से काम लेना होगा। कानून अंतिम विकल्प हो सकता है मगर एकपक्षीय कानून परिवार और समाज के हितकर नहीं है। जरा सोचिए, लिव इन रिलेशनशिप में धोखा होने पर स्त्री तो पुरुष को दुष्कर्म के आरोप में जेल भिजवा सकती है लेकिन पुरुष स्त्री की वादाखिलाफी पर कुछ नहीं कर सकता। क्यों ? क्या स्त्री पुरुष से प्रेम और विवाह का वादा करके पलट नहीं सकती या पलटती नहीं? फिर समानता के दौर में इस तरह का कानून कैसे जायज है? जबकि यह स्पष्ट है कि पुरुष भी स्त्री द्वारा प्रताड़ित किए जाते हैं। सरकार सिर्फ महिला-हिंसा पर विराम चाहती है। उसने दिल्ली में पहला महिला डाकघर खोल दिया। पश्चिम बंगाल के मालदा टाउन में महिलाओं के महिला कर्मचारियों वाला न्यायालय भी अस्तित्व में आ गया। अन्य क्षेत्रों में भी पृथक महिला संस्थान खोल दिए जाएंगे। क्या समस्या का यह सही समाधान है? और समस्या सिर्फ स्त्री हिंसा की है ? बिल्कुल नहीं।

                निश्चय ही, यह चिन्ता की घड़ी है। सरकार और हमारी न्यायपालिका भी परिवार के अस्तित्व पर मंडराते संकट को नहीं देख/समझ पा रही है, अथवा जान-बूझकर अनदेखी कर रही है। परिवार का अस्तित्व कायम रखने के लिए स्त्री पुरुष में सहयोग, समन्वय, सद्भाव और व्यावहारिक संतुलन आवश्यक है। मौजूदा एक पक्षीय (महिला) कानून उन्हें परस्पर जोड़ेगा नहीं, तोड़ेगा। स्त्री और पुरुष अलग अलग इकाई के रूप में परिवार नहीं बन सकते, मानवीय गुणों से संपन्न समाज की संरचना नहीं कर सकते। इसके लिए उन्हें एक दूसरे के प्रति सदाशयी, समादृत और समर्पित होना होगा। तभी उस घर परिवार का अस्तित्व सुरक्षित रह सकेगा जो भारतीय संस्कृति की आधारशीला है। स्त्री-पुरुष समानता के इस दौर में एकपक्षीय कानून की विडम्बना पर विचार करने का यह बिल्कुल सही समय है।

? डॉ. गीता गुप्त