संस्करण: 06 फरवरी- 2012

बाबा के विरोध की हकीकत

अपना 'काला धन' बचाना चाहते हैं रामदेव    

? विवेकानंद

                  किसी ने क्या खूब लिखा है 'सच्चाई छिप नहीं सकती बनावट के उसूलों से।' यानि कभी न कभी सामने आ ही जाएगी, जैसे बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की असलियत सामने आ गई। हम किसी पार्टी के विरोध में नहीं होने की रट लगाने वाले बाबा रामदेव आखिर बोल ही गए कि भाजपा, माकपा को वोट दो और कांग्रेस का बहिष्कार करो। उधर संघ प्रमुख मोहनभागवत ने भी दिग्विजय सिंह के आरोपों पर मोहर लगा दी। उन्होंने साफ कहा कि अन्ना हजारे को यह स्वीकार करने पर आपत्ति है कि संघ के कार्यकर्ता अन्ना के अंदोलन में शामिल थे।

                 बहरहाल सवाल यह नहीं है कि कौन किसके साथ है और कौन किसका विरोध कर रहा है। सवाल है जनता को दिग्भ्रमित करने का। बाबा रामदेव कालेधन के खिलाफ झंडा बुलंद किए हुए हैं। अच्छी बात है,कालाधन देश में वापस आना चाहिए, लेकिन जब सरकार प्रयास कर रही है, तमाम देशों से संधियां हो रही हैं, सरकार खुले तौर पर सुप्रीम कोर्ट में अंतराष्ट्रीय संधियों की बाधयता कोर्ट के सामने पेश कर चुकी है फिर अभियान की क्या जरूरत है? बाबा भक्तों के मन में यह प्रश्न नहीं आएगा यह तो तय है,लेकिन बाबा यह क्यों भूल जाते हैं कि उनके भरमाने में देश नहीं आने वाला?उन्हें यह क्यों नहीं समझ में आ रहा है कि उनकी असलियत खुल चुकी है। और असलियत यह है कि बाबा रामदेव को न तो कालेधन से मतलब है और न ही विकास है,बाबा का सूत्रीय कार्यक्रम में उत्तराखंड में कांग्रेस को आने से रोका जाए, ताकि उन्होंने इस पवित्र स्थान पर जो काली कमाई जमा कर रखी है उस पर आंच न आए। गौरतलब है कि बाबा कांग्रेस ने संत समझकर इस तीर्थ में बाबा की कुटिया बनवाने में मदद की थी, लेकिन बाबा की काली कमाई भाजपा के राज में परवान चढ़ी। बाबा चतुरसुजान निकले...जब चुनावों की चर्चा होने लगी तो बाबा को कालाधन अचानक याद आया और स्वाभिमान यात्रा लेकर निकल पडे। उसे कोई प्रतिसाद नहीं मिला तो अन्ना हजारे से मंच साझा किया,जब वहां भी वक्त नहीं हुई तो रामलीला मैदान में तंबू गाढ़ दिया और कानूनी बाधयताओं को नजरअंदाजकर खुद को औघड़दानी साबित करने पर तुल गए। और सारे रायों में जनता को जागरूक करने की बात करने वाले बाबा का अधिकतम धयान केवल उत्तराखंड की जनता को जागरूक करने में रहा और अब भी वहीं डटे हुए हैं। शेष राज्यों में सुर्खियों में बने रहने के लिए उन्होंने राहुल गांधी को अपने कार्यकर्ताओं से काले झंडे दिखवा रहे हैं ताकि यह भ्रम बना रहे कि बाबा पांचों राज्यों में सक्रिय हैं। फिलहाल उत्तराखंड में वोटिंग हो चुकी है, अब बाबा आठों पहर अगरबत्ती लगा रहे होंगे कि भगवान कांग्रेस की सरकार न बने। क्योंकि कांग्रेस आएगी तो उन सारे रिकार्डों की जांच होगी जिनमें बाबा के भाजपा नेताओं के साथ मिलकर किए गए काले कारनामे छिपे हुए हैं। हरिद्वार डाक विभाग की सूचनाएं सामने हैं जिनसे साबित हो चुका है कि बाबा ने कर चोरी की है। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर उनकी दिव्य फार्मेसी पर छापा मारा गया था जिनमें पांच करोड़ रुपए की बड़ी बिक्री कर की चोरी सामने आ चुकी है। बाबा ने अपने स्वार्थ के लिए भगवा रंग का कैसे इस्तेमाल किया और कैसे जमीनें हथियाईं यह भी सामने आ चुका है। कांग्रेस के आने से भगवा के पीछे छिपी यह कालिख सामने आ जाएगी।

               यही स्थिति अन्ना हजारे और संघ की है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने जब-जब कहा कि अन्ना और संघ की गठजोड़ है, अन्ना ने हमेशा इस बात से इंकार और संघ ने गोलमोल जवाब देकर टाला ताकि सांप भी मर जाए और लाठी न टूटे। लेकिन अब जबकि अन्ना हजारे बीमार हैं और बीमारी के चलते पांच राज्यों में प्रचार करने से बच रहे हैं, और बाबसिंह कुशवाहा को लेकर भाजपा मुंह की खा चुकी है तो संघ प्रमुख ने सारा पांखड खोल कर रख दिया। संघ प्रमुख ने बाकायदा कहा कि आखिर अन्ना को यह स्वीकार करने में क्या परहेज है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में संघ उनके साथ था। संघ प्रमुख की स्वीकारोक्ति से दो बातें स्पष्ट हो गईं। पहली अन्ना आंदोलन में उमड़ रही भीड़ आम आदमी की नहीं थी बल्कि संघियों और उनके द्वारा जुटाए गए स्वयं सेवकों की भीड़ थी, जिसे सरकार पर दबाव बनाने के लिए जनता कहा जा रहा था। दूसरी बात अन्ना के आंदोलन में चेहरा भले ही वो हों लेकिन आंदोलन पूरी तरह संघ का था, जिसका सीधा-सीधा उद्देश्य था जनता के मन में कांग्रेस के प्रति प्रतिशोध पैदा करना और उसका लाभ भाजपा को दिलाना। और अब जबकि टीम अन्ना सुर्खियों से नदारत है तो संघ को अपनी वह मुहिम फेल होती दिख रही है, इसलिए उन्होंने इसका खुलासा करके कि भ्रष्टाचार रोधी आंदोलन में संघ था, जनधारा को पुन: भाजपा की ओर मोड़ने का प्रयास किया है। और संघ प्रमुख के इस कदम का टर्निंग पाइंट साबित हुआ पटियाला हाउस कोर्ट का फैसला जिसमें जज ओपी सैनी ने गृह मंत्री पी चिदंबरम को बेकुसूर ठहराया। बाबूसिंह कुशवाहा को गोदी में बैठाने के बाद पटियाला हाउस कोर्ट का फैसला भाजपा के षडयंत्र की पोल खोलने वाला था। संघ को लगा कि इस फैसले से जनता कहीं यह न मान ले कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ है भ्रष्टाचार में शामिल नहीं, इसलिए अब यह हकीकत बताई जा रही है कि  की कोशिश की जा रही है भ्रष्टाचार के खिलाफ हम ही लड़ रहे थे, अन्ना तो महज मुखौटा थे। संघ के लिए यह मजबूरी है क्योंकि वह लाख कहे भाजपा स्वतंत्रत पार्टी है, उसके अपने नेता हैं, लेकिन हकीकत यही है कि पर्दे के पीछे से कमल दल को संघ ही चलाता है। लेकिन इन घटनाओं से यह साफ हो गया कि टीम अन्ना और बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के नहीं बल्कि निजी हितों के लिए काम कर रहे हैं।


? विवेकानंद