संस्करण: 13  जनवरी - 2014

भारत को मिली

एक और बड़ी कामयाबी

 

?  जाहिद खान

        भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अंतरिक्ष विज्ञान में एक बड़ी छलांग लगाते हुए हाल ही में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के साथ अपने रॉकेट जीएसएलवी डी-5 का सफल प्रक्षेपण किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धावन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित 49.13 मीटर लंबा यह रॉकेट अपने साथ 1,982 किलोग्राम वजनी संचार उपग्रह जीसेट-14 ले गया था, जिसे उसने सफलतापूर्वक वांछित कक्षा में स्थापित कर दिया। इस सफल प्रक्षेपण के साथ ही इसरो अमेरिका, रूस, जापान, चीन और फ्रांस के बाद दुनिया की छठी एजंसी बन गया, जिसके पास स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन की व्यवस्था है। गौरतलब है कि संचार उपग्रह को भूस्थैतिक कक्षा में प्रक्षेपित करने के वास्ते, इसे ले जाने वाले राकेट के लिए क्रायोजेनिक इंजन जरूरी होता है। क्रायोजेनिक तकनीक से लैस होने के बाद अब भारत को अपने संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इतना ही नहीं अब वह दूसरे देशों के उपग्रहों का प्रक्षेपण कर विदेशी मुद्रा अर्जित करने की स्थिति में भी आ गया है। विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह सचमुच भारत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और इस सफलता के पीछे निश्चित तौर पर हमारे देष के वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों की विषेश दक्षता, कड़ी मेहनत और प्रतिबध्दता शामिल है। जिन्होंने अपनी पिछली नाकामयाबियों से हिम्मत न हारते हुए दिन-रात लगातार कोशिशें की और अंत में वे अपने काम में कामयाब हुए।

               साल 2010 में जीएसएलवी का प्रक्षेपण दो बार नाकाम रहा था। जबकि पिछले साल अगस्त में र्इंधन के लीक होने की वजह से आखिरी वक्त में इसका प्रक्षेपण टालना करना पड़ा था। पिछली नाकामियों को देखते हुए हमारे वैज्ञानिकों ने क्रायोजेनिक इंजन को दोशमुक्त बनाने के लिए इसमें कई अहम बदलाव किए। बीते तीन वर्षों के दौरान उन्होंने इसके 45 से ज्यादा परीक्षण किए, जिसमें वे अंतत: कामयाब हुए। इसरो की क्रायोजेनिक अपर स्टेज परियोजना ने स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज की डिजाइन और विकास की परिकल्पना की। ताकि रूस से हासिल किए गए स्टेज को बदला जा सके और जीएसएलवी के प्रक्षेपणों में उसका इस्तेमाल किया जा सके। प्रक्षेपण वाहन में जरूरत के तहत डिजाइन में सुधार किए गए। इन सुधारों में निचले आवरण की फिर से डिजाइनिंग करना शामिल है। यह जीएसएलवी डी-5 की वातावरण में उड़ान के दौरान क्रायोजेनिक इंजन की रक्षा करता है। इसके अलावा क्रायो स्टेज के वायर टनल को फिर से बनाया गया ताकि वह उड़ान में बड़े बलों को सह सके।

                तकरीबन 365 करोड़ रुपये की लागत वाले महत्वकांक्षी जीएसएलवी डी-5 मिशन के दो मकसद थे। पहला, देसी क्रायोजेनिक इंजन का परीक्षण और दूसरा संचार उपग्रह को उसकी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित करना। दोनों ही मिशन में हमें कामयाबी हाथ लगी। देसी क्रायोजेनिक इंजन के माध्यम से जीएसएलवी का प्रक्षेपण इसरो के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। करीब 20 साल पहले अमेरिका के दबाव में रूस ने यह तकनीक भारत को देने से इंकार कर दिया था। अमरीका ये कहकर इस तकनीक को भारत से दूर रखने की लगातार कोशिश करता रहा कि वो इसका इस्तेमाल अपने सैन्य ताकत बढ़ाने में कर सकता है, लेकिन भारत ने अपना अंतर-महाद्वीय प्रक्षेपास्त्र अग्नि-5, क्रायोजेनिक इंजन से पहले विकसित करके दिखाया, जिसकी मारक क्षमता पांच हजार किलोमीटर से अधिक है। अग्नि-5 की खास बात ये है कि ये प्रक्षेपास्त्र ठोस रॉकेट ईंधन से चलता है, क्रायोजेनिक इंजन से नहीं। रूस और अमेरिका के इंकार के बाद आखिरकार भारत ने खुद क्रायोजेनिक तकनीक विकसित करने का फैसला किया। साल 2001 के बाद इसरो ने इस पर तेजी से काम किया। वैज्ञानिकों की 20 साल की कड़ी मेहनत रंग लाई और भारत ने वह प्रौद्योगिकी हासिल कर ली, जिससे भारी उपग्रह भूस्थिर कक्षा में स्थापित होते हैं। इस तकनीक का महत्व इस तथ्य में निहित है कि दो हजार किलो वजनी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए क्रायोजेनिक इंजन की सख्त जरूरत पड़ती है। इसकी वजह ये है कि इसी इंजन से वो ताकत मिलती है, जिसके बूते किसी उपग्रह को 36,000 किलोमीटर दूर स्थित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया जाता है।

               जियोसिनक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी जीएसएलवी डी-5 ने जिस जीसैट-14 का प्रक्षेपण किया, वह भारत का 23वां भूस्थिर संचार उपग्रह है। जीएसएलवी ने इससे पहले जीसैट-14 के चार पूर्ववर्तियों का प्रक्षेपण क्रमश: साल 2001, 2003, 2004 और 2007 में किया था। बहरहाल जीसैट-14, अंतरिक्ष में 74 डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थापित किया जाएगा। यह उपग्रह इनसैट-3 सी, इनसैट-4 सीआर और कल्पना-1 उपग्रहों के साथ स्थित होगा। मिशन का प्राथमिक उद्देश्य विस्तारित सी और केयू-बैंड ट्रांसपोंडरों की अंतर्कक्षा क्षमता को बढ़ाना और नए प्रयोगों के लिए मंच मुहैया कराना है। संचार उपग्रह जीसैट-14 अपने साथ 12 संचार ट्रांसपोंडर्स ले गया है, जो इनसेट व जीसेट सिस्टम की क्षमता को और भी ज्यादा बढ़ाएंगे। जीसैट-14 सैटलाइट से पूरे भारत में संचार सुविधाएं और बेहतर हो सकेंगी। यह सेटेलाइट मुख्य रूप से टेली कम्यूनिकेशन और शिक्षा के प्रसार के काम आएगा। इससे टेली एजूकेशन और टेली-मेडिसिन के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर हो जाएगा। जासूसी और मौसम की भविश्यवाणी करने में मददगार साबित होगा। यही नहीं इस संचार उपग्रह से गांव-गांव तक इंटरनेट को पहुंचाने में भी मदद मिलेगी। बहरहाल जीसेट-14 कक्षा में रहते हुए 12 साल तक कार्य करेगा।

                विज्ञान प्रौद्योगिकी व अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन लगातार अपने कदम आगे बढ़ा रहा है। बीते एक दशक में इसरो के खाते में ऐसी कई कामयाबी है, जिनकी वजह से भारत का सिर दुनिया के सामने ऊंचा उठ गया है। अत्याधुनिक अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में तो इसरो ने अब महारत हासिल कर ली है। चंद्रमा पर मानवरहित यान, चंद्रयान-1 के सफल प्रक्षेपण से लेकर बीते साल मंगलयान 'मार्स आर्बिटर मिशन' (एमओएम) का सफल प्रक्षेपण इन कामयाबियों की छोटी सी दास्तान है। सबसे बड़ी बात, मंगल मिशन में इस्तेमाल उपग्रह से लेकर प्रक्षेपण रॉकेट तक सभी इसरो ने तैयार किए थे। क्रायोजेनिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महारथ हासिल करके भारत ने अब अपनी रॉकेट प्रक्षेपण क्षमताओं में और इजाफा किया है। 2 टन तक के सैटलाइटों को पीएसएलवी रॉकेट के जरिए लॉन्च करने में भारत पहले ही अपनी धाक जमा चुका था। अब इससे ज्यादा वजनी सैटलाइट भी जीएसएलवी के जरिए छोड़े जा सकेंगे। जब हमारे यहां यह प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं थी, तब हम दूसरे देशों को 3.5 टन के संचार उपग्रह के प्रक्षेपण के लिए 500 करोड़ रूपए की एक बड़ी रकम दिया करते थे। जबकि जीएसएलवी अब यह काम सिर्फ 220 करोड़ रूपए में करेगा। यानी 2 टन से ज्यादा वजनी सैटलाइट आधे से भी कम खर्च पर अब भारत खुद प्रक्षेपित कर सकेगा।

               कुल मिलाकर किसी भी देश की प्रगति उसकी तकनीकी कौशल का परिणाम होती है, और भारत ने अपने वैज्ञानिकों की अद्भुत मेधा के जरिए बहुत कम समय में यह कौशल हासिल कर लिया है। क्रायोजेनिक तकनीक से लैस प्रौद्योगिकी से भारत को अपने भारी उपग्रहों को भूस्थिर कक्षा में स्थापित करने में मदद मिलेगी। इंसानों को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए भी यह तकनीक जरूरी है। इसरो के इस सफलतापूर्ण अभियान के बाद देश अब अपने चंद्रयान-2 मिशन पर भी तेजी से काम कर सकेगा, क्योंकि उसके लिए भी जीएसएलवी की जरूरत होती है। जीएसएलवी डी-5 रॉकेट का इस्तेमाल दूसरे जीआइसेट की लांचिंग में भी होगा। आने वाले दिनों में इसरों का इरादा जीएसएलवी डी-5 के जरिये जीसेट-6, 7-ए और 9 का प्रक्षेपण करना है। जीएसएलवी डी-5 के सफल प्रक्षेपण ने भारत के सामने कई नए दरवाजे खोल दिए हैं। अपने ही नहीं, बल्कि अन्य देशों के बड़े सैटलाइटों को प्रक्षेपित कर, वह अपनी आय भी बढ़ा सकता है। भविश्य में भारत इस मार्केट का बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरे, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


? जाहिद खान