संस्करण: 13 जून-2011

भाजपा सरकारों ने भी क्रूरता से दबाए हैं
जनांदोलन

? एल.एस.हरदेनिया

               अब तो बाबा रामदेव ने साफ कर दिया है कि वे अपने आंदोलन की सफलता के लिए हिंसा का उपयोग करने से भी नहीं हिचकिचाएंगे। उन्होंने घोषणा की है कि वे अपनी सेना बनाएंगे जो सरकारी पुलिस व सेना से तक टक्कर लेने की क्षमता रखेगी और आवश्यकता पड़ने पर उनका मुकाबला करेगी। हमारा संविधान शांतिपूर्ण आंदोलन की छूट देता है, हिंसक आंदोलन की नहीं। यदि जनांदोलन में कोई व्यक्ति या संगठन हिंसा का सहारा लेता है तो वह संविधान एवं कानून की अवहेलना का दोषी बन जाता है। नक्सलियों और माओवादियों का इसलिए विरोध है क्योंकि वे हिंसा के माध्यम से वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था को जड़-मूल से उखाड़ देना चाहते हैं। रामदेव द्वारा हिंसा का सहारा लेने की घोषणा के बाद अब उनमें और नक्सलियों-माओवादियों में कोई अंतर नहीं रह गया है।

 

               क्या रामदेव जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति द्वारा हिंसा अपनाया जाना उचित है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका स्पष्ट उत्तर उन्हें देना होगा।

 

               इसके अतिरिक्त बाबा रामदेव के आंदोलन ने अनेक बुनियादी सवालों को जन्म दिया है। उनमें प्रमुख हैं

 

               1) क्या आमरण अनशन के अस्त्र का उपयोग एक निश्चित अवधि में किसी अत्यधिक जटिल व कठिन मांग को पूरा करने के लिए किया जा सकता है?

 

               2) क्या रामदेव का कथित सत्याग्रह, आंदोलन की इस विधा के प्रणेता महात्मा गाँधी के सिध्दांत के अनुकूल है? गाँधी जी ने हमेशा अकेले ही इस अहिंसक हथियार का उपयोग किया। उन्होंने कभी इसमें साझेदारी को बढ़ावा नहीं दिया।

 

               3) क्या आमरण अनशन पर बैठकर, एक निश्चित समय सीमा में कोई मांग पूरी करने पर जोर देना ब्लैक मेलिंग नहीं है।

 

               4) क्या चार-चार मंत्रियों का एक आंदोलनकारी से मिलना, वह भी एयरपोर्ट जाकर, सरकार की कमजोरी का प्रतीक नहीं था? क्या मंत्रियों का ऐसा करना प्रोटोकाल का उल्लघंन नहीं है? प्रोटोकाल के नियमों में यह निश्चित रहता है कि कौन, किससे, कहां और कब मिले?

 

               5) पहले एक आंदोलनकारी को तमाम नियमों व परंपराओं को तोड़कर चने के झाड़ पर चढ़ा देना और फिर उसी व्यक्ति को आधी रात के बाद गिरतार करना व उसके निर्दोष अनुयायियों पर, जिनमें महिलायें शामिल थीं, लाठियां भांजना किस तरह उचित है?

 

               6) क्या किसी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पहली बार इस तरह का बल प्रयोग किया गया? क्या इसके पूर्व, अन्य अवसरों पर भी इसी तरह का बल प्रयोग नहीं किया गया था? क्या इस प्रकार की कार्यवाही भाजपा की सरकारों ने कभी नहीं की?

 

               7) क्या किसी सत्याग्रही को पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए महिला का भेष धर भागना चाहिए? हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन की यह परंपरा रही है कि सत्याग्रही और आंदोलनकारी अपनी गिरफ्तारी का विरोध तक नहीं करते, भेष बदलकर भागने की कोशिश करना तो दूर की बात है। यहां तक कि अहिंसक आंदोलन में विश्वास न करने वाले भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों ने भी अपने आप को शांतिपूर्वक पुलिस के हवाले कर दिया था।

 

                इस तरह के अनेक प्रश्न पूछे जा रहे हैं और पूछे जाने चाहिए।

 

               हमारे देश के परिदृश्य पर गाँधीजी के आगमन के पूर्व हमारे देश में अनशन या उपवास या सत्याग्रह का राजनैतिक या सामाजिक उपयोग नहीं होता था। वैसे उपवास सभी धर्मों में किया जाता है परंतु यह उपवास आध्यात्मिक संतोष के लिए होता था। गाँधीजी ने सार्वजनिक मुद्दों को लेकर अनशन, जिसे वे उपवास कहते थे करना प्रारंभ किया परंतु उन्होंने कभी भी इसका उपयोग किसी सरकार कुछ करने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं किया। यहां तक कि उन्होनें कभी ब्रिटिश सरकार से एक निश्चित तिथि पर भारत छोड़ने की मांग को लेकर उपवास नहीं किया।

 

               बापू द्वारा तय किए मानदंड़ो पर बाबा रामदेव का उपवास खरा नहीं उतरता। बापू ने कभी अपने अनुयायियों से आव्हान नहीं किया कि वे उनके साथ उपवास करें। बापू ने कभी भी हजारों लोगों को अपने उपवास स्थल पर एकत्रित नहीं किया।

 

               बाबा रामदेव ने जो मांगे रखी हैं उनका किसी निश्चित समय सीमा में पूरा किया जाना संभव नहीं है। बाबा रामदेव की मांग थी कि विदेशों में जमा काला धन वापिस लाने के लिए अध्यादेश जारी किया जाए। चूंकि इस मामले में अन्य देश भी शामिल हैं इसलिए ऐसा कानून केवल अध्यादेश जारी कर नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए संबंधित देशों से उपयुक्त संधियां करना आवश्यक है।

 

               गाँधीजी प्रायश्चित, पश्चाताप या आत्मशुध्दि के लिए उपवास करते थे जबकि बाबा रामदेव का उपवास एक तरह की ब्लैकमेलिंग की परिधि में आता है। इस आंदोलन के दरम्यान भारत सरकार का व्यवहार भी पेन्डयूलम की तरह रहा। एक तरफ तो बाबा रामदेव को मनाने के लिए हास्यास्पद प्रयास किए गए और दूसरी ओर सभी सीमाओं को लांघकर, पुलिस बल का उपयोग किया गया। मेरी दृष्टि में केन्द्र सरकार के चार मंत्रियों को एयरपोर्ट जाकर बाबा से बात करने की कतई जरूरत नहीं थी। इन चार मंत्रियों में प्रणव मुखर्जी जैसे वरिष्ठतम मंत्री भी शामिल थे। मुखर्जी आज से तीस साल पहले भी मंत्री थे। उनमें प्रधानमंत्री बनने की सभी योग्यतायें हैं। जब भी कोई आंदोलन होता है, आंदोलनकारी स्वयं सरकार के पास वार्ता के लिए जाता है। इस मामले में इस परंपरा की अवहेलना की गई। बाबा और सरकार के बीच एक होटल के सुईट में बातचीत होना भी गलत था। क्या दिल्ली में शासकीय भवनों का इतना अभाव है कि एक होटल में वार्तायें हुइं । इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली की पुलिस ने उस रात स्थापित मर्यादाओं को लांघा और निर्दोष लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया। इसकी सर्वत्र निंदा स्वभाविक है पंरतु मैं मानता हॅ कि भारतीय जनता पार्टी को इसकी निंदा करने का अधिकार नहीं है। भाजपा की सरकारों ने इससे भी ज्यादा क्रूर तरीके से आंदोलकारियों के साथ व्यवहार किया है। सन् 1990-92 के बीच मध्यप्रदेश में भाजपा का शासन था। उस दरम्यान एक दिन ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी के अनुयायी अपनी कुछ मांगों को लेकर दुर्ग में रेल पटरी पर बैठे थे। शायद इन लोगों को अपना धरना शुरू किए 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि उन पर पुलिस ने लगभग बिना किसी पूर्व सूचना के गोलीबारी प्रारंभ कर दी। नतीजे में 12 मजदूर मारे गए। इसी तरह, कुछ महीने पहले भोपाल में आंदोलकारी शिक्षको को खदेड़-खदेड़ कर मारा गया। यहां तक कि महिलाओं तक को नहीं छोड़ा गया। किसान आंदोलन में शामिल लोगों की जमकर पिटाई की गई। सन् 2002 में गुजरात में जो कुछ हुआ, वह भी पुलिस बर्बरता का प्रतीक है।

 

               इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे देश की जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त है और वह यह भी समझ गई है कि राजनेताओं के भरोसे भष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता। इसलिए जब भी कोई गैर-राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार के विरूध्द आवाज उठाता है आम जनता उसको समर्थन देती है। इसलिए आम लोगों ने अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का साथ दिया। जहां अन्ना हजारे अपने गैर-राजनैतिक चरित्र को कायम रख सके वही बाबा रामदेव ऐसा नहीं कर सके। बाबा रामदेव ने दिल्ली में अपना अनशन प्रारंभ करने के पूर्व पूरे देश का दौरा किया था। इस दौरे के सिलसिले में वे मध्यप्रदेश भी आये थे। मध्यप्रदेश के अनेक स्थानों पर प्रदेश के मंत्रियों ने उनका स्वागत किया और वे उनके कार्यक्रमों में शामिल हुए। इसी तरह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सावर्जनिक रूप से बाबा को अपने समर्थन की घोषणा की और समर्थन दिया भी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि वे भाजपा से जुड़ गये हैं। इसके अलावा, वे स्वयं भी एक राजनैतिक पार्टी के मुखिया हैं।

 

               इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्टाचार का जड़मूल से खात्मा उसी समय हो सकता है जब भ्रष्ट लोगों को सामाजिक प्रतिष्ठा न मिले और यदि संभव हो तो उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए। परंतु दु:ख की बात है कि मध्यप्रदेश के अपने प्रवास के दौरान बाबा ऐसे लोगों के संपर्क में थे जिनकी समाज में प्रतिष्ठा संदिग्ध है। हिन्दुस्तान टाईम्स में छपे एक समाचार के अनुसार, बाबा उज्जैन में एक ऐसे व्यक्ति के यहां ठहरे थे, जिसे सट्टा किंग कहा जाता है। ऐसे व्यक्तियों का आतिथ्य स्वीकार करके भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से कैसे लड़ा जा सकता है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर बाबा रामदेव से अपेक्षित है।

 ? एल.एस.हरदेनिया