संस्करण: 13 फरवरी- 2012

'झूठ' के नक्कारखाने में-

'सच' हो गया है तूती की आवाज

? राजेन्द्र जोशी

                'नक्कारखाने में तूती की आवाज' का जुमला वर्तमान राजनैतिक रौर में एकदम फिट बैठ रहा है। इस दौर में 'झूठ' जीवन के प्राय: प्रत्येक क्षेत्र में हावी हो चुका है। विशेषकर राजनीति में वास्तविकताएं और 'सच' तो खारिज ही हो चुके हैं। राजनैतिक प्रतिद्वंद्विताओं के चलते 'झूठ' को तो एक दूसरे पर वार करने का एक अचूक बाण मान लिया गया है। आरोप-प्रत्यारोपों के तीर किसी दल की कमान से निकले नहीं कि उस धनुष की टंकार की आवाज पर चहुओर हंगामा खड़ा हो जाता है। राजनैतिक दलों की कमान से निकले तीर का अनुसरण करते हुए महानगरों से लेकर गांव स्तर तक के बयानवीर अपने दल की आवाज में आवाज मिलाते हुए प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दरवाजों तक पहुंच जाते हैं और अपनी अपनी पार्टी के प्रति वफादारी प्रदर्शित करने में जरा भी चूक नहीं करते। इन बयानवीरों को न तो विषय की वस्तुस्थिति का ज्ञान होता है और न ही वे उस हकीकत को समझने की कोशिश कर पाते हैं जिस पर उन्हें अपनी टिप्पणी दर्ज कराना पड़ता है। चूंकि पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता ने राजनैतिक चालबाजी के तहत 'झूठ' फैलाकर सच को दबाने की साजिश की है अत: छुटभैये लोग भी उस साजिश में शामिल होकर 'झूठ' को ही हवा देने में अपना राजनैतिक धर्म समझ लेते हैं।

               राजनीति का यह एक कड़वा सच बन गया है कि विपक्ष की राजनीति करने वाले दलों के पास जब विरोध जताने का कोई ठोस मुद्दा नहीं होता है तब वे 'झूठ' का सहारा लेकर सत्तारूढ़ दल का मज़ाक उड़ाने, अपमानित करने और कतिपय नेताओं का चरित्र हनन करने से बाज नहीं आते। अपने 'झूठ' का हंगामा मचाकर धमाचौकड़ी शुरू कर दी जाती है परिणाम स्वरूप एक नक्कार खाने जैसा माहौल बन जाता है। संपूर्ण देश झूठ के नक्कारखाने की गड़गड़ाहट में इतना अधिक गूंजने लगता है कि वहां सच और हकीकत की आवाज तूती जैसी लगने लगती है। नगाड़ा पीटने वाले केवल यही चाहते हैं कि अवाम उन्हीं के ढोल की आवाजें सुने। जनता को ऐसा भ्रमित कर दिया जाता है कि वह 'सच' की आवाज ही नहीं सुन सके। तर्कहीन भाषण और राजनीति  से प्रेरित फैलाये जा रहे भ्रमजाल से आम आदमी बाहर ही न निकल सके।

                 ऐसे अनेक अवसरों और अनेक मामलों के उदाहरण जनता को मिले हैं जिसमें राजनीति का छलछंद और तथ्यों से विपरीत विरोध करने के हथकंडे उजागर होते रहे हैं। अनेक ऐसे मुद्दे राजनैतिक राग द्वेष से प्रेरित होकर विपक्षी दलों द्वारा फैलाये गये हैं जिनमें 'सच'को दबाने के हथकंडे उजागर होते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर यह अकाटय सत्य है कि योगगुरू बाबा रामदेव एक सन्यासी हैं किंतु इस सच के अलावा उनके द्वारा जिस तरह के कदम उठाये जा रहे हैं वे भारत के संवैधानिक सच के मामले में तो 'झूठ' ही, तब तक माने जायेंगे, जब तक भारतीय संविधान की धाराओं में संशोधन नहीं हो सकता। अक्सर राजनीति के मैदान में खेलते हुए देखे जाते हैं। माना कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति के मूल अधिकार की प्रत्येक नागरिक को पात्रता है किंतु योगगुरू स्वामीजी खेल तो राजनीति का खेलते हैं किंतु जब उन्हें दूसरे राजनैतिक दल राजनैतिक जवाब देते हैं तो वे अपने आपको एक सन्यासी घोषित कर देते हैं। योगगुरू के नक्कारखाने के आर्केस्ट्रा की गड़गड़ाहट में कतिपय विपक्षी दल और संगठन इसलिए भी शामिल हो गये हैं क्योंकि वे भी केन्द्र के सत्तारूढ़ दल के कट्टर विरोधी हैं।

                 ऐसे ही 'सच' और 'झूठ' की प्रतिद्वन्द्विता समाजसेवी अन्ना हजारे जी को लेकर सामने है। समाजसेवा के नाम पर अपने राजनैतिक टारगेट में लगे आदरणीय अन्नाजी और उनके टीम सदस्य भी संविधान की धाराओं और संसदीय प्रणाली को भी धता बताकर अपने प्रचार के नक्कारखाने में सच की तूती को दबाने में रातदिन एक कर रहे हैं।

                   हाल ही में 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को लेकर विपक्षी राजनीति का हंगामा सर्वविदित है। स्वाभाविक है यह एक ऐसा मुद्दा है जिसके कई तरह के प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं। फैसला आने के कुछ मिनिटों बाद जिस तरह विपक्षी दलों ने अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए अपने ठंडे पड़े चूल्हे को गरम कर दिया उसमें कहीं न कहीं 'सच' को भी जलाने की कोशिश दिखाई देती है। केन्द्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर श्री कपिल सिब्बल द्वारा दिया गया बयान इस बात की पुष्टि करता है की यह फैसला वर्तमान सरकार पर आक्षेप नहीं है। दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि यह फैसला न तो प्रधानमंत्री और न ही तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम के खिलाफ किसी प्रकार का आक्षेप है। अब तो पटियाला हाऊस कोर्ट ने भी फैसला दे दिया है कि इसमें गृहमंत्री श्री चिदम्बरम जिम्मेदार नहीं है। कोर्ट ने गृहमंत्री को राहत दे दी है। सिब्बल का कथन है कि यदि किसी भी तरह का आक्षेप बनता भी है तो वह 2003 की एन.डी.ए. सरकार पर है। यू.पी.ए. ने तो पूर्व सरकार की नीति 'पहले आओ पहले पाओ' की नीति के अनुसार ही काम किया है। दूरसंचार मंत्री ने इस फैसले का स्वागत किया है और कहा है कि सरकार इसका पालन करेगी और स्पेक्ट्रम की नीलामी की जायगी। देखा जाय तो स्पेक्ट्रम मामले का यह सत्य है कि तत्कालीन एन.डी.ए. सरकार की नीति ही इसके लिए जिम्मेदार है। किंतु वर्तमान दौर में इस फैसले के माधयम से विषय को इतना अधिक मचा दिया गया है जैसे सारा दोष यू.पी.ए. सरकार का ही हो। आम जनता को इस भ्रम से बचना चाहिए क्योंकि वर्तमान राजनैतिक दौर में झूठ का बोलबाला है और सांच का मुंह काला कर दिया जाता है।

 
? राजेन्द्र जोशी