संस्करण: 13  जनवरी - 2014

मध्यप्रदेश में लगातार जारी है

बाल लिंगानुपात का घटना

? उपासना बेहार

        भारत में महिलाओं का घटना लिंग अनुपात एक विकराल समस्या बन कर उभर रही है, जो कि लगातार बढ़ती ही जा रही है। ताजा आंकड़ों (2011जनगणना)के अनुसार देश में छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों के लिंगानुपात में सबसे ज्यादा गिरावट देखने में आयी है जो कि सरकार और समाज दोनों के लिए ही शर्मनाक और चिंता की बात है।

        1961 से लेकर 2011 तक की जनगणना पर नजर डालें तो यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आता है कि बच्चों के लिंगानुपात (0-6 वर्ष) में 1961 से लगातार गिरावट जारी है। पिछली जनगणना (वर्ष 2001 ) में छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों में प्रति एक हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 927 थी तो वही 2011 की जनगणना के अनुसार बच्चों का लिंगानुपात गिर कर 914हो गया है। ध्यान देने वाली बात है कि यह अब तक की सारी जनगणनाओं में बच्चों के लिंगानुपात का सबसे निम्नतम स्तर है, जो कि भारत की आजादी के बाद से सबसे कम हैं।

                इससे भी दयनीय स्थिति जन्म लेने वाली बच्चियों की है, सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2005-07 में यह संख्या 901 थी, जो वर्ष 2006-08 में 904 व 2007-09 के बीच में 906 हो गई है। वही बीते 20 वर्ष में भारत में कन्या भ्रुण हत्या के कारण एक करोड़ से अधिक बच्चियॉ जन्म ही नहीं ले सकीं है।

                अगर हम मध्यप्रदेश की बात करें तो प्रदेश में भी बच्चों का लिंगानुपात साल दर साल घटता ही जा रहा है। प्रदेश के जनगणना कार्य निदेशालय द्वारा जनसंख्या 2011 के जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 2001 से 2011 के दौरान शिशु लिंगानुपात में 14 अंकों की गिरावट आई है। यानी शून्य से छह साल तक के 1000 लड़कों के मुकाबले सिर्फ 918 लड़कियां रह गई हैं, ( जनगणना 2011 के प्रारंभिक रिर्पोट के अनुसार यह अनुपात 912 थी जो कि राष्ट्रीय औसत से भी कम था)। 10 साल पहले यह आंकड़ा 932 का था। यह 1981 से लेकर अब तक का सबसे कम लिंगानुपात है, यह म.प्र. के ग्वालियर और चंबल डिविजन के 9 जिलों में से 7 जिलों में बाल लिगांनुपात 900 से कम है। म.प्र का यह इलाका कन्या भ्रुण हत्या और कन्या शिशु हत्या का केन्द्र रहा है।

                 राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो 2012 के अनुसार म.प्र. भ्रूण हत्या (30 प्रतिशत) और शिशु हत्या (20 प्रतिशत) के मामले में देश में प्रथम है। मध्यप्रदेश देश का ऐसा राज्य है, जहां सर्वाधिक कन्या भू्रण हत्या के मामले दर्ज होते हैं। प्रदेश में बेटियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश कन्या भू्रण हत्या में शीर्ष पर है। पिछले चार सालों में प्रदेश में कन्या भू्रण हत्या के कुल 127 मामले दर्ज किए गए हैं। वर्ष 2009 में प्रदेश में 39, वर्ष 2010 में 18, वर्ष 2011 में 38, और 2012 में 32 ऐसे मामले दर्ज किए गए है।

                मध्यप्रदेश सरकार द्वारा महिलाओं और बालिकाओं के कल्याण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करने की बात करते हुए बहुचर्चित बेटी बचाओं अभियान लाड़ली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना, बालिका भ्रुण हत्या रोकने के कानून का कड़ाई से पालन, नि:शुल्क गणवेश और सायकल प्रदाय, बालिका शिक्षा, गांव की बेटी, प्रतिभा किरण, सबला योजना, इत्यादी योजनाओं के सफलतापूर्वक चलाने का दावा किया जाता है। इसके लिए महिला एवं बाल विकास विभाग के बजट को लगातार बढ़ाया जा रहा है, लाड़ली लक्ष्मी योजना के लिये वित्तीय वर्ष 2008-09 में 25 करोड़ रूपये आवंटित किये गये, जबकि वित्तीय वर्ष 2013-14 का इसका बजट 34 गुना बृध्दि के साथ 850 करोड़ हो गया है। दूसरी तरफ बेटी बचाओ अभियान में 15.63 करोड़ खर्च करने की बात की जा रही है और बहुत जोर शोर से इस अभियान के सफल होने का ढ़िढोरा पीटा जा रहा है। निश्चित ही इसके भी आवंटित राशि में आगे बढोतरी की प्रवल संभावना है।

                 जनगणना-2011 के बच्चों के लिंगानुपात के आकंड़े बताते हैं कि घटते लिंगानुपात को कम करने के लिए  बीते सालों से जो नीतियों अपनाई जा रही उसका असर होता नही दिख रहा है। कन्या भ्रुण हत्या को रोकने के लिए वैसे तो पी.सी.पी.एन.डी.टी. एक्ट है, लेकिन इसका कड़ाई से पालन नही किया जा रहा है। यदा कदा ही यह समाचार सुनने को मिलता है कि किसी डॉक्टर को इस कानून के तहत पकड़ा गया है और सजा हुई है। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्या भ्रुण हत्या की घटनाएं कम होने के बदले बढ़ रही हैं। गैरकानूनी और छुपे तौर पर कुछ इलाकों में यह काम किया जा रहा है। लिहाजा केंद्र तथा राज्यो को इन नीतियों की दोबारा समीक्षा करने की जरूरत है।

                साल दर साल इस गिरते लिंगानुपात की समस्या हमारे समाज में मौजुद पितृसत्तात्मक सोच की देन है। समाज में ऐसी सामाजिक परंपरा और मान्यताएं मौजुद हैं जो महिलाओं के खिलाफ हैं और घटता लिंगानुपात इसी का प्रतिबिम्ब है।

                हम 21 सदी में कदम रख चुके हैं, दुनिया मंगल पर जीवन की खोज कर रही हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश हमारा समाज आज भी रूढ़िवादी सोच की कैद में है लोग आज भी संकीर्ण मानसिकता और समाज में कायम अंधविश्वासों, दकियानुसी रीति-रिवाजों और पुराने सामाजिक व्यवस्था को मान कर बेटा और बेटी में भेद कर रहे हैं। आज भी कन्या के जन्म पर पूरे परिवार में मायूसी और शोक छा जाती है। आज भी समाज लड़की की तुलना में लड़के को ही ज्यादा महत्व देता है। ज्यादातर मां-बाप बेटे को अपने बुढ़ापे की लाठी मानते है और मानते हैं कि वंश परंपरा को आगे बढ़ाने का काम लड़के ही करते हैं इसी बेटे के मोह के चलते हर साल लाखों बच्चियॉ जन्म लेने से पहले ही मार दी जाती हैं और यह सिलसिला थमने के बजाये बढ़ता ही जा रहा है।

                 इसके अलावा कन्याओं के कम होने का एक ओर कारण जन्म के बाद से बच्चियों की ठीक तरीके से देखभाल ना होने के कारण, उनकी मृत्यु दर का अधिक होना भी है। लेकिन अगर जैविक रुप से देखें तो लड़कियों में जीने की क्षमता ज्यादा होती है। एस.आर.एस. बुलेटीन सितंबर 2013 के अनुसार प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 56 है। जो कि देश में सबसे ज्यादा है। वही यह दर लड़कों में 54 तथा लड़कियों में 59 है। याने शिशु मृत्यु में लड़की शिशु मृत्यु की दर लड़का शिशु मृत्यु दर से ज्यादा है।

                 घटता लिंगानुपात एक सामाजिक समस्या है इस लिए इसे रोकने के लिए कानूनी प्रावधानों के साथ साथ समाज की तरफ से भी गंभीर प्रयास करने की जरुरत है। समाज के पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव लाने की जरुरत है। सरकार को भी इन योजनाऐं के साथ पितृसत्तात्मक सोच पर प्रहार करने की आवश्यकता है। इसके अलावा मध्यप्रदेश में महिलाओं के घटते लिंगानुपात की गंभीरता को देखते हुये पीसीपीएनडीटी एक्ट के क्रियांवयन को सुनिश्चित किया जाये एवं उल्लघंन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाये साथ ही इसके सफल क्रियांवयन हेतु राज्य एवं जिला सलाहकार समिति को सक्रिय कर जवाबदेह बनाया जाये।

                 वैसे तो सरकार ने 2011-12 तक बच्चों का लिंग अनुपात 935 और 2016-17 तक इसे बढ़ा कर 950 करने का लक्ष्य रखा है परन्तु ये लक्ष्य तभी पूरा किया जा सकता है जब तक समाज की तरफ से ठोस पहलकदमी हो।

? उपासना बेहार