संस्करण: 13 जून-2011

खतरे खरपतवार के

? शब्बीर कादरी

               आजादी के बाद से ही जैसे-जैसे हम खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की बढ़ते गए, कई विदेशी वनस्पतियों और खरपतवार ने कदमताल मिलाते हुए गहराई तक मज़बूती से उपजाऊ भूमि में अपने पैर जमा लिये और जमीन की उर्वरा शक्ति का क्षरण कर उत्पादन को काफी हद तक प्रभावित किया। यह वनस्पतियां कहां से आईं और कब आईं, यह प्राथमिक चिंता का विषय नहीं,फ़िक्र इस बात की है कि खरपतवार के रूप में हमारी फसलों और ज़मीन को जाने-अनजाने में नुक़सान पहुंचाने में इन अनचाही वनस्पतियों ने जो कीर्तिमान स्थापित किया है वह चौंकाने वाला भी है और वीभत्स भी। भारतीय किसान उन्नत किस्म के बीज,उपयुक्त उर्वरक,नियमित सिंचाई तथा पादप सुरक्षा के विभिन्न उपायों जैसे उत्पादन साधनों को वैज्ञानिक विधि से अपनाकर भी कृषि से अधिकाधिक उत्पादन प्राप्त करने में अपने लक्ष्य में अब भी पूर्णतया सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसका एकमात्र कारण है कि वे उन्नतशील साधनों को अपनाने के साथ-साथ खरपतवारों के नियंत्रण पर पूर्ण ध्यान नहीं देते। यदि किसान को अपनी फसल से भरपूर उपज प्राप्त करनी है तो अपनी फसल के शत्रु खरपतवारों पर नियंत्रण पाने के महत्व को समझकर उनको नष्ट करना ही होगा। वैज्ञानिकों ने यह सत्यापित कर दिया है कि खरपतवारों की उपस्थिति फसल की वर्तमान उपज को लगभग 33 प्रतिशत तक कम कर रही है।

 

               विदेशी मूल की जहरीली वनस्पतियां और खरपतवार की विभीषिका और उसके फलने-फूलने की क्षमता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ये जहां ऊगती हैं वहां अपनी जड़ें आसानी से जमा लेती हैं तथा स्थानीय वनस्पितियों की वृध्दि में बाधक बन कर स्वयं पोषित होती रहती हैं। भूमि की उर्वरा शक्ति को प्रभावित तो करती ही हैं, मिट्टी में मौजूद जल और पोषक तत्वों को अपनी और खींच कर सोख लेती हैं। इससे खेती योग्य भूमि में पारम्परिक फसलों को उत्पादन लगातार कम होता जा रहा है। इनसे पशुओं में अनेक रोग फैलते हैं यहां तक कि पशुओं द्वारा खाई जाने वाली इनकी पत्तियां कभी-कभी मृत्यु का कारण भी बनती हैं। मैक्सिको मूल के सूरजमुखी कुल की गाजर घास देश के लगभग तीन लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर अपनी जड़ें जमा चुकी है। गाजर घास 1950 में अमरीका से पी.एल.480 योजना के तहत आयातित गेहूं के साथ भारत पहुंचा था। इसे सर्वप्रथम महाराष्ट्र के निकट पुणे में देखा गया था। आज इसके प्रसार के कारण राजाजी पार्क,कार्बेट पार्क समेत अनेक राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण सहित कई महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी इसकी चपेट में हैं। हमारे लिए सैदव यह गर्व का विषय रहा है कि हिमालय की तराई में अनेक प्रकार की सामान्य और दुर्लभ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां बड़ी तादाद में पाई जाती हैं,जो चिकित्सा पध्दति में महत्वपूर्ण स्थान रखने के अलावा परिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में भी विशेष योगदान देती हैं। पर अब ये भी खरपतवार और विदेशी वनस्पतियों की चपेट में है।

 

               खाद्यान्न उत्पादन में खरपतवार सदैव ही नकारात्मक भूमिका प्रस्तुत करते रहे हैं। किसान तो अपनी पूर्ण शक्ति व साधन फसल की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए उगाता है। ये अनैच्छिक पौधो इस उद्देश्य को पूरा नहीं होने देते। खरपतवार से हुई हानि किसी अन्य कारणों से जैसे कीड़े, मकोड़े, रोग व्याधि आदि से हुई हानि की अपेक्षा अधिक होती है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में विभिन्न व्याधियों से कृषि उत्पादन में प्रतिवर्ष लगभग 6 हजार करोड़ रू.की हानि होती है। जिसका एक तिहाई भाग खरपतवारों द्वारा होता है। जबलपुर में राष्ट्रीय खरपतवार विज्ञान अनुसंधान केंन्द्र खरपतवार से निपटने की योजनाओं पर वर्षों से कार्य कर रहा है। केन्द्र सरकार द्वारा समन्वित खरपतवार नियंत्रण योजना गेहूं,धान और गन्ना के लिए वर्ष 1952से प्रारंभ की गई है। यह योजना 11 राज्यों में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा शुरू की गई है। सन् 1978में स्थापित यह खरपतवार अनुसंधान कार्यक्रम अखिल भारतीय समन्वित खरपतवार नियंत्रण कार्यक्रम के रूप में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा 22स्थानों में पूरे देश में सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। जबलपुर संस्थान के निदेशक के अनुसार इसे यांत्रिक ओर रासायनिक विधि से भी नियंत्रित किया जा सकता है। सामान्यत: रसायन का प्रयोग करके भी खरपतवारों को नियंत्रित किया जाता है। इससे प्रति हेक्टेयर लागत कम आती है तथा समय की भी भारी बचत होती है। लेकिन इन रसायनों का प्रयोग करते समय विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। खरपतवार नियंत्रण में खरपतवारनाशी रसायनों के उपयोग का लाभ यह है कि यह फसल बोने के पूर्व या बुवाई के तुरन्त बाद उपयोग किए जाते हैं। जिससे खरपतवार अंकुरण अवस्था में ही समाप्त हो जाते हैं।

 

               कृषि, भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी प्रमुख भूमिका प्रतिपादित करती है, गांव में रहने वाले अनपढ़ और अज्ञानी किसान खरपतवार से वाक़िफ तो जरूर है पर उसके दूरगामी दुष्परिणामों से अनभिज्ञ भी है और उसके उन्मूलन के आधुनिक तरीके से भी परिचित नहीं है। देश की सभी राज्य सरकारों के कृषि विभाग का प्रथम कर्तव्य है कि वे इन जहरीली विदेशी वनस्पतियों और खरपतवारों से उत्पन्न खतरे को भांपकर अपनी उपजाऊ भूमि को शतप्रतिशत बचाए रखने में संसाधनों को झोंकने मे देर न करे।
 
? शब्बीर कादरी