संस्करण: 13 जून-2011

सुख का व्यापार या परिवार दाम्पत्य
बचाने की कवायद

? अंजलि सिन्हा

               मलेशिया में एक संस्था आजकल चर्चा में है। नाम है ओबिड़ियण्ट वाइव्हस् क्लब यानि 'आज्ञाकारी पत्नी क्लब'। संस्था के पास आज्ञाकारी पत्नी बनने वाली महिला प्रशिक्षणार्थियों की लाइन लगी है। दरअसल संस्था भटके हुए पतियों तथा पुरुष पार्टनर को काबू में रखने के लिए टिप्स दे रही हैं। वह सीखाती है कि पत्नी को अपने पति की कैसी उम्दा सेवा करनी चाहिए ताकि पति के पांव कहीं बाहर बहके नहीं और वह वफादारी निभायें। क्लब का मानना है कि पत्नी यदि पति को सन्तुष्ट नहीं करती,उसकी आज्ञा नहीं मानती तो इससे वैवाहिक जीवन में असन्तोष पैदा होता है और फिर सामाजिक बुराइयां पनपती हैं। इसलिए पत्नियों को खुद को पतियों को सौप देने में कोई कसर नही छोड़नी चाहिए। संस्था की वाइस प्रेसिडेण्ट डॉ. रोहाया मोहम्मद ने अखबार को बताया कि जो पति घर में बिस्तर पर खुश हो वह वेश्या के पास नहीं जायेगा। अब औरत को अच्छी मां और अच्छी रसोइया होने के साथ ही आकर्षक और यौन सम्बन्धों में दिलेर बनने की जरूरत है। क्लब के सदस्य का मानना है कि इससे परिवार मजबूत बनेगा और वेश्यावृत्ति की समस्या से भी छुटकारा मिलेगा। अर्थात् पुरुषों को जो सेवा बाहर बाजार में उपलब्ध है वह घर में उपलब्ध करायी जाय। वहां परस्पर चाहत, खुद की इच्छा और भावनाओं का कोई मतलब नहीं। पुरुष कह सकता है या तो तुम खुद को मुझे सौप दो या मैं आजाद हूं कहीं भी अपनी कुण्ठाओं को अंजाम देने के लिए।

 

               परिवार तथा दाम्पत्य जीवन को बचाने के लिए अकेले मलेशिया ही महिलाओं को पाठ नहीं पढ़ा रहा है। यह जरूर हो सकता है कि वहां ज्यादा खुले तौर पर यह व्यवसाय चल रहा हो लेकिन कई दूसरी जगहों पर और हमारे मुल्क में भी यह जिम्मेदारी पत्नियों की होती है कि वे पतियों को बहकने न दे। शादी तो मानो पतियों को लायसन्स दे देता है अपनी यौनेच्छा पूरी करने का। ऐसा नहीं है कि पत्नियों की कोई इच्छा नही होती होगी लेकिन उसके लिए क्लब चलाने या सीख देने की कोई जरूरत नहीं होती। इस रूप में तो वह दोनो रम्भा है लेकिन एक भद्रकाली है दूसरी अभद्र। एक किसी एक के लिए दूसरी किसी के लिए भी उपल्धा है । देह केन्द्रित सोच और मानसिकता के बावजूद इसमें से एक को हमारे समाज ने इज्जत बख्शी है। वह संस्कारी है, पवित्र और समर्पित है । वह भी अपनी पति की बराबरी की कम्पनियनशिप की अपेक्षा नही रखती बल्कि स्वयम् को हमेशा प्रस्तुत करती है।

 

               यदि हम दैहिक रिश्तों की बात छोड़ दें और पूरे पारिवारिक सम्बन्धो की बात करें तो भी स्त्रीपुरुष के अलग-अलग मानकों को आसानी से समझ सकते हैं। औरत और पुरुष से की जानेवाली अपेक्षाओं में बहुत बड़ा अन्तर परिवार के गाड़ी का पहिया बराबर का नहीं होने देता लेकिन मुगालता बराबर का होने का जरूर होता है।

 

               कहा जा रहा है कि एक सुघड़, अच्छी पत्नी बनने का बाजार गरम है। बड़े शहरों में आजकल ट्रेण्ड होममेकर बनने के प्रशिक्षण मिल रहे है। दो साल पहले दिल्ली के पीतमपुरा की लाइफलाँग लर्निंग सेण्टर के बारे में टाइम्स ऑफ इण्डिया (18-4-2009) में खबर छपी थी जहां पत्नी बनने के इन्तजार में युवा लड़कियों के कोर्स करने का समाचार था। बताया गया था कि रु.20 हजार से 55हजार रूपए तक फीस चुकता कर लड़कियां यह टेर्निंग ले रही हैं। इन्स्टिटयूट चलाने वालों का कहना था कि आपका व्यक्तित्व अधूरा है यदि आप अच्छा नहीं पकाती या घर व्यवस्थित नहीं रखती। यदि आप ऐसा नहीं करती हो तो अपने पति का दिल कैसे जीत सकती हैं?लाइफलाँग लर्निंग सेण्टर की काउन्सिलर अंजलि भल्ला ने बताया था कि आपको अपने पति का दिल जीतने और उसे खुश करने के लिए कभी कभार अपना दिल माने या न माने तो भी कोशिश करनी चाहिए नहीं तो पति कही और रास्ता ढूंढेगा।

 

               इस्न्ट्टियूट में अच्छी गृहिणी तैयार करने के लिए बुनियादी स्तर से लेकर एड़वान्स स्तर के कोर्स की बात की गयी थी जिसकी फीस में अन्तर था। यहां खाना बनाने से लेकर घर की अन्य व्यवस्थाओं के अलावा पार्टी में जाने के लिए कैसे सजे यह भी सीखाया जाता है। सीखने वालों मानना है कि कुछ टिप्स सीख लेने में बुराई क्या है।

 

               वैसे तो व्यवस्थित ढंग से रहना या सलीका सीखना अपने आप में कोई बुरी इच्छा नही है । इन्सान का अधिकाधिक कुशल होते जाना जीवनस्तर को उंचा ही उठाता है। लेकिन गौर करने वाली बात है कि यह सब सीखाने वाले संस्थान या संस्थाएं किसे लक्ष्य कर रहे हैं। ऐसे प्रशिक्षण लड़कों को देने की क्यों जरूरत नहीं लगती ? क्यों उन्हें ही खुश रखने का प्रयास होना चाहिए ?सम्भव है ऐसा कोई इन्स्टिटयूट चले भी तो उसमें कोई पुरुष प्रशिक्षण लेने आयेगा ही नहीं। वह आत्मविश्वास से लबालब भरा है कि वह सम्पूर्ण है, उसे किसी पराये वातावरण में जाकर एड़जस्ट तो करना नहीं है। उसे घर चलाने का मतलब धन कमाने से है। दुख दूर रहे इसके लिए टोना-टोटका और मन्नते तो औरतें ही करती हैं लेकिन वास्तविक सुख और खुशी तो अपने भरोसे ही हासिल होती है।

 

               दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सरकारी योजना में आए बदलाव को भी हम इसी रूप में देख सकते हैं जिसमें छात्राओं को उनके भावी ससुराल के लिए तैयार कराने पर जोर दिया जाता है। पहले विश्वविद्यालय से सम्बधिात कई कालेजों में महिला विकास केन्द्र यानि वूमेन डेवलपमेण्ट सेल हुआ करता था। इस केन्द्र का उद्देश्य था शिक्षण संस्थानों में छात्रायें यदि किसी प्रकार का लैंगिक उत्पीड़न झेलती हैं तो वे इस फोरम की सहायता ले सकती हैं या परेशान हैं तो काउन्सिलर से सलाह मशविरा कर लें। शैक्षणिक वातावरण को कैसे वूमेन फ्रेण्डली बनायें तथा यौन हिंसा नहीं होने पाये यह भी प्रयास था। इस केन्द्र का नाम बाद में परिवार परामर्श केन्द्र हो गया तथा सरकारी नीतियों में इस बात के लिए भी जोर डाला गया कि यह केन्द्र युवाओं को विवाहपूर्व परामर्श दे कि शादी के बाद सुखी परिवार कैसे बनाये। यद्यपि यह नहीं कहा गया था कि यह सुविधा सिर्फ लड़कियों के लिए हो लेकिन जाहिर था कि हमारे समाज में ऐसी सलाह कौन लेगा ? अर्थात अब वे सिर्फ ज्ञानार्जन ही न करें बल्कि परिवार चलाने का हुनर भी साथ सीखती जायें।

 
? अंजलि सिन्हा