संस्करण: 13 मई -2013

देश को स्वीकार्य नहीं मोदी

भाजपा को उत्तर से दक्षिण तक जनता से छल-कपट की सजा ?

? विवेकानंद

               जो अनजाने में गलती कर रहे हों उन्हें रास्ता दिखाना आसान है, लेकिन जो जानबूझकर, आदतन गलती करता हो,धोखा करता हो उनका तो बस भगवान ही मालिक है। भाजपा आज अपनी इसी आदत का परिणाम भोग रही है। सत्ता पाने की लालच में झूठ,फरेब और जनता से धोखे का नतीजा यह हुआ कि पिछले पांच माह में भाजपा के हाथ से तीन प्रदेशों उत्तराखंड,हिमाचल और अंत में कर्नाटक की सरकार निकल गई हैं। बावजूद इसके भाजपा नेता न तो झूठ बोलने से बाज आ रहे हैं और न ही जनता के साथ धोखा करने से।

               दरअसल भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि चाहे भ्रष्टाचार हो या देश की सरहद, वह हर मामले में दोहरा रवैया रखती है। जनभावनाओं से खुद को जोड़ने और खुद को जनता का परम हितैषी साबित करने में यह भूल जाती है कि भावुक जनता,भावनाओं के इतर जो सत्य है उसे भी समझती है और जमीनी सच्चाईयों का बेहतर विश्लेषण करने की क्षमता भी रखती है।

               पिछले दो सालों में भाजपा ने मीडिया के कंधों पर चढ़कर जिस तरह कांग्रेस के खिलाफ कुप्रचार किया है उसका जवाब जनता ने भाजपा को दिया। और साथ ही हिमाचल के बाद कर्नाटक में भी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नकारकर जनता ने साबित कर दिया कि मोदी की गुजरात के बाहर कोई हैसियत नहीं है। गुजरात में भी हैसियत है या दहशत इस पर तो उनकी पार्टी के ही नेता ही कन्फ्यूड रहते हैं। कर्नाटक में मोदी के खारिज होने का एक और बड़ा कारण यह है कि उनके झूठ खुलकर जनता के सामने आ गए हैं। गुजरात चुनाव के वक्त नरेंद्र मोदी ने सरक्रीक का झूठ बोला था, यह लोगों को अब तक समझ में आ चुका है। मोदी ने कहा था कि भारत सरकार सरक्रीक पाकिस्तान को सौंपने जा रहा है। यह देश की अस्मिता का सवाल था, लोग उबल पड़े थे, लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि मोदी झूठ बोल रहे थे। क्योंकि तब भारत आए पाकिस्तानी गृह मंत्री रहमान मलिक से इस मुद्दे पर कोई बात नहीं हुई और न ही किसी अन्य स्तर पर। इसके बाद हाल ही में भाजपा ने इसी तरह लाहौर की कोट लखपत जेल में मारे गए सरबजीत सिंह के मामले में भी बेतहासा झूठ फैलाने का प्रयास किया। सरबजीत को लेकर भाजपा ने आरोप लगाए कि सरकार ने एक बार भी सरबजीत को बचाने का प्रयास नहीं किया। ऐसे संवेदनशील मामले पर जहां पाकिस्तान के खिलाफ एकजुट होना चाहिए था, भाजपा अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगी रही। जबकि असल बात यह है कि भारत ने करीब 12 मौकों पर पाकिस्तान के सामने सरबजीत को बेगुनाह साबित करने और उसकी रिहाई के प्रयास किए। इसके दस्तावेज भी मौजूद हैं। भारत ने विदेश सचिवों की बैठक में चार बार यह मसला उठाया। पाकिस्तान के गृह मंत्रियों और गृह सचिवों ने दो-दो बार इस मुद्दे का सामना किया। इतना ही नहीं न्यूयार्क में भी जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में तत्कालीन पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ बातचीत हुई थी तब भी उन्होंने सरबजीत की रिहाई का मामला उठाया था और मुशर्रफ ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तान इस मामले को मानवीय आधार पर निपटाएगा। उनके इस आश्वासन के बाद तत्कालीन विदेश मंत्री के नटवर सिंह ने पहले पाक उच्चायुक्त के साथ और फिर मुशर्रफ के साथ बातचीत में इस मसले को उठाया था। और ऐसा नहीं कि सरकार ने बात करके मुद्दा भुला दिया हो, वाकायता इस बात को आगे बढ़ाया गया और विदेश मंत्रालय ने 2006 में पाक विदेश मंत्रालय को इस बारे में लिखा था। सरबजीत को लेकर इसके बाद पांच और बैठकें हुईं। आखिरी मीटिंग 6 सितंबर 2012 को हुई। उसके परिवार को भी पाकिस्तान जाकर उससे मिलने की दो बार इजाजत दी गई। बावजूद इसके जब सरबजीत की हत्या हुई तो जनता को गुमराह करने के लिए भाजपा के तमाम दिग्गज मैदान में झूठ का हथियार लेकर कूद पड़े। और यह झूठ इसलिए बोला गया था कि कहीं कोई यह सवाल न पूछ ले कि जब एनडीए की सरकार थी तब उसने सरबजीत के लिए क्या किया। वस्तुत: एनडीए सरकार के वक्त ही वह मौका था जब सरबजीत को पाकिस्तान में कानूनी मदद की जरूरत थी। लेकिन एनडीए सरकार ने बस यात्राएं कीं, आगरा की मुलाकातें भी कीं, पर सरबजीत का मामला एक बार भी नहीं उठाया। वर्ष 1999 से 2004 तक भाजपा की सरकार रही लेकिन एक बार, भी उन्होंने सरबजीत तक राजनयिकों की पहुंच की कोई कोशिश नहीं की। चीन को लेकर भी भाजपा का रुख झूठ बोलकर जनता को आंदोलित करने वाला था। सरकार को लेकर तरह-तरह की बयानबाजियां की गईं। भारत सरकार को दुनिया की नजरों में कमजोर साबित करने की भरपूर कोशिश की गई। मोदी यह भूल गए जब जून 2003 में अरुणाचल प्रदेश में चीन के बॉर्डर पैट्रोल ने भारतीय बॉडर पैट्रोलकर्मियों को पीटा था। उस वक्त माननीय अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और भाजपा के लोहपुरुष आडवाणी जी गृहमंत्री हुआ करते थे। और दूसरी शर्मनाक बात यह कि उस समय वाजपेयी जी चीन यात्रा पर बीजिंग गए हुए थे। यह थी कमजोर सरकार होने की निशानी। जो व्यक्ति इतने सारे झूठ अपने देश की सरकार को नीचा दिखाने के लिए बोल सकता है, वह देश को स्वीकार्य कैसे हो सकता है? और खाली झूठ हो तो चल भी जाए, भाजपा जनहित के नाम पर अपने स्वार्थ के लिए जनता से धोखा करने से भी बाज नहीं आती। आठ मई को समय पूर्व स्थगित हुए संसद के बजट सत्र की पूरी दूसरी पाली भाजपा के हंगामे की भेंट चढ़ गई। न तो किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो सकी और न ही कोई बिल पास हो सका। भाजपा इस कदर हंगामे पर उतारू थी कि स्पीकर को कहना पड़ा सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं है। जबकि इस सत्र में आम आदमी और आर्थिक सुधार से जुड़े महत्वपूण्र बिल पास होने थे, जिसकी देश को अहम जरूरत है। लेकिन पूरे सत्र में भाजपा अपनी बेतुकी जिद पर अड़कर हंगामा करती रही कभी वॉकआउट करती रही और हंगामे के लिए तोहमत सरकार पर जड़ती रही।

                यह ठीक है कि कोल ब्लॉक आवंटन पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट कानून मंत्री और पीएमओ के अफसरों का देखा जाना ठीक नहीं है, इसका विरोध करने में कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन संसद को सिर्फ इसलिए बंधक नहीं बनाया जा सकता। संसद में बनने वाले नियम कानून भविष्य के लिए होते हैं और भविष्य में किसकी सरकार होगी यह कोई नहीं जानता, लिहाजा यह नहीं माना जा सकता कि वर्तमान में जो नीति या नियम लागू किए जा रहे हैं, मौजूदा सरकार ही भविष्य में इनका दोहन करेगी। दूसरी बात जिस तरह विपक्ष, खासतौर से भाजपा प्रधानमंत्री और कानून मंत्री और प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर अड़ी है, इससे जाहिर है कि वह खुद को सत्यवादी हरिश्चंद्र होने का प्रमाण देना चाहती है। शायद इसलिए क्योंकि भाजपा शासित रायों और भाजपा की शीर्ष इकाई में भ्रष्टाचार के विषाणुओं को किस तरह संरक्षित किया जाता है इसकी बानगी पिछले दिनों बखूबी देखी गई है। इसके अलावा भी भाजपा जिन मुद्दों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा लेने की जिद पर संसद नहीं चलने दे रही है, उनमें भाजपा शासित कालखंड का भी जिक्र है। दूसरी बात इसी सत्र में कैग ने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम में हुए घपलों की रिपोर्ट भी सौंपी है। इस योजना में गड़बड़ी करने वालों में भाजपा शासित रायों के शामिल होने के कारण भाजपा का मौन, कम से कम इस बात की तो स्वत: पुष्टि करता है कि भाजपा को अपने भ्रष्टाचार पर आपत्ति नहीं है। दूसरी बात ऐसा प्रतीत होता है कि संसद में विरोध का एक सोचा समझा षडयंत्र किया गया है, जो न केवल संसदीय मर्यादाओं को तार-तार करता है बल्कि जनता के हित में होने वाले फैसलों के भी प्रतिकूल है। दरअसल इस सत्र में सरकार दो महत्वपूर्ण विधेयक खाद्य सुरक्षा गारंटी और भूमि अधिग्रहण कानून पास कराना चाहती थी। यह दोनों कानून हालांकि कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वस्तुत: देशहित में भी बहुत मायने रखते हैं। खाद्य सुरक्षा कानून जहां करोड़ों लोगों को सस्ता राशन मुहैया होने की गारंटी देगा, वहीं भूमि अधिग्रहण कानून पास होने से किसानों की जमीन राय सरकारों द्वारा मनमाने ढंग से अधिग्रहण करने पर रोक लगेगी और किसानों को अपनी भूमि की उचित कीमत मिलेगी। संसद में हंगामे के पीछे का गणित शायद यही था कि किसी भी प्रकार से इन बिलों को पास होने से रोका जाए, ताकि जनता को कोई लाभ न मिले और इसकी तोहमत सरकार पर लगाई जाए। भाजपा ने शायद आम आदमी को बुध्दिीहीन समझकर ही यह कदम उठाए हैं क्योंकि लोग बखूबी इस बात को समझते हैं कि इन बिलों के पास होने से कांग्रेस को होने वाला संभावित लाभ महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि जनता को मिलने वाली राहत अधिक मायने रखती है? और जनता यह भी जानती है कि कांग्रेस को होने वाले को रोकने के लिए देशवासियों को होने वाले लाभ को बंधक बनाना, राजनीति है, जनहित नहीं। क्योंकि इस बात की तो कोई गारंटी नहीं दे सकता कि कांग्रेस को इन बिलों का लाभ होगा ही होगा। भाजपा बेशक इस आरोप से इंकार कर सकती है, लेकिन संसद को बाधित करने की वास्तविक वजह भ्रष्टाचार कम और आर्थिक सुधारों और गरीब आदमी को आसानी से रोटी उपलब्ध कराने के निमित्त बढ़ाए सरकार के कदमों को रोकने का प्रयास यादा था। और शायद इसी का फल भाजपा को कर्नाटक में मिला है।

? विवेकानंद