संस्करण: 13  जनवरी - 2014

भाजपाई बौखलाहट

के निहितार्थ

? सुनील अमर

        देश के भ्रष्टतम नेताओं में शुमार और सपरिवार-रिश्तेदार जेल जाने वाले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदुरप्पा को इसी आरोप में पार्टी से निकालने के एक साल बाद भाजपा फिर से वापस लेने जा रही है तथा इस समारोह के लिए 18 जनवरी की तिथि भी घोषित कर दी गई है। दिल्ली में सरकार बनाने के जो घटनाक्रम हुए तथा विधानसभा में आप सरकार के बहुमत परीक्षण के दौरान भाजपा नेताओं ने जिस तरह का आचरण और बयान दिया उससे देश में सरकार बनाने का दावा करने वाली इस राष्ट्रीय पार्टी की बौखलाहट तथा विचारों के खोखलेपन का पता चलता है। इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी को उसकी ही लिखित शर्तों पर सरकार बनाने का समर्थन देकर कॉग्रेस ने कई दूरगामी निशाने साधो हैं जिसमें सबसे प्रमुख निशाना भाजपा ही है। भाजपा अपने ही बिछाए जाल में फिलहाल फॅंस गई लगती है। समाचार माध्यमों में सायास चलाए जा रहे मोदी के रथ की प्रमुखता को भी इधर केजरीवाल एंड कम्पनी ने पीछे ढ़केल दिया है।

                कर्नाटक में भाजपा को स्थापित करने वाले लिंगायत समुदाय के नेता बी.एस. येदुरप्पा को भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में न्यायालय द्वारा दंडित किए जाने के बाद भाजपा के भीतर से चौतरफा दबाव था कि उन्हें पार्टी से तत्काल निकाल दिया जाय। ऐसा करना आसान इसलिए नहीं था कि वहाँ भाजपा के अस्तित्व को ही खतरा हो गया था। भाजपा हाईकमान उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को बार-बार कहता था और येदुरप्पा उस पर कान ही नहीं देते थे। देश में अपनी तरह का यह एक दीर्घकालिक ड्रामा था जो कई महीने तक चलता रहा। भाजपा की पूरी फजीहत करा देने के बाद येदुरप्पा अपने एक विश्वस्त को मुख्यमंत्री बनाये जाने की शर्त पर कुर्सी से हटे थे। बाद के दिनों में तो उन्हें भाजपा ने पार्टी से भी निकाला और घोषणा की थी कि भ्रष्टाचारियों को पार्टी में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। धयान देने की बात है कि येदुरप्पा तब भी नरेन्द्र मोदी के प्रिय थे लेकिन तब पार्टी के भीतर मोदी की उतनी नहीं चलती थी जितनी आज। आज मोदी जब भाजपा में निर्णायक स्थिति में हैं तो येदुरप्पा की ससम्मान वापसी होने जा रही है। इस वापसी में यह तर्क तो दिया ही जा रहा है कि इससे कर्नाटक में भाजपा फिर से मजबूत होगी लेकिन मीडिया के एक हिस्से में ऐसी खबरें आ रही हैं कि ऐसा येदुरप्पा द्वारा मोदी के उपर दबाव बनाने की वजह से होने जा रहा है। समझने की बात है कि  गुजरात के भुज जनपद की मूल निवासी जिस युवती के प्रति मोदी के आकर्षण और उसका लम्बे समय तक जासूसी कराने का मामला इन दिनों चर्चा में है वह और उसका परिवार बंगलौर से भी ताल्लुक रखते हैं और उस वक्त श्री येदुरप्पा की ही सरकार कर्नाटक में थी। अब श्री येदुरप्पा अपनी मदद की कीमत चाहते ही होंगें! खास बात यह है कि उन्होंने काफी पहले से ही ऐलान कर रखा है कि वे भाजपा में फिर से जा रहे हैं।

                  पिछले कुछ महीनों से देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी जिस तरह से मोदी मय हो गयी और जिस तरह से उसके प्रबंधकों ने मंच से लेकर मीडिया तक को अपने प्रभाव में ले लिया था, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अभ्युदय से वह जरा सीन के बाहर हो गया है। दिल्ली में कई बातें एक साथ हो गयीं जो भाजपा को रास नहीं आ रही। एक तो सरकार बनाने के एकदम नजदीक पहुँचकर भी वह सरकार नहीं बना सकी। इससे भाजपा के मनोबल पर जैसा भी असर हुआ हो, मतदाताओं में भाजपा के प्रति धनात्मक संदेश नहीं गया। फिर, भाजपा ने आम आदमी पार्टी पर व्यंग्य करना शुरु किया कि वह सरकार बनाए। भाजपा को उम्मीद थी कि काँग्रेसी मुख्यमंत्री को हराने वाले आप के प्रमुख अरविन्द को काँग्रेस तो समर्थन देने से रही। लेकिन सरकार बनाने के जन-दबाव पर जब अरविन्द केजरीवाल ने 18 सूत्री समर्थन पत्र कॉग्रेस व भाजपा को दिया तो भाजपा ने उसका जवाब देना भी जरुरी नहीं समझा जबकि कॉग्रेस ने लिखित और बिना शर्त की सहमति देकर जनभावनाओं का आदर किया और आप की सरकार बनवाई। विधानसभा में विश्वास मत पर हुई बहस में कॉग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरविन्दर सिंह लवली जहाँ पाँच साल तक सरकार को समर्थन देने की बात करते रहे वहीं भाजपा नेता हर्षवर्धन बौखलाहट में इतना अनाप-शनाप बोले कि उन्हें हमेशा सुनते रहने वाले लोगों को भी ताज्जुब हुआ। पहले सरकार बनाने का चैलेन्ज, सरकार बन गई तो वादों को पूरा करने का चैलेन्ज, सरकार बनने के 48 घंटे के भीतर दो बहुत बड़े वादे पूरे कर दिए गए तो उन वादों के छिद्रान्वेषण का अभियान! भाजपा कह रही है कि दिल्ली के सिर्फ आधो लोग ही मुफ्त पानी का लाभ ले पाऐंगें क्योंकि इतने लोगों के पास ही कनेक्शन हैं! हद है! ऐसे अहमक प्रश्नों का क्या जवाब हो सकता है। दिल्ली में भाजपा की भी सरकार रही है। नगर निगम पर वर्षों से वही काबिज है तो उसने क्यों नहीं लोगों के घरों तक पानी पहॅुचाने की व्यवस्था की?

                  भाजपा के स्टार नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में बहुत खर्चीली चुनाव रैलियाँ की थीं लेकिन उनका जादू नहीं चला और कई क्षेत्रों के प्रत्याशी हार गए तथा  भाजपा सरकार बनाने में फेल हो गई। भाजपा जिन मोदी को अद्वितीय पुरुष बताकर प्रचार में लगी हुई है उनके गृहराज्य में बारह वर्षों के उनके कार्यकाल में एक भी वैसी जनहितकारी घोषणा नहीं हो सकी जो दिल्ली में आप सरकार ने महज 48 घंटों में करके सारी दुनिया की वाहवाही बटोर ली। मुख्यमंत्री अरविन्द ने तो पाँच शयनकक्ष वाले फ्लैट को लेने से भी इनकार कर दिया लेकिन गुजरात से खबर आ रही है कि नरेन्द्र मोदी ने अपना नया सरकारी कार्यालय 150 करोड़ रुपया खर्च करके बनवाया है जिसमें वे मकर संक्रान्ति यानी 13 जनवरी के बाद प्रवेश करेंगें! देश के प्रतिष्ठित मीडिया और सामाजिक अधययन संस्थानों का ताजा ऑकलन बताता है कि समाचार माधयमों और सोशल मीडिया में मोदी की मौजूदगी काफी घट गयी है और केजरीवाल की लोकप्रियता चरम पर है। निश्चित ही यह भाजपा में घबड़ाहट पैदा कर रहा होगा। यह अनायास नहीं है कि गत सप्ताह दिल्ली में संघ प्रमुख ने कहानी की भाषा में यह बताने की कोशिश की आडवाणी की आवश्यकता अभी बनी हुई है। राजनीति तो संभावनाओं और विकल्पों का ही नाम है। भाजपा अगर बहुमत से काफी दूर रहेगी तो सहयोगी दलों की आवश्यकता और बढ़ जाएगी। इसे बताने की जरुरत नहीं कि ज्यादा सहयोगी दल किसके नेतृत्व में इकठ्ठा हो सकते हैं। उधार माकपा प्रमुख प्रकाश करात ने एक और समीकरण उभारकर भाजपा के सामने पाला खींचने की कोशिश की है कि आम आदमी पार्टी को लेकर तीसरे मोर्चे की संभावनाऐं बढ़ गई हैं। केजरीवाल एंड कम्पनी ने भी संकेत दिया है कि उनकी पार्टी 300 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। भाजपा को अपने सामने कॉग्रेस के अलावा भी एक और चुनौती अगर दिखने लगी है तो उसका बौखलाना स्वाभाविक ही है।

   ? सुनील अमर