संस्करण: 13  जनवरी - 2014

घोषित पीएम पद प्रत्याशी का अघोषित चुनाव क्षेत्र

? वीरेन्द्र जैन

        ले ही उस पर भाजपा में घमासान मच चुका हो किंतु उन्होंने अपना प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बहुत पहले से ही घोषित करके छोड़ दिया था,और कहीं नकली लालकिला और कहीं नकली संसद का मंच बनवा कर हुंकार, ललकार रैलियां करवाने लगे थे। जब दो दिन पहले राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जैटली यह कहते हुये पाये गये थे कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दस से अधिक लोग योग्य हैं, वही जैटली दो दिन बाद कहने लगे थे कि यदि भाजपा को हिट विकेट होने से बचना है तो मोदी को तुरंत ही प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि श्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका से तीन महीने का पब्लिक रिलेशन और इमेज मैनेजमेंट का कोर्स किया हुआ है और अपनी इमेज निर्मित कराने के लिए उन्हें देश के सबसे मँहगे वकील राम जेठमलानी की सेवायें पहले से ही मिले हुयी थीं बाद में एकदम से अरुण जैटली भी उनके पक्ष में कूद पड़े थे और उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करवा दिया था।

                हमारे देश में चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित किये जाने की परम्परा नहीं रही है क्योंकि चुनाव के बाद बहुमत में आने वाले दल या गठबन्धन के नेता का चुनाव होता है जिसे ही राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। गत दो दशकों से देश में गठबन्धन सरकारों का दौर चल रहा है और ये गठबन्धन आम तौर पर चुनाव के बाद ही अपना सही स्वरूप ग्रहण कर पाते हैं। इन गठबन्धनों में सम्मलित होने वाले विभिन्न दल अपने अपने घोषणा पत्रों के अनुसार अपनी शर्तें रखते हैं व नेता के चयन में भी उनकी भूमिका उनके दल के कार्यक्रम के अनुसार होती है। स्मरणीय है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब एनडीए की सरकार बनी थी तब भाजपा को राममन्दिर, समान आचार संहिता, व धारा 370 की समाप्ति जैसी प्रमुख मांगों को वापिस लेना पडा था तथा गठबन्धन को बाहर से समर्थन देने वाली तेलगुदेशम ने केवल अटल बिहारी के नेतृत्व में सरकार बनने पर ही समर्थन देने की शर्त रखी थी। वी पी सिंह की सरकार बनते समय भी बड़ा ड्रामा हुआ जब देवीलाल को नेता चुना गया था और उन्होंने अपनी टोपी उन्हें पहना दी थी। उसी दौरान वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाये जाने का चन्द्रशेखर द्वारा विरोध करने पर राम जेठमलानी ने उनके घर के बाहर धरना दे दिया था व उनके समर्थकों ने उनसे हाथापाई की थी जिसमें इस प्रसिध्द वकील के कपड़े तक फट गये थे। यूपीए-एक के समय जब कांग्रेस के सांसदों ने सर्वसम्मति से श्रीमती सोनिया गान्धी को अपना नेता चुन लिया था तब उन्होंने अपना ताज श्री मनमोहन सिंह को सौंप दिया था। अब भी कोई दल बिना दूसरे दलों से गठबन्धन किये सरकार नहीं बना सकता इसलिए गठबन्धन सरकारों के युग में चुनाव के पूर्व नेता घोषित कर देना अव्यवहारिक है। यदि यह मान भी लिया जाये कि भाजपा बिना किसी गठबन्धन के सरकार बना लेने के आत्मविश्वास का प्रभाव मतदाताओं पर छोड़ने की कूटनीति अपना रही है तो उन्हें साथ ही साथ लोकसभा के प्रत्याशियों की सूची भी जारी करना चाहिये थी और उन प्रत्याशियों द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से नेता का चुनाव करवाना चाहिये था। लोकसभा में दल के नेता पर मुहर भले ही हाईकमान लगाता हो किंतु उसे चुनने का अधिकार तो प्रतिनिधियों का ही होता है। अडवाणी समर्थक यह मानते हैं कि मोदी को ऐसा प्रत्याशी घोषित करने का कदम सैध्दांतिक रूप से अलोकतांत्रिक है, जिसका एक नुकसान तो जेडी-यू के साथ गठबन्धन भंग होने और बिहार में सरकार से बाहर होने के रूप में हो ही चुका है।

                 जिस व्यक्ति को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित कर दिया है और तब से ही लगातार देश भर में उसकी आमसभाएं व रैलियां आयोजित करवायी जा रही हैं उसका चुनाव क्षेत्र अभी तक घोषित नहीं किया है। यह कैसी विडम्बना है कि जिसको प्रधानमंत्री चुनवाने के लिए देश भर में घुमाया जा रहा हो उसके लिए कोई चुनाव क्षेत्र ही निर्धारित न किया जा पा रहा हो। दिल्ली में भाजपा द्वारा सरकार बना सकने में असमर्थ रहने और आम आदमी पार्टी के तेज उभार व आकर्षण से मोदी के चुनाव क्षेत्र का चयन और मुश्किल हो गया है। आम आदमी पार्टी, पार्टी से अधिक एक आन्दोलन है और उसका लक्ष्य लगभग सभी स्थापित राजनीतिक दलों को बेनकाब करना है। वे भाजपा के विपरीत सत्ता की अन्धी वासना से दूर हैं और नुकसान पहुँचाने की क्षमता रखते हैं। आम आदमी पार्टी के कारण ही भाजपा की दिल्ली सरकार नहीं बन सकी। उसके नेता अरविन्द केजरीवाल ने अभी घोषित किया हुआ है कि वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे किंतु राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुके केजरीवाल नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे भले ही वे देश में कहीं से भी चुनाव लड़ें । इसका उन्हें राजनीतिक लाभ मिलेगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल गुजरात के मुख्यमन्त्री मोदी को मुख्यमंत्री पद से स्तीफा देने के बाद चुनाव लड़ने की चुनौती भी दे सकते हैं, इससे केजरीवाल का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा पर गुजरात में नेतृत्व का संकट खड़ा हो जायेगा।

                 एक बोधकथा कहती है कि एक बार एक गाँव में सूखा पड़ा तो गाँव के सारे लोग मिलकर पास के चर्च के पादरी के पास गये। उस पादरी ने रविवार को सारे गाँव वालों से एकत्रित होने के लिए कहा ताकि बरसात के लिए प्रभु से सामूहिक प्रार्थना की जाये। अगले रविवार को पूरे गाँव वाले एकत्रित हो गये तो पादरी ने पूछा कि किस किस को प्रार्थना के बाद बरसात होने का भरोसा है? उत्तर में सबने हाथ उठा दिये। फिर पादरी ने हँसते हुये पूछा- तो फिर आप लोगों के छाते कहाँ हैं? उस प्रार्थना सभा में आया कोई भी व्यक्ति छाता लेकर नहीं आया था। यदि भाजपा और मोदी को अपनी जीत का भरोसा होता तो प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित होते ही गुजरात मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया होता।

? वीरेन्द्र जैन