संस्करण: 13 जनवरी -2014

'आप की क्रान्ति' :

तरीका नया, सोच वही

? सुभाष गाताड़े

               दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रा कहे जानेवाला हिन्दोस्तां और दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र में शुमार संयुक्त राज्य अमेरिका - जो इन दिनों बिल्कुल अलग कारणों से आपस में एक नूराकुश्ती में लगे हुए हैं - के दो अहम शहर न्यूयॉर्क और दिल्ली, पिछले दिनों लगभग एक ही किस्म के कारणों से सूर्खियों में रहे। अगर न्यूयॉर्क में मेयर पद पर डी ब्लासिओ का चुनाव और उनका शपथग्रहण, जिन्होंने 12 साल से कायम रिपब्लिकन नेता को बेदखल किया, चर्चा में रहा तो सूबा दिल्ली में एक साल पुरानी पार्टी 'आप' के नेता अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम ने सूर्खियां बटोरी।

               दोनों को एक तरह से आन्दोलन की 'पैदाइश' के तौर पर देखा गया।

               दो साल पहले अमेरिका में 'आक्युपाई वॉल स्ट्रीट' के नाम से खड़े आन्दोलन ने आर्थिक विषमता पर बहस को एक नयी उंचाई दी थी, जब उसने 1 फीसदी बनाम 99 फीसदी का नारा दिया था, हजारों लोगों की सहभागिता ने और उनके अभिनव तौरतरीकों ने पूरी अमेरिका के मेहनतकशों में नयी ऊर्जा का संचार किया था। डेमोक्रेट पार्टी से जुड़े शहर के वकील डी ब्लासिओ ने आन्दोलन की हिमायत की थी, एक अस्पताल की बन्दी को लेकर चले विरोधा प्रदर्शन में उनकी गिरतारी भी हुई थी। मेयर पद के लिए चले चुनाव प्रचार के दिनों में ही उन्होंने रईसों पर अधिक कर लगाने की बात की थी और 'रोको और तलाशी लो' जैसे न्यूयॉर्क पुलिस के विवादास्पद कार्यक्रम को चुनौती दी थी। वहीं अरविंद केजरीवाल , जनलोकपाल के लिए चले आन्दोलन जिसे लोकप्रिय जुबां में 'अण्णा आन्दोलन' कहा गया, उसके शिल्पकार कहे गये और उसके बाद अम्बानी जैसे कार्पोरेट घरानों का पर्दाफाश, सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाडरा के आर्थिक सौदे में कथित तौर पर नज़र आनेवाली अनियमितताओं को उजागर करते देखे गए।

                तय बात है कि अब जब दोनों की ताज़पोशी हुई है, लोगों की उम्मीदों को नयी उंचाइयों पर ले जाने में सफल दोनों अग्रणियों के हर कदम पर पारखी लोगों की निगाह रहेगी। अपनी तकरीरों में शहर में ही बसे 'दो शहरों' की बात करनेवाले डी ब्लासिओ, जो अपने बहुनस्लीय परिवार के लिए भी मशहूर हैं - जिनकी पत्नी अश्वेत समुदाय से हैं - की कथनी और करनी के अन्तराल को लगातार जांचा जाएगा, उसी तरह सियासत में सादगी लाने के लिए प्रतिबध्द कहे जानेवाले जनाब केजरीवाल - जो लालबत्ती संस्कृति को अलविदा करना चाहते हैं - उन्हें भी मीडिया से लेकर अन्य राजनीतिक पार्टियों की सतत निगरानी को झेलना पड़ेगा।

                अगर अपनी चर्चा को भारत पर फोकस करें तो इसमें कोई दोराय नहीं कि केजरीवाल के आगमन ने भारत की सियासत में चल रही मोदी की चर्चाओं पर थोड़ा विराम लगा दिया है, सोशल मीडिया पर भी वह मोदी से अधिक लोकप्रिय स्टार दिख रहे हैं, राजनीति करने के उनके गैरपारम्पारिक प्रयास ने कई ऐसे तबकों को राजनीति में लाने का काम किया है जो आम तौर पर हाशिये पर ही दिखते थे, आम लोगों में भी यह विश्वास एक हद तक जनमा है कि वह चाहे तो राजनीति की धारा बदल सकते हैं, एक पारदर्शी किस्म की राजनीति को रिकवर करने, नयी तकनीक का बखूबी इस्तेमाल करने में वह आगे रहे हैं।

                प्रश्न उठता है कि क्या वह सबकुछ कर पाएगी जिस भरोसे के साथ नए नए लोग उससे जुड़ रहे हैं। इस बात पर निश्चित ही सन्देह प्रगट किया जा सकता है, वजह है उसकी वैचारिक अस्पष्टता।  

                'आप' की सर्वाधिक अधिक परीक्षा दरअसल भ्रष्टाचार के उसी मुद्दे को लेकर होगी, जिसकी बात अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों ने लगातार की है। यह सभी के सामने है कि 'सच की राजनीति और स्वराज्य का संकल्प' लाने के लिए अपने आप को प्रतिबद्ध कहलानेवाली आप भ्रष्टाचार को लेकर सरकारी मशीनरी को चुस्त करने की, दुरूस्त करने की बात अपने घोषणापत्र में करती है। मगर उसने उन संरचनात्मक कारणों की लगातार अनदेखी की है कि भ्रष्टाचार -जिसे आम जनमानस में भी 'अवैध लूट' का दर्जा हासिल है - का मुल्क की आर्थिक नीतियों से क्या रिश्ता हो सकता है। एक अहम सवाल हमेशा ही पीछे छूटता रहा है कि कि 'अवैध लूट' का उजागर होता हिमखण्ड का सिरा पूंजी के इस निजाम में सहजबोधा बने 'वैध लूट' के विशाल हिमखण्ड से किस तरह जुड़ा है।

                मिसाल के तौर पर हम कार्पोरेट क्षेत्र को मिलनेवाली छूट को देखें, क्या उन्हें हम नीति का हिस्सा मान सकते हैं या भ्रष्टाचार का ?

                उदाहरण के लिए विडिओकान नामक चर्चित कम्पनी के बारे में ख़बर आयी थी कि उसने टैक्स बचाने तथा अन्य वजहों से तीन सौ सब्सिडीरी कम्पनियो का निर्माण किया है और यह सब 'कानूनन' किया है। कुछ समय पहले सीपीआई से सम्बध्द ट्रेड यूनियन के नेता ने अख़बार को बताया था कि किस तरह बैंकों के एनपीए का नब्बे फीसदी से अधिक हिस्सा बड़े छोटे पूंजीपति घरानों के नाम होता है, जो कभी उसे लौटाने की बात भी नहीं करते और कुछ समय बाद 'खराब कर्जे' कह कर उसे लेखाजोखा विवरण से भी हटा दिया जाता है। आम किसान या मजदूर द्वारा लिए गए छोटे मोटे कर्जे की वापसी न होने पर उसे गिरतार करने के लिए पहुंचती सरकारी मशीनरी ऐसे कर्जो पर नोटिस भेजना भी मुनासिब नहीं समझती। स्पेशल इकोनोमिक जोन्स अर्थात विशेष आर्थिक क्षेत्र की बहुचर्चित नीति को भी देखें जहां अरबों रूपए के भूखण्ड मामूली दामों पर पूंजीपति घरानों को सौंपे जाते हैं जहां अपने मनमाफीक नियम बना कर काम कर सकते हैं, उसे क्या कहेंगे।

                यह बात सर्वविदित है कि 90 के दशक के शुरूआत से भ्रष्टाचार में जबरदस्त उछाल आया है। आखिर क्या वजह रही होगी इस उछाल के पीछे। भ्रष्टाचार बनाम सदाचार जैसे द्विविधा अर्थात बाइनरी में यकीं रखनेवाले लोग कह सकते हैं कि इसका ताल्लुक लोगों के अधिक बेईमान होते जाने से जुड़ा है। निश्चित ही यह स्पष्टीकरण नाकाफी है। कल्पना करें कि किसी अलसुबह सारे नेतागण/नौकरशाह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाते हुए काम करने लग जाएं तो भले सरकारी संसाधानों की 'अवैध कही जा सकनेवाली लूट' भले बन्द होगी मगर वह सिलसिला पूरी 'वैधता' के साथ चलता रहेगा, जो सरकारी नीतियों के तहत सामने आता है।

                एक बात जो आसानी से समझ में आती है कि इस दौरान मुल्क की आर्थिक नीतियों ने एक तरह से करवट ली है।

                विदित हो कि 90 के दशक में राव-मनमोहन सिंह जोड़ी के सत्तासीन होने के बाद आजादी के बाद से चली आ रही आर्थिक नीतियों के साथ एक रैडिकल विच्छेद किया गया था और बाजारशक्तियों को खुली छूट देने का सिलसिला तेज हुआ था, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के लिए रास्ता सुगम किया गया था। नवउदारवादी आर्थिक फलसफे के तहत राज्य द्वारा आर्थिक गतिविधियों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप को न केवल निरूत्साहित किया गया था बल्कि साथ ही साथ पूंजीपतियों की आर्थिक गतिविधियों पर राज्य द्वारा पहले से चले आ रहे नियमनों को लगातार ढीला किया जाता रहा। यही वह दौर था जब तमाम नए पूंजीपति सामने आए जो जल्द ही पहले से स्थापित पूंजीपति घरानों को टक्कर दे सकते थे। निचोड के तौर पर 1991 के पहले के दौर और 91 के बाद के दौर की तुलना करें तो कई फरकों को आसानी से देख सकते हैं। 91 के पहले के दौर की खासियत के तौर पर चन्द बातें चिन्हित की जा सकती हैं : राज्य का नियमन, पूंजी पर नियंत्राण, उदा मोनोपाली एण्ड रिस्ट्रिक्टिव प्रेकिटसेस एक्ट, आयात प्रतिस्थापन, आर्थिक विकास दर धीमी, वहीं 91 के बाद साफ तौर पर राज्य के नियमन में कमी, पूंजी को खुली छूट, उदारीकरण-निजीकरण-भूमण्डलीकरण की नीतियां, बाजारशक्तियों को खुली छूट, विकास दर तेज आदि बातें नज़र आती हैं।

               कहने का तात्पर्य यही कि भ्रष्टाचार महज पोलिटिकल क्लास की बेईमानी (जो अपने आप में एक विराट परिघटना है) का मसला नहीं है बल्कि उसका ताल्लुक हुकूमत सम्भालनेवालों की तरफ से अपनायी जाती आर्थिक नीतियों से भी अभिन्न रूप से जुड़ा मसला है।

               साल भर पहले इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली' (16 फरवरी 2013) के अंक में जनाब एस पी शुक्ला ने आप के 'विजन डाक्युमेट' की समीक्षा करते हुए कहा था। 'विजन डाक्युमेण्ट बीमारी का उसके लक्षणों के साथ घालमेल करता है। वह अमीरों एवं गरीबों के बीच बढ़ती खाई की बात करता है,... मगर कहीं भी वह समस्या की जड़ में नहीं जाता जिसका ताल्लुक शासक वर्गों द्वारा अपनायी गयी नवउदारवादी नीतियों से है, जिसमें न केवल सत्ताधारी एवं विपक्षी पार्टियों के संकुल शामिल है, बल्कि बड़ी पूंजी और सम्पन्न मध्यम वर्ग भी शामिल है ..'।

                आन्दोलन से निकली इस पार्टी की वैचारिक अस्पष्टता का आलम यह है कि दिल्ली में सरकार बनाने के बाद उसके अग्रणी नेता को यह बताना पड़ता है कि अनुसूचित जाति-जनजातियों को विशेष अवसर प्रदान करने के प्रति वह प्रतिबध्द है, जो बात संविधान निर्माताओं ने 60 साल पहले ही लिखी है। दरअसल दलितों, आदिवासियों एवं अन्य पिछड़ी जातियों के लिए प्रदत्त रिजर्वेशन को लेकर भी उसके यहां जबरदस्त विभ्रम नज़र आता है। एस पी शुक्ला स्पष्ट लिखते हैं कि 'सामाजिक अन्याय की लम्बे समय से चले आ रहे पैमाने को विजन डाक्युमेण्ट में उल्लेखित 'आर्थिक पिछड़ेपन'' के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। इस तरह का विरोधा आरक्षण के विरोधी करते रहे हैं। '  

? सुभाष गाताड़े