संस्करण: 13  जनवरी - 2014

स्कूल में मवेशी,

आंगनवाडी में भूसा

 

? अमिताभ पाण्डेय

         ध्यप्रदेश में बहुमत की लहर पर सवार होकर सत्ता में आई भाजपा सरकार के मंत्री अपनी घोषणाओं से प्रदेश की जनता के मन में बड़ी उम्मीदें जगा रहे हैं। मंच, माला, जिन्दाबाद जैसे नारो के बीच शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने का ऐलान हो रहा है तो महिलाओं को अधिक सशक्त बनाने,बच्चों की सेहत को बेहतर बनाने के दावे केबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री के मुख से निकलकर राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक गलियारों में गूंज रहे हैं। नये मंत्रियों की नई-नई घोषणाओं को क्रियान्वित करने की कार्यवाही भी शुरू हो गई है। इसके बावजूद शिक्षा, महिला बाल विकास के विभागों में नये नवेले मंत्री क्रांतिकारी कारनामा कर दिखायेगें, इसकी उम्मीद कम ही है।

                 ऐसा मानने का प्रमुख कारण यह है कि चाहे शिक्षा विभाग हो अथवा महिला बाल विकास विभाग। दोनों में मंत्री भले ही नये आये हों लेकिन विभाग ''व्यवस्था'' के जिस सांचे में ढलकर वर्षों से चल रहा है, वह न बदली है, न बदलेगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधि भले ही नये हो परंतु प्रशासनिक व्यवस्था में काम करने वाले अधिकारी तो पुराने ही है। ज्यादातर अधिकारी कर्मचारी तो वे ही है जो कि व्यवस्था का प्रमुख अंग बनकर शासन की योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाते है। जनप्रतिनिधि व्यवस्था में बदलाव के लिए भले ही बड़ी बड़ी घोषणाएं कर दें लेकिन यदि नौकरशाही बदलाव को तैयार न हो तो बदलाव कैसे हो सकता है? यदि शिक्षा और महिला बाल विकास विभागों में सकारात्मक बदलाव करना था तो पिछले 10 वर्षों के शासन काल में भाजपा ने यह काम क्यों नहीं किया? बदलाव के लिए मंत्रियों को, अधिकारियों को किसने रोका था? भरपूर बजट और गांव-गांव तक फैले सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों के रहते हुए मध्यप्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में, महिला बाल विकास के क्षेत्र में पीछे क्यों है? क्या इसके लिए जिम्मेदार नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों से यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि जब विभाग के लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो भारी भरकम बजट की रकम किसकी जेब में चली गई? अशिक्षित बच्चों, कुपोषित माताओं के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?

         इन सवालों की जांच हो तब तक इन समाचारों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये कि राजगढ़ जिले के राजगढ़ विकासखण्ड अन्तर्गत कोलूखेड़ी गांव के निवासी कृष्णा सोंधिया की शिकायत स्थानीय लोगों ने अनुविभागीय अधिकारी आर पी अहिरवार से की। शिकायत में उल्लेख था कि कृष्णा सोंधिया ने गांव के सरकारी स्कूल और आंगनवाडी में अतिक्रमण कर रखा है। वह भैंस एवं अन्य जानवर वहां बांधकर रखता है और आंगनवाडी में भूसा, चारा भरकर रखा हुआ है। ऐसी शिकायत राजगढ़ विकासखण्ड के ग्राम आम्बा के निवासी विनयसिंह पिता माधवसिंह, पीपलखेड़ा के भवरंलाल पिता गोपीलाल ग्राम कांसी के नारायण पतिा गंगाराम के बारे में भी मिली। ये सभी सरकारी स्कूल परिसर, आंगनवाड़ी का उपयोग अपने गाय, भैंस अन्य मवेशी बांधने और आंगनवाडी में भूसा चारा रखते थे।

                ऐसे ही मामले कुछ माह पहले रीवा जिले के कुछ गांवों से भी चर्चा में आये थे जहां सरकारी स्कूलों में मवेशी बांधने की बात सामने आई थी। सरकारी स्कूलों की यह बदहाली केवल ग्रामीण अंचलों में ही नहीं है भोपाल के शासकीय उबेदिया स्कूल सहित अनेक स्कूल जर्जर हालत में है। अतिक्रमण, गंदगी से घिरे है।

               इसी प्रकार यदि हम आगंनवाडियों का जिक्र करे तो भोपाल के जहांगीराबाद क्षेत्र की अफजल कॉलोनी में एक साल पहले 21 लाख रूपयों की लागत से बनाये गये आगनवाड़ी भवन खाली पड़े है। खाली पडे पडे इन भवनों की हालत खराब हो गई है। चोर बदमाश खिडकी दरवाजे चुराकर तोड फोड कर रहे है। ये भवन नगर-निगम और महिला बाल विकास विभाग के अफसरों की लड़ाई में आजतक बंद पडे है। जिन आगंनवाडी भवनों में बच्चों को स्वस्थ, मस्त बनाने के इंतजाम किये जाने थे, वे भवन दुर्दशा के शिकार है। अधिकारिक सुत्र बताते है कि केन्द्र सरकार ने पिछले महीनों में मध्यप्रदेश में लगभग 138 आगंनवाडी केन्द्रों के निर्माण के लिए राज्य सरकार को 4 करोड़ 14 लाख रूपये की राशि स्वीकृत की। इसमें से केवल 65 आगनवाड़ी केन्द्र ही बन पाये। इनमें से भी मात्र 45 को महिला बाल विकास विभाग ने अपने अधिकार में लिया। महिला बाल विकास विभाग की रूचि तैयार भवनों को लेने में इसलिए नहीं है क्योंकि भवन निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग हुआ। भोपाल जिले की महिला बाल विकास विभाग की जिला कार्यक्रम अधिकारी नकीजहां कुरेशी कहती है कि तैयार किये गये आंगनवाडी केन्द्रों में बच्च्चों की सुरक्षा के हिसाब से सुविधाएं नहीं थी। इसलिये हमने पजेशन नहीं लिया यदि वे पजेशन नहीं लेती है तो तैयार हुए आगंनवाडी भवनों को खडंहर होने से कौन बचा सकता है? जब आगंनवाडी केन्द्रों की हालत ही खराब होगी तो फिर मां बीमार और बच्चे कुपोषित क्यों नही होंगे?

          प्रसंगवश यह भी बता दें कि मध्यप्रेदश के पिपरिया क्षेत्र में पिछले दिनों एक दूधवाले की तलाशी के दौरान दूध की खाली टंकियों में से बच्चों को दिये जाने वाले पोषण आहार के पैकेट मिले थे। यह पैकेट जानवरों को खिलाये जाने की बात भी सामने आई। उधर श्योपुर में तो महिला बाल विकास विभाग की एक अधिकारी ने बच्चों को दिया जाने वाला 2 ट्रक पोषण आहार कहीं बेच दिया था। मामला सामने आने पर ये अधिकारी फरार हो गई, पुलिस ने लम्बे समय तक तलाश किया। अब इस मामले को लगभग खत्म कर दिया गया है। बता दें कि श्योपुर वहीं जिला है जहां बच्चों के कुपोषण सर्वाधिक है और कुपोषण के कारण बच्चों की मौत होती रहती है। मरने वाले बच्चें किसी नेता या अधिकारी के नहीं सहरिया आदिवासियों के होते है, इसलिये आज तक दोषी लोगों के विरूध्द कड़ी कार्यवाही नहीं हो सकी।

                 अब सवाल यह है कि जब स्कूलों में जानवर बांधे जा रहे हो, किताबे कबाड़ियों के यहां रद्दी के भाव बिक रही हो, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव हो, छात्र शिक्षक अनुपात ठीक न हो, मधयान्ह भोजन नियमित पौष्टिक न हो तो शिक्षा की गुणवत्ता को कैसे सुधारा जा सकता है।

               जब कुपोषित बच्चों को मिलने वाला खाद्यान्न जानवरों को खिलाया जायें, आंगनवाडी केन्द्र दंबगों के कब्जे में रहे या बंद अथवा दुर्दशा के शिकार हो तो प्रदेश से कुपोषण का कलंक कैसे मिटाया जा सकता है?क्या इस बदहाली, अव्यवस्था को बदलने की चुनौती राज्य सरकार के नये मंत्री स्वीकार करेंगे ?

? अमिताभ पाण्डेय